
वर्धा- महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में झारखंड के विद्यार्थियों द्वारा आयोजित किए जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित फीचर फिल्म ‘उलगुलान: एक क्रांति’ का प्रदर्शन प्रशासनिक असमंजस और फाइलों के एक विभाग से दूसरे विभाग में घुमाए जाने के कारण अटक गया है। सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बावजूद विद्यार्थियों को 3 अप्रैल को प्रस्तावित इस कार्यक्रम के लिए अब तक सभागार की अनुमति नहीं मिल सकी है।
झारखंड के गढ़वा जिले के निवासी और जनसंचार विभाग के छात्र राहुल कुमार ने द मूकनायक को बताया कि 20 मार्च को विश्वविद्यालय प्रशासन को औपचारिक आवेदन देकर तुलसी भवन स्थित ग़ालिब सभागार में फिल्म प्रदर्शन की अनुमति मांगी थी। विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित नियमावली के अनुसार कार्यक्रम से 10 दिन पूर्व आवेदन जमा कराना अनिवार्य है, जिसका छात्र ने पालन किया।
आवेदन को विभागाध्यक्ष डॉ. संदीप कुमार वर्मा द्वारा अग्रेषित किया गया। उसी दिन छात्र कल्याण अधिष्ठाता डॉ. अवधेश कुमार शुक्ल ने भी इसे अनुमोदित करते हुए कुलसचिव कादर नवाज खान के नाम भेज दिया।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में झारखंड के विद्यार्थियों द्वारा स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित फीचर फिल्म ‘उलगुलान: एक क्रांति’ के प्रदर्शन को लेकर प्रशासनिक देरी और असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
इसके बाद 23 मार्च को फाइल कुलसचिव कार्यालय से जनसंपर्क अधिकारी के पास पहुंची, लेकिन वहां से इसे पुनः छात्र कल्याण अधिष्ठाता कार्यालय भेज दिया गया। आगे यह फाइल संस्कृति समिति के पास गई, जहां 26 मार्च तक फिल्म का परीक्षण और प्रमाणन पूरा कर लिया गया।
सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बावजूद, विद्यार्थियों को अंतिम अनुमति नहीं दी गई। प्रशासन ने अब इस मामले को 1 अप्रैल को होने वाली बैठक के लिए टाल दिया है, जिससे छात्रों में निराशा व्याप्त है।
विद्यार्थियों द्वारा आयोजित किए जाने वाले विभिन्न कार्यक्रमों को सुव्यवस्थित, अनुशासित एवं विश्वविद्यालय के उद्देश्यों के अनुरूप संचालित किए जाने को दृष्टिगत रखते हुए निम्नलिखित नियमावली निर्धारित की गई है. कुलसचिव कादर नवाज़ खान द्वारा 19 जनवरी 2026 को जारी परिपत्र के मुताबिक:
1. कार्यक्रम अकादमिक प्रकृति का एवं विश्वविद्यालय के उद्देश्यों के अनुरूप होना चाहिए।
2. कार्यक्रम से संबंधित आवेदन कार्यक्रम तिथि में कम से कम 10 (दस) दिवस पूर्व कुलसचिव कार्यालय में जमा कराना अनिवार्य होगा।
3. किसी महापुरुष की जयंती, पुण्यतिथि आदि विशेष अवसरों को छोड़कर, कार्यक्रम केवल कार्यदिवमों में ही आयोजित किए जाएंगे।
4. आवेदन संबंधित विभागाध्यक्ष के माध्यम से अग्रेषित होना चाहिए। कार्यक्रम का आयोजन संबंधित विभागाध्यक्ष अथवा उनके द्वारा मनोनीत अध्यापकों की समिति की देखरेख में संपन्न होना आवश्यक होगा।
5. विश्वविद्यालय द्वारा आपोजित कार्यक्रम के दिन विद्यार्थियों द्वारा आयोजित कार्यक्रम के लिए अनुमति प्रदान नहीं की जाएगी।
6. कार्यक्रम की विषयवस्तु एवं उसका विवरण आवेदन के साथ संलग्न करना अनिवार्य होगा।
7. आवेदन पत्र के साथ कम से कम 10 विद्यार्थियों के नाम (जिन विभागों में 10 से कम विद्यार्थी हो, वहाँ के समस्त नामांकित विद्यार्थियों के नाम), विभाग का नाम, मोवाइल नंबर एवं ई-मेल की सूची संलम करना आवश्यक होगा। साथ ही उत्रावास का नाम एवं कक्ष संख्या भी उल्लेखित करना होगा।
8. सभागार में उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग किया जाए। किसी भी प्रकार की क्षति होने पर उसकी भरपाई कार्यक्रम के संयोजक अथवा आयोजक शोधार्थी विद्यार्थियों के दल को करनी होगी।
9. विश्वविद्यालय परिसर की दीवारों पर पोस्टर, बैनर आदि चिपकाना पूर्णतः प्रतिबंधित होगा।
10. जिन आयोजक दल को सभागार आवंटित होगा उसी आयोजक दल को कार्यक्रम कराना होगा वह अहस्तांतरणीय एवं अपरिवर्तनीय होगा।
11. पोस्टर एवं बैनर केवल कार्यक्रम स्थल पर एवं विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित स्थल पर ही लगाना अनिवार्य होगा। निर्धारित स्थल के अलावा अन्य जगहों पर पोस्टर बैनर प्रतिबंधित होगा।
12. आयोजक बल को अपने विभागाध्यक्ष के माध्यम से आयोजन से संबंधित नियमावली का वचन पात्र (Undertaking) देना होगा।
13. कार्यक्रम की समय-सीमा दो घंटे से अधिक न हो और कार्यक्रम के लिए रात्रि 09:00 बजे तक की अनुमति होगी।
14. सभागार एवं उपलब्ध संसाधनों के अलावा विश्वविद्यालय अन्य संसाधन उपलब्ध नहीं कराएगा। इसकी व्यवस्था आयोजकों की स्वयं करनी होगी।
विद्यार्थियों का कहना है कि पिछले 10 दिनों से वे लगातार एक सभागार की अनुमति के लिए विभिन्न कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल रहा। छात्र राहुल कुमार का कहना है, "हमने 20 मार्च को आवेदन दिया था। नियम कहता है कि 10 दिन में अनुमति मिल जानी चाहिए, लेकिन हमें सिर्फ टालमटोल मिल रही है। फाइल को एक से दूसरे विभाग में घुमाया जा रहा है।"
विद्यार्थियों ने यह भी सवाल उठाया है कि जब फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से स्वीकृति प्राप्त है और सभी प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं, तो फिर अनुमति देने में देरी क्यों की जा रही है। उनका आरोप है कि फाइल को एक विभाग से दूसरे विभाग में घुमाकर कार्यक्रम को टालने की कोशिश की जा रही है।
गौरतलब है कि इस कार्यक्रम की घोषणा पहले ही एक अन्य डॉक्यूमेंट्री प्रदर्शन के दौरान कर दी गई थी। ऐसे में अंतिम समय में अनुमति न मिलना विद्यार्थियों के प्रयासों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है और कार्यक्रम करने को लेकर ऊर्जा खत्म हो गई है।
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