हरियाणा में अंबेडकर-अटल लाइब्रेरी नाम परिवर्तन विवाद: आलोचक क्यों मानते हैं बाबासाहेब का नाम बदलना गलत?

बाबा साहब किताबों के इतने शौकीन थे कि भूखे रह सकते थे, लेकिन किताबों के बिना नहीं।
अंबेडकर का पुस्तकों के प्रति प्रेम अद्वितीय था।
डॉ. बी. आर.अंबेडकर लाइब्रेरी का नाम परिवर्तित कर "अटत पुस्तकालय" किए जाने का मामला केवल किसी संस्थान के नाम परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों वंचित, शोषित, दलित, पिछड़े एवं बहुजन समाज की भावनाओं तथा भारतीय संविधान के निर्माता परम पूज्य बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की विरासत से जुड़ा हुआ है।एआई निर्मित सांकेतिक चित्र
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नई दिल्ली- हरियाणा सरकार द्वारा डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम से चल रही ई-लाइब्रेरी को 'अटल लाइब्रेरी' नाम देने के फैसले के खिलाफ राज्य ही नहीं देश भर में बहुजन समाज का तीखा विरोध जारी है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ई-लाइब्रेरी पहल के तहत हरियाणा में 330 से अधिक स्थानों पर ई-लाइब्रेरी स्थापित की गई थीं।

इन केंद्रों में छात्रों को डिजिटल लर्निंग संसाधन, इंटरनेट, कंप्यूटर, रीडिंग स्पेस और शैक्षिक सामग्री उपलब्ध कराई जाती है। ये केंद्र ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, उच्च शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करने में मदद कर रहे थे।

सरकार के हालिया ऐलान के अनुसार इन लाइब्रेरी का नाम बदलकर 'अटल लाइब्रेरी' किया जाएगा। इस फैसले ने राज्य में व्यापक आक्रोश पैदा कर दिया है। आपको बता दें, अंबेडकर का पुस्तकों के प्रति प्रेम अद्वितीय था। उनका मानना था कि ज्ञान ही मुक्ति का मार्ग है। अपने जीवनकाल में उन्होंने दुनिया का सबसे बड़ा निजी पुस्तकालय (करीब 50 हजार से अधिक पुस्तकें) बनाया और अपना अधिकांश वेतन व संपत्ति किताबों पर ही खर्च कर दी।

बहुजन समुदाय का मानना है कि डॉ. अंबेडकर शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली हथियार मानते थे। उनके नाम पर स्थापित संस्थाओं का नाम बदलना उनकी विरासत को कमजोर करने की कोशिश है। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि विकास के नाम पर इतिहास को मिटाने की कोशिश स्वीकार्य नहीं है।

पिछले सप्ताह पूर्व केंद्रीय मंत्री और सिरसा सांसद कुमारी शैलजा ने जिंद के अम्बेडकर चौक, रानी तालाब के पास प्रदर्शनकारियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि "नाम बदलने से विकास नहीं होता और महान नेताओं के योगदान को इतिहास से मिटाया नहीं जा सकता।" शैलजा ने मुख्यमंत्री से अपील की कि फैसले की समीक्षा कर मूल नाम बहाल किया जाए। उन्होंने इसे लाखों लोगों की भावनाओं पर चोट बताते हुए भाजपा सरकार पर निशाना साधा।

12 जून को हिसार के रानी तालाब क्षेत्र में डॉ. आंबेडकर सभा पुस्तकालय प्रबंधन समिति और अनुसूचित जाति समाज के प्रतिनिधियों ने डीसी और एसपी को ज्ञापन सौंपा। उन्होंने मूल नाम यथावत रखने की मांग की। इस दिन बहुजन समाज का बड़ा आंदोलन आयोजित किया गया।

बहुजन समाज पार्टी (BSP) और आजाद समाज पार्टी जैसे संगठनों ने भी विरोध जताया। भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की। कई सामाजिक संगठनों ने ज्ञापन दिए और प्रदर्शन किए। अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर (AIC) ने भी इस मुद्दे को सार्वजनिक ध्यान में लाते हुए कहा कि नाम बदलने से अम्बेडकर की शिक्षा और सामाजिक समानता की विरासत प्रभावित होती है।

जिंद में अंबेडकर ई-लाइब्रेरी का नाम बदलने को लेकर विरोध करते अम्बेडकरवादी
जिंद में अंबेडकर ई-लाइब्रेरी का नाम बदलने को लेकर विरोध करते अम्बेडकरवादी

सांसद आज़ाद ने अपने पत्र में लिखा, " डॉ. बी. आर. अंबेडकर लाइब्रेरी का नाम परिवर्तित कर "अटत पुस्तकालय" किए जाने का मामला केवल किसी संस्थान के नाम परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों वंचित, शोषित, दलित, पिछड़े एवं बहुजन समाज की भावनाओं तथा भारतीय संविधान के निर्माता परम पूज्य बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की विरासत से जुड़ा हुआ है।

परम पूज्य बाबा साहेब के नाम पर हरियाणा के सैकड़ों गांवों में ई-लाइब्रेरी स्थापित हैं। इन संस्थानों का उद्देश्य शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक चेतना का प्रसार करना है। बाबा साहेब के नाम पर स्थापित ई-लाइब्रेरी का नाम परिवर्तित किया जाना न केवल करोड़ों लोगों की भावनाओं को आहत करने वाला है, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता ओर संवैधानिक सम्मान की भावना के भी विपरीत है। बाबा साहेब किसी एक समाज के नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र की साझा विरासत हैं। उनके नाम से जुड़े संस्थानों का सम्मान बनाए रखना संविधान ओर तोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सम्मान का विषय है।"

अद्भूत था बाबा साहब का पुस्तक प्रेम

अंबेडकर का पुस्तकों के प्रति प्रेम अद्वितीय था। उनका मानना था कि ज्ञान ही मुक्ति का मार्ग है। अपने जीवनकाल में उन्होंने दुनिया का सबसे बड़ा निजी पुस्तकालय बनाया जिसमे 50,000 से अधिक पुस्तकें थी और अपना अधिकांश वेतन व संपत्ति किताबों पर ही खर्च कर दी।

1917 में अंबेडकर लंदन से बॉम्बे लौटे और फिर बड़ौदा चले गए ताकि महाराज सयाजीराव के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर सकें, क्योंकि सयाजीराव ने उन्हें कोलंबिया यूनिवर्सिटी और LSE में पढ़ने के लिए लोन दिया था। न्यूयॉर्क और लंदन में चार साल तक अंबेडकर ने किताबें जमा कीं। बायोग्राफर धनंजय कीर के अनुसार, अंबेडकर ने अकेले न्यूयॉर्क में दो हज़ार से ज़्यादा दुर्लभ किताबें खरीदीं।

जब अंबेडकर S.S. कैसर-ए-हिंद के रास्ते बॉम्बे पहुँचे, लेकिन उनकी किताबें और दूसरा सामान ले जा रहा दूसरा स्टीमर एक जर्मन सबमरीन से टॉरपीडो होकर डूब गया था। पहुँचने पर, अंबेडकर के पास घर के खर्चे उठाने के लिए भी बहुत कम पैसे थे, बड़ौदा तक का रेल किराया तो दूर की बात है। इस समय, उनकी किताबों का खो जाना अजीब तरह से मददगार साबित हुआ। क्योंकि उन्होंने अपनी किताबों का इंश्योरेंस करवाया था, इसलिए मेसर्स थॉमस कुक एंड कंपनी ने उन्हें इंश्योरेंस के पैसे भेजे, और इससे उन्होंने घर के खर्चे पूरे किए और बड़ौदा पहुँचने के लिए पैसे का इंतज़ाम किया।

मुंबई स्थित उनके घर 'राजगृह' में एक विशाल पुस्तकालय था। वे किताबों के इतने शौकीन थे कि भूखे रह सकते थे, लेकिन किताबों के बिना नहीं। उनके पास कानून, राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और धर्म जैसे विभिन्न विषयों की दुर्लभ पुस्तकें थीं। उन्होंने अपनी आय का कम से कम 10% हिस्सा किताबों पर खर्च करने की सलाह दी थी।

वे अक्सर पढ़ते-पढ़ते सो जाते थे। उनके निजी सहायक के अनुसार, पढ़ते समय उनके हाथ में हमेशा पेंसिल होती थी और वे महत्वपूर्ण पंक्तियों व पैराग्राफ को रेखांकित करते या अपनी नोटबुक में नोट करते थे।

अंबेडकर का पुस्तकों के प्रति प्रेम अद्वितीय था।
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