
नई दिल्ली- आईआईएम बेंगलुरु के पूर्व निदेशक प्रोफेसर ऋषिकेश टी. कृष्णन को अशोका यूनिवर्सिटी का नया कुलपति (वाइस-चांसलर) नियुक्त किए जाने के फैसले ने बहुजन समुदाय में व्यापक आक्रोश और तीखी प्रतिक्रिया पैदा की है। यह नियुक्ति उस समय हुई है जब प्रोफेसर कृष्णन के खिलाफ आईआईएम-बेंगलुरु में अपने कार्यकाल के दौरान दलित प्रोफेसर के साथ जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के गंभीर आरोप दर्ज हैं।
अशोका यूनिवर्सिटी ने हाल ही में यह घोषणा की कि प्रोफेसर कृष्णन 1 अगस्त को प्रोफेसर सोमक रायचौधरी का कार्यभार संभालेंगे और प्रारंभिक तौर पर तीन साल के कार्यकाल के लिए कुलपति पद पर रहेंगे। विश्वविद्यालय ने अपने बयान में प्रोफेसर कृष्णन को एक सम्मानित शैक्षणिक नेता, आईआईटी कानपुर और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र तथा नवाचार और प्रबंधन शिक्षा के विशेषज्ञ के रूप में रेखांकित किया है। हालांकि, इस फैसले ने शैक्षणिक और सामाजिक न्याय के क्षेत्रों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
बेंगलुरु के माइको लेआउट पुलिस स्टेशन में प्रोफेसर ऋषिकेश टी. कृष्णन और आईआईएम-बी के सात अन्य शिक्षकों के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर संख्या 0467/2024) दर्ज है जिसपर कर्नाटक हाईकोर्ट से स्टे के बाद मामला न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है।
यह विवाद आईआईएम बेंगलुरु में प्रोफेसर कृष्णन के निदेशक कार्यकाल के दौरान हुई एक घटना से जुड़ा है। अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाले एसोसिएट प्रोफेसर गोपाल दास ने निदेशक और वरिष्ठ शिक्षकों सहित 8 जनों पर सार्वजनिक अपमान, बहिष्कार, अवसरों से वंचित करने और जातिगत उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी।
इस मामले में निदेशालय सिविल राइट्स एन्फोर्समेंट (डीसीआरई) की जांच में आरोपों को सही पाए जाने के साक्ष्य मिलने की बात कही गई है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रोफेसर कृष्णन ने कथित तौर पर संस्थान के भीतर एक मास ईमेल के माध्यम से प्रोफेसर दास की जाति का खुलासा किया, जिसे अत्यंत अपमानजनक करार दिया गया। इन आरोपों के आधार पर कर्नाटक के सामाजिक कल्याण विभाग ने पुलिस कार्रवाई के निर्देश दिए।
परिणामस्वरूप, 20 दिसंबर, 2024 को बेंगलुरु के माइको लेआउट पुलिस स्टेशन में प्रोफेसर ऋषिकेश टी. कृष्णन और आईआईएम-बी के सात अन्य शिक्षकों के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर संख्या 0467/2024) दर्ज की गई। यह एफआईआर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(र) और 3(1)(स) (किसी एससी/एसटी समुदाय के सदस्य का अपमान करना, धमकाना या जाति से संबोधित करके गाली देना) और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की संबंधित धाराओं के तहत दर्ज की गई है, जिसमें आपराधिक धमकी के प्रावधान भी शामिल हैं।
भारत में आईआईएम की स्थापना के बाद से संभवतया यह पहली बार हुआ कि किसी कार्यरत निदेशक पर जाति-आधारित भेदभाव का आरोप लगाया गया और एक संकाय सदस्य के खिलाफ जातिगत भेदभाव करने के लिए नामजद शिकायत दर्ज किया गया।
यह मामला, जिसमें रिट याचिका संख्या 19036/2024 और आपराधिक याचिका संख्या 14410/2024 जैसी संबंधित कार्यवाहियाँ शामिल हैं, वर्तमान में कर्नाटक उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। उच्च न्यायालय ने प्रोफेसर कृष्णन और अन्य आरोपियों के खिलाफ एफआईआर की कार्यवाही, जांच और कुछ समानांतर प्रशासनिक जांचों पर रोक (स्टे) लगा दी है। फिलहाल, इस मामले में कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और यह न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है।
इस नियुक्ति का सबसे जोरदार विरोध डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर नेशनल एसोसिएशन ऑफ इंजीनियर्स (BANAE) और ऑल इंडिया ओबीसी स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एआईओबीसीएसए) ने किया है। BANAE के राष्ट्रीय अध्यक्ष नागसेन सोनारे द्वारा भेजे एक पत्र में अशोका यूनिवर्सिटी के सदस्यों को प्रोफेसर कृष्णन के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले का ब्यौरा देते हुए औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई गई है।
एआईओबीसीएसए के अध्यक्ष किरण गौड़ ने भी इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा, "अशोका यूनिवर्सिटी आईआईएम बेंगलुरु के पूर्व निदेशक को, जो जातिगत भेदभाव के मामले में मुख्य आरोपी हैं, कैसे अपना कुलपति नियुक्त कर सकती है? उनके कार्यकाल में कथित तौर पर युवा दलित प्रोफेसर के करियर को नुक्सान पहुंचाया गया।"
अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर के सदस्य और वरिष्ठ भीम-आंबेडकरवादी विचारक अनिल एच. वागड़े ने भी आरोप लगाया कि तत्कालीन निदेशक और आईआईएम प्रशासन ने व्यवस्थित रूप से प्रोफेसर दास के पढ़ाने के अवसरों को सीमित कर दिया। उन्होंने बताया कि संस्थान ने यह दावा तो किया कि एमबीए इलेक्टिव विषय छात्रों की पसंद पर निर्भर हैं, लेकिन वास्तव में प्रोफेसर दास को उनके कोर्स प्रभावी ढंग से चलाने के लिए आवश्यक शिक्षण सहायक जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं दी गईं। उनके इलेक्टिव कोर्स को अक्सर एक-दो सेमेस्टर के बाद ही बंद कर दिया जाता था और उन्हें कोई कोर कोर्स भी नहीं सौंपा गया।
इससे भी अधिक अपमानजनक बात यह रही कि कथित तौर पर एमबीए कोर्स बिडिंग प्रक्रिया के दौरान प्रोफेसर दास का नाम छुपा दिया गया था। वागड़े के अनुसार, प्रोफेसर दास को संस्थान की प्रमुख गतिविधियों और समितियों से भी बाहर रखा गया। यह सब उस समय हुआ जब प्रोफेसर दास को अपने पढ़ाने के लिए असाधारण सकारात्मक फीडबैक मिल रहा था और वे उल्लेखनीय शोध एवं प्रकाशन कर रहे थे, लेकिन पीएचडी शिक्षण जैसे महत्वपूर्ण अवसरों से उन्हें वंचित रखा गया, जिसकी प्रक्रिया पर आरोपी व्यक्तियों का नियंत्रण था।
आलोचकों का तर्क है कि अशोका यूनिवर्सिटी ने प्रोफेसर कृष्णन की नियुक्ति करते समय इन गंभीर आरोपों और युवा एससी, एसटी व ओबीसी शिक्षकों के करियर पर पड़ने वाले उनके प्रभाव को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है। इस घटनाक्रम ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जवाबदेही, विविधता, समावेशिता और जातिगत भेदभाव की शिकायतों को संभालने के तरीके पर गहन बहस को जन्म दे दिया है। बहुजन समुदाय के लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या एक संस्थान, जो खुद को विश्व स्तरीय कहता है, एक ऐसे व्यक्ति को अपना नेतृत्व सौंप सकता है, जिसके खिलाफ जातिगत उत्पीड़न का मामला दर्ज है और जिसने प्रताड़ित शिक्षक को न्याय नहीं दिया।
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