
वर्धा- महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में छात्रों एवं शोधार्थियों का गांधीवादी सत्याग्रह रविवार को पांचवे दिन भी जारी है। आंदोलनरत छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर आरोप लगाया है कि वह शैक्षणिक मांगों पर वैधानिक संवाद करने के बजाय दमन, भय और ताड़ना की नीति अपनाकर लोकतांत्रिक आंदोलन को कुचलने का प्रयास कर रहा है।
छात्रों का कहना है कि वर्ष 2022 से वे लगातार पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने, स्त्री अध्ययन विभाग एवं फिल्म अध्ययन विभाग को वर्धा मुख्य परिसर में पुनः स्थापित करने तथा विभिन्न विषयों में बंद डिप्लोमा कार्यक्रमों को पुनः शुरू करने की मांग कर रहे हैं। इसके बावजूद प्रशासन ने न तो कोई ठोस निर्णय लिया, न कोई समयबद्ध कार्ययोजना प्रस्तुत की और न ही छात्रों से सार्थक संवाद किया। जब सभी संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण माध्यम निष्फल हो गए, तब छात्रों ने महात्मा गांधी की कर्मभूमि पर सत्याग्रह का मार्ग अपनाया।
दुखद है कि विश्वविद्यालय प्रशासन आज भी छात्रों की आवाज सुनने के बजाय उसे दबाने में अधिक सक्रिय दिखाई दे रहा है।
छात्रों के अनुसार अब तक आंदोलन से जुड़े लगभग आधा दर्जन छात्रों को विश्वविद्यालय ने नोटिस जारी कर दिए हैं। छात्रों का आरोप है कि ये नोटिस समाधान के बजाय भय पैदा करने का माध्यम बनाए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय में छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध का जवाब नोटिस, धमकी और प्रशासनिक दबाव से दिया जाना संस्था की लोकतांत्रिक संस्कृति पर गंभीर सवाल है। छात्रों ने आरोप लगाया कि आंदोलन को कमजोर करने के उद्देश्य से प्रशासनिक भवन के सभी प्रवेश द्वार बंद कर दिए गए तथा आंदोलनरत छात्रों को अलग-थलग करने का प्रयास किया गया।
छात्रों का सवाल है , “यदि प्रशासन को अपने निर्णय पर विश्वास है, तो उसे संवाद से क्यों भय है? संवाद से बचना स्वयं प्रशासनिक विफलता का प्रमाण है।”
छात्रों ने यह भी आरोप लगाया कि प्रो. अवधेश कुमार, जिनकी अध्यक्षता में पूर्व में भी अनेक छात्र-विरोधी निर्णय लिए जाने के आरोप लगते रहे हैं, आज पुलिस अधीक्षक, वर्धा से मिलने गए। छात्रों ने आशंका व्यक्त की है कि यदि शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक आंदोलन को आपराधिक रंग देकर छात्रों के विरुद्ध झूठे या दुर्भावनापूर्ण मुकदमे दर्ज कराने का प्रयास किया गया तो यह सत्ता के दुरुपयोग का गंभीर उदाहरण होगा।
छात्रों ने कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना है कि सत्याग्रह का चौथा दिन बीत जाने के बावजूद कुलपति ने आंदोलनरत छात्रों से मिलने, उनकी मांगें सुनने अथवा समाधान की दिशा में कोई सार्वजनिक पहल नहीं की।
एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति यदि छात्रों से संवाद करने के बजाय प्रशासनिक कार्रवाई को प्राथमिकता देती हैं, तो यह संस्थागत उत्तरदायित्व से विमुख होने का संकेत है।
आंदोलनरत छात्रों ने स्पष्ट कहा कि विश्वविद्यालय किसी कुलपति, अधिकारी या प्रशासनिक समूह की निजी जागीर नहीं है। यह संविधान द्वारा संचालित एक सार्वजनिक शैक्षणिक संस्था है, जिसका संचालन छात्रों के हित, शैक्षणिक विकास, विधि के शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए।
छात्रों ने कहा, “हमें न नोटिस से डराया जा सकता है, न पुलिस की धमकी से झुकाया जा सकता है। हमारा संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि शिक्षा, शैक्षणिक अधिकार और विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक चरित्र की रक्षा के लिए है।”
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