
प्रयागराज- डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, प्रयागराज में छात्रों द्वारा लगाए गए कथित जातिगत अपमान और भेदभाव के आरोपों की जांच न्यायिक अधिकारियों से कराने के एकल पीठ के आदेश के खिलाफ दायर विशेष अपील पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रथमदृष्टया कहा है कि जब विश्वविद्यालय में समान अवसर प्रकोष्ठ मौजूद था और शिकायतकर्ताओं ने स्वयं इसी प्रकोष्ठ के माध्यम से जांच की मांग की थी, तो जांच न्यायिक अधिकारियों से कराने की जरूरत नहीं थी। जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस कुनाल रवि सिंह की खंडपीठ ने रिट याचिका संख्या 37012/2026 की आगे की कार्यवाही पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। अदालत ने मामले को 29 सितंबर को फिर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
यह मामला एनएलयू के दो छात्रों की ओर से दाखिल रिट याचिका से जुड़ा है जिसमे एक पीएचडी शोधार्थी हैं और दूसरा बीएएलएलबी (ओनर्स) पांचवे सेमेस्टर का छात्र है। दोनों ने हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट ऑफ़ लॉ और बॉयज होस्टल के वार्डन डॉ. दीपक शर्मा के विरुद्ध जातिगत प्रताड़ना के आरोप लगाये हैं। याचिकाकर्ता छात्रों की मुख्य शिकायत डॉ. दीपक शर्मा द्वारा अपने प्रशासनिक पद के दुरुपयोग, शैक्षणिक पक्षपात और उत्पीड़न से जुड़ी है। छात्रों का आरोप है कि उन्होंने 20 अगस्त, 25 अगस्त, 1 सितंबर और 4 सितंबर को विश्वविद्यालय प्रशासन के समक्ष लिखित शिकायतें दर्ज कराई थीं, परंतु उन पर कोई निष्पक्ष जांच नहीं की गई।
शिकायत के अनुसार, डॉ. दीपक शर्मा ने हॉस्टल वार्डन, रिसर्च सेल समन्वयक और शिक्षक के रूप में अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए पहले याचिकाकर्ता की सिनाप्सिस पर प्रतिकूल टिप्पणी दी और दूसरे याचिकाकर्ता के शैक्षणिक मूल्यांकन में पक्षपात किया। इसके अतिरिक्त, छात्रों ने 25 अगस्त और 1 सितंबर को बॉयज हॉस्टल में घटी घटनाओं के संदर्भ में सीसीटीवी फुटेज, एंट्री रजिस्टर और निरीक्षण रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग की है। साथ ही, उन्होंने किसी भी प्रतिशोधात्मक कार्रवाई या अकादमिक नुकसान से सुरक्षा दिए जाने और यदि शिकायत में संज्ञेय अपराध प्रकट होता है तो यूजीसी विनियम 2026 (UGC Regulations, 2026) के तहत तत्काल पुलिस को सूचित करने का आग्रह किया है।
दोनों याचिकाकर्ताओं ने विश्वविद्यालय में अपनी शिकायतों पर निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से कार्रवाई किए जाने की मांग की थी। उन्होंने आरोपों की जांच के लिए विश्वविद्यालय की समान अवसर व्यवस्था का इस्तेमाल करने की मांग की थी, लेकिन जिस व्यक्ति के खिलाफ शिकायतें थीं, उसे जांच की प्रक्रिया से अलग रखने की बात कही थी।
याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि शिकायतों पर विधिवत गठित समान अवसर समिति के माध्यम से जांच की जाए और उस व्यक्ति को जांच से अलग रखा जाए, जिसके खिलाफ शिकायतें की गई थीं।
एकल पीठ के समक्ष दायर याचिका में यह भी मांग की गई थी कि जांच लंबित रहने तक संबंधित व्यक्ति को छात्रों से जुड़े प्रशासनिक, शैक्षणिक मूल्यांकन, शोध और छात्रावास संबंधी अधिकारों से अलग रखा जाए। इसमें छात्रावास अधीक्षक, विभागीय प्रमुख या समन्वयक जैसी भूमिकाओं से संबंधित अधिकारों को हटाने की मांग भी शामिल थी।
याचिकाकर्ताओं ने अपने शैक्षणिक मूल्यांकन और शोध-सार से जुड़े मामलों की भी स्वतंत्र समीक्षा कराने की मांग की थी। उनकी मांग थी कि संबंधित शिक्षक से जुड़े मूल्यांकन को ऐसे विशेषज्ञों से दोबारा जांचा जाए, जिनका शिकायत में शामिल व्यक्ति से कोई प्रत्यक्ष संबंध न हो।
याचिका में यह भी कहा गया था कि शिकायतकर्ताओं के खिलाफ शिकायत करने के कारण किसी प्रकार की प्रतिशोधात्मक या प्रतिकूल शैक्षणिक अथवा छात्रावास संबंधी कार्रवाई न हो।
इसके अलावा याचिकाकर्ताओं ने 25 अगस्त और 1 सितंबर की घटनाओं से संबंधित सीसीटीवी फुटेज, छात्रावास प्रवेश रजिस्टर, निरीक्षण एवं आवागमन रिकॉर्ड, शिकायतों के दस्तावेज, शैक्षणिक मूल्यांकन, शोध-सार से जुड़े रिकॉर्ड, ई-मेल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक तथा भौतिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश देने की मांग की थी।
याचिका में विश्वविद्यालय के समान अवसर केंद्र, समान अवसर समिति, हेल्पलाइन, समान अवसर दल और समान अवसर प्रतिनिधियों को लागू विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के अनुरूप गठित और सक्रिय किए जाने की मांग भी की गई थी।
16 सितंबर को जस्टिस विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने मामले में स्वतंत्र जांच की व्यवस्था की थी। अदालत ने प्रयागराज जिला न्यायालय की लघु वाद अदालत की न्यायाधीश अर्चना सिंह-I और विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अरुण कुमार यादव को मामले की जांच कर रिपोर्ट देने को कहा था।
एकल पीठ ने यह भी निर्देश दिया था कि संबंधित छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं का स्वतंत्र पुनर्मूल्यांकन कराया जाए और शिकायतकर्ता छात्रों को जांच के दौरान किसी प्रतिकूल शैक्षणिक या प्रशासनिक कार्रवाई का सामना न करना पड़े। संबंधित शिक्षक को भी छात्रों के मूल्यांकन तथा अनुशासनात्मक और छात्रावास संबंधी मामलों से अलग रखने के निर्देश दिए गए थे।
इसी आदेश के खिलाफ डॉ. दीपक शर्मा की ओर से विशेष अपील दायर की गई। 23 सितंबर को विशेष अपील पर सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल तिवारी और प्रभाकर अवस्थी ने अधिवक्ता शशांक पांडेय के साथ दलील दी कि जब मामला एकल पीठ के समक्ष था, तब अपीलकर्ता ने नई जांच समिति गठित किए जाने पर कोई सहमति नहीं दी थी।
उनकी ओर से कहा गया कि विश्वविद्यालय में पहले से समान अवसर प्रकोष्ठ मौजूद है और रिट याचिकाकर्ताओं ने भी इसी प्रकोष्ठ से जांच कराने की मांग की थी। उनका कहना था कि केवल संबंधित व्यक्ति को जांच से अलग करके विश्वविद्यालय की निर्धारित व्यवस्था के तहत जांच कराई जा सकती थी और ऐसे में बाहरी न्यायिक अधिकारियों से जांच कराने की आवश्यकता नहीं थी।
विश्वविद्यालय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राहुल अग्रवाल ने अधिवक्ता गौरव त्रिपाठी के साथ अदालत को बताया कि रिट याचिका की सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय ने निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से अदालत द्वारा प्रस्तावित समिति से जांच कराने पर सहमति जताई थी।
वहीं, रिट याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता शिवम अग्रवाल ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कहा कि उनकी मूल मांग विश्वविद्यालय के समान अवसर प्रकोष्ठ के नियमों के अनुसार जांच कराने की थी। हालांकि, जब विश्वविद्यालय ने न्यायिक अधिकारियों से जांच कराने के अदालत के प्रस्ताव पर सहमति जताई तो उन्होंने भी इसका विरोध नहीं किया।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने कहा कि वह प्रथमदृष्टया इस राय में है कि जब विश्वविद्यालय में समान अवसर प्रकोष्ठ उपलब्ध था और छात्रों ने स्वयं इसी व्यवस्था के तहत जांच की मांग की थी, तो न्यायिक अधिकारियों से जांच कराने का आधार स्पष्ट नहीं था।
अदालत ने कहा:
“जब विश्वविद्यालय में समान अवसर प्रकोष्ठ उपलब्ध था और प्रार्थना भी इस आशय की थी कि रिट याचिका के प्रतिवादी संख्या 6 को अलग रखते हुए समान अवसर प्रकोष्ठ स्वयं मामले की जांच करे, तो न्यायिक अधिकारियों से जांच कराने का कोई अवसर नहीं था।”
खंडपीठ ने आगे कहा:
“भले ही आरोप गंभीर प्रकृति के हों, फिर भी विश्वविद्यालय की शक्ति को ऐसे आरोपों की जांच के लिए उचित रूप से गठित समान अवसर प्रकोष्ठ के माध्यम से इस्तेमाल करने से नहीं छीना जाना चाहिए था।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि छात्रों के कल्याण को देखना और उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों से निपटना विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में आता है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी दर्ज किया कि न्यायिक अधिकारियों द्वारा की जा रही जांच की रिपोर्ट 24 सितंबर तक प्रस्तुत की जानी थी।
खंडपीठ ने निर्देश दिया कि विशेष अपील को 29 सितंबर को उचित पीठ के समक्ष नए मामले के रूप में रखा जाए। यदि 24 सितंबर तक जांच रिपोर्ट तैयार हो गई हो तो उसे सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष रखा जाए, ताकि अगली सुनवाई में उसका अवलोकन किया जा सके।
अदालत ने कहा कि चूंकि वह प्रथमदृष्टया इस बात से सहमत है कि विश्वविद्यालय में समान अवसर प्रकोष्ठ उपलब्ध होने के बावजूद न्यायिक अधिकारियों से जांच नहीं कराई जानी चाहिए थी, इसलिए रिट याचिका संख्या 37012/2026 की आगे की कार्यवाही अगली सुनवाई तक स्थगित रहेगी।
आदेश पारित होने के बाद अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल तिवारी ने एकल पीठ के आदेश के पैराग्राफ 17 में दिए गए निर्देशों पर भी रोक लगाने की मांग की।
इस पर खंडपीठ ने कहा कि इस स्तर पर उसने केवल जांच के दायरे और लागू नियमों की समीक्षा की है। इसलिए पैराग्राफ 17 में दिए गए निर्देशों पर रोक लगाने की मांग पर अगली सुनवाई में विचार किया जाएगा। मामला अब 29 सितंबर को फिर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।
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