'TN चुनाव ने दिखाया रास्ता, अब 'सच्चा बदलाव' लाए सरकार': दलित इंजीनियर 'ऑनर किलिंग' मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने दी SI को जमानत, जातिवाद पर की 5 बड़ी टिप्पणियाँ

न्यायालय ने राज्य सरकार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि SC/ST Act जैसे कानून अपेक्षित परिणाम देने में विफल रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि इस कानून के तहत दर्ज होने वाली घटनाएँ दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं। अदालत ने सरकार को निर्देश दिए कि स्कूल स्तर से ही पाठ्यक्रम में बदलाव कर युवा पीढ़ी की मानसिकता बदली जाए।
उच्च न्यायालय ने कहा कि तमिलनाडु के हाल के विधानसभा चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि जनता जाति और समुदाय के बंधनों से ऊपर उठकर भी वोट कर सकती है, और अब समय आ गया है कि राज्य 'सच्चा बदलाव' लाने की जिम्मेदारी ले।
अदालत ने यह खुलकर स्वीकार किया कि जातिवाद सिर्फ आम लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका को भी प्रभावित करता है। ग्राफिक- आसिफ निसार/ द मूकनायक
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मदुरै – मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै बेंच ने एक दलित आईटी इंजीनियर की 'ऑनर किलिंग' से जुड़े बहुचर्चित मामले में सुनवाई के दौरान एक पुलिस उपनिरीक्षक (Sub-Inspector) को जमानत देते हुए समाज में व्याप्त जातिवाद पर करारा प्रहार किया। उच्च न्यायालय ने कहा कि तमिलनाडु के हाल के विधानसभा चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि जनता जाति और समुदाय के बंधनों से ऊपर उठकर भी वोट कर सकती है, और अब समय आ गया है कि राज्य 'सच्चा बदलाव' लाने की जिम्मेदारी ले।

जस्टिस बी. पुगलेंधी की अगुवाई वाली पीठ ने यह टिप्पणी सरावणन नामक पुलिस उपनिरीक्षक की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए की। सरावणन पर आरोप है कि उसने अपने बेटे को हत्या के बाद शरण दी, जिसने एक दलित युवक की निर्मम हत्या कर दी थी क्योंकि वह उसकी बहन यानी सरावणन की बेटी से प्रेम करता था।

क्या है पूरा मामला?

कविन (मृतक) एक आईटी इंजीनियर था और दलित समुदाय से आता था। आरोपी सरावणन तमिलनाडु पुलिस में उपनिरीक्षक है और उसकी बेटी कविन के साथ एक ही स्कूल में पढ़ती थी। दोनों के बीच प्रेम संबंध थे। लडकी के घरवालों को यह बात पसंद नहीं थी। 27 जुलाई 2025 को कविन अपने दादा के इलाज के लिए तिरुनेलवेली आया था। उसने सरावणन के बेटे सुरिजीत (आरोपी नंबर 1) को अपने आने की सूचना दी।

सुरिजीत ने कविन को बाइक पर बिठाया और लक्ष्मीपुरम नामक स्थान पर ले गया। दोपहर लगभग 2:17 बजे दोनों के बीच झगड़ा हुआ। आरोप है कि सुरिजीत ने कविन की आँखों में मिर्च पाउडर डाल दिया और फिर उस पर तेजधार हथियार (अरुवाल) से हमला कर दिया।

कविन भागने की कोशिश करता रहा, लेकिन उसका पीछा करके अंबाल अस्पताल के पास उसकी हत्या कर दी गई। मृतक के शरीर पर कुल 19 घाव पाए गए। हत्या के ठीक एक मिनट बाद सुरिजीत ने अपने पिता सरावणन को फोन करके घटना की जानकारी दी।

पुलिस का कहना है कि सरावणन ने अपनी पत्नी (आरोपी नंबर 3) को घटना के बारे में बताया और अपने बेटे को छिपने में मदद करने के लिए रिश्तेदारों (आरोपी नंबर 4) से संपर्क किया।

सरावणन ने खुद घटनास्थल का दौरा किया और वहाँ मौजूद हेड कांस्टेबल को गलत सूचना दी कि मृतक किसी दूसरे समुदाय से आता है। आरोप है कि उसने अपने बेटे के लिए फर्जी नंबर प्लेट वाली बाइक खरीदी और सबूतों को नष्ट करने की साजिश रची। सारावणन और उसके बेटे को 11 अगस्त 2025 को गिरफ्तार किया गया। तब से वे न्यायिक हिरासत में थे।

उच्च न्यायालय ने कहा कि तमिलनाडु के हाल के विधानसभा चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि जनता जाति और समुदाय के बंधनों से ऊपर उठकर भी वोट कर सकती है, और अब समय आ गया है कि राज्य 'सच्चा बदलाव' लाने की जिम्मेदारी ले।
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कोर्ट ने क्यों दी ज़मानत

सारावणन का दावा है कि वह निर्दोष है और उसने ही पुलिस को अपने बेटे के बारे में जानकारी दी थी। उसने यह भी कहा कि उसने अपने बेटे को पुलिस के हवाले कर दिया था, जिसकी खबर अखबारों में भी छपी थी। उसकी दलील है कि हत्या में उसकी कोई सक्रिय भूमिका नहीं थी और न ही उसने कोई सबूत नष्ट किया।

न्यायालय ने निम्नलिखित कारणों से सारावणन को जमानत देने का फैसला किया:

  1. सरावणन पिछले 10 महीने (11 अगस्त 2025 से) जेल में था।

  2. जांच पूरी हो चुकी थी और चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल कर दिया गया था। मामला SC.No.120/2025 के रूप में विचाराधीन है।

  3. कोर्ट ने माना कि "घटना से पहले सारावणन और मृतक या पीड़ित परिवार के बीच कोई कॉल नहीं हुई थी।" ऐसे में उसकी हत्या में सक्रिय भूमिका साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं थी। कोर्ट ने कहा, "अगर यह एक साधारण हत्या का मामला होता, तो अब तक उसे जमानत मिल चुकी होती।" कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी को लंबे समय तक 'सजा से पहले की कैद' में रखना उचित नहीं है। सरावणन ने उच्च न्यायालय में एक याचिका (Crl OP(MD)No.995/2026) दायर कर अपने खिलाफ कार्यवाही को रद्द करने का अनुरोध किया था, जिस पर अदालत ने 29 अप्रैल 2026 को अंतरिम रोक लगा दी थी।

हालांकि, कोर्ट ने कड़ी शर्तों के साथ जमानत दी:

सारावणन को 1 लाख रुपये के मुचलके और दो जमानतदारों (एक-एक लाख के) के साथ रिहा किया जाएगा। उसे कोयंबटूर में रहना होगा और दिन में दो बार (सुबह 10:30 बजे और शाम 5:00 बजे) बी2 आर.एस.पुरम पुलिस स्टेशन में हाजिरी देनी होगी। वह घटना स्थल (तिरुनेलवेली) के आसपास नहीं जाएगा और किसी भी गवाह को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करेगा।अगर वह किसी शर्त का उल्लंघन करता है, तो उसकी जमानत रद्द कर दी जाएगी।

तमिलनाडु राज्य के हाल के विधानसभा चुनाव परिणामों ने साबित कर दिया है कि लोग जाति या समुदाय देखे बिना वोट कर सकते हैं। एक सरकार ने जाति के कारकों को नकारते हुए गठन किया है। 
- मद्रास हाईकोर्ट

जातिवाद पर मद्रास हाईकोर्ट की 5 बड़ी टिप्पणियाँ

यह फैसला सिर्फ जमानत देने भर तक सीमित नहीं रहा। जस्टिस पुगलेंधी ने इसे समाज में फैली 'जाति की बीमारी' पर एक व्यापक टिप्पणी करने का मंच बनाया। उनकी कुछ अहम टिप्पणियाँ इस प्रकार हैं:

"हम न्यायाधीश भी जातिवाद से अछूते नहीं"

अदालत ने खुलकर स्वीकार किया कि जातिवाद सिर्फ आम लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका को भी प्रभावित करता है। कोर्ट ने कहा:

"हर व्यक्ति, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली या विशेषाधिकार प्राप्त क्यों न हो, किसी न किसी रूप में जातिवाद का अनुभव करता है। यहाँ तक कि हम न्यायाधीश भी इससे अछूते नहीं हैं। हमारे आदेशों को जाति के आधार पर प्रेरणाएँ दे दी जाती हैं, भले ही मामलों का निर्णय योग्यता के आधार पर किया जा रहा हो।"

तमिलनाडु के तिरुनेलवेली में IT प्रोफेशनल कविन की 27 जुलाई 2025 को  दिनदहाड़े हत्या उसकी महिला मित्र के भाई ने की थी।जाति को विवाद का कारण बताया जाता है।
तमिलनाडु के तिरुनेलवेली में IT प्रोफेशनल कविन की 27 जुलाई 2025 को दिनदहाड़े हत्या उसकी महिला मित्र के भाई ने की थी।जाति को विवाद का कारण बताया जाता है।

"ऑनर किलिंग में कोई सम्मान नहीं, यह शर्मनाक कृत्य है"

कोर्ट ने ऑनर किलिंग को 'जातिवाद का चरम रूप' बताते हुए कहा कि इसे 'सम्मान' की संज्ञा देना गलत है।

"सम्मान हत्या/ऑनर किलिंग जातिवाद का चरम प्रतिबिंब है। जातिवाद राष्ट्र के लिए अभिशाप है। प्रकृति किसी जाति को नहीं मानती। सूरज सबको रोशनी देता है, बारिश सब पर होती है, हवा सबके लिए है। जब समाज जाति की कृत्रिम बाधाओं को पार करेगा, तभी वह इस सच्चाई को जान पाएगा कि 'ऑनर किलिंग' में कोई 'सम्मान' नहीं होता, बल्कि यह एक शर्मनाक कृत्य है।"

तमिलनाडु चुनावों की सराहना – "जाति के बिना भी वोट संभव"

अपने फैसले में न्यायालय ने तमिलनाडु के मतदाताओं और हाल के विधानसभा चुनाव परिणामों की सराहना करते हुए एक ऐतिहासिक टिप्पणी की:

"तमिलनाडु राज्य के हाल के विधानसभा चुनाव परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि लोग वास्तव में उम्मीदवारों की जाति या समुदाय पर विचार किए बिना वोट करने के लिए आश्वस्त हो सकते हैं। एक सरकार ने जाति के कारकों को काफी हद तक नकारते हुए गठन किया है। राज्य 'सच्चा बदलाव' तभी दावा कर सकता है जब लोगों की मानसिकता भी बदले।"

सैनिकों और देशभक्ति का उदाहरण

कोर्ट ने समाज को एकजुट होने का संदेश देते हुए सीमा पर तैनात सैनिकों का उदाहरण दिया:

"सीमा पर तैनात सैनिक, चाहे वह किसी भी जाति, समुदाय, भाषा या क्षेत्र से आते हों, देश की सुरक्षा करते हैं। जब वे दुश्मन की गोलियों का सामना करते हैं और मातृभूमि की रक्षा में अपना बलिदान देते हैं, तो उनका खून और उनकी देशभक्ति जाति का मोहर नहीं लगाती। अगर रक्षक एकजुट हो सकते हैं, तो उनके उदाहरण से हर नागरिक को प्रेरणा लेनी चाहिए।"

राज्य सरकार को निर्देश: स्कूलों से शुरू करो बदलाव

न्यायालय ने राज्य सरकार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि SC/ST Act जैसे कानून अपेक्षित परिणाम देने में विफल रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि इस कानून के तहत दर्ज होने वाली घटनाएँ दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं। अदालत ने सरकार से निम्नलिखित माँगें कीं:

  1. स्कूल स्तर से ही पाठ्यक्रम में बदलाव कर युवा पीढ़ी की मानसिकता बदली जाए।

  2. जस्टिस के. चंद्रू (सेवानिवृत्त) की समिति की सिफारिशों को पूरी तरह से लागू किया जाए, जो स्कूलों में जातिवाद को खत्म करने और सामाजिक सद्भाव सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई थी।

  3. राजनीतिक दलों को जाति के आधार पर वोट बैंक साधने से बचना चाहिए, क्योंकि वे इस सामाजिक बुराई को बढ़ावा दे रहे हैं।

उच्च न्यायालय ने कहा कि तमिलनाडु के हाल के विधानसभा चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि जनता जाति और समुदाय के बंधनों से ऊपर उठकर भी वोट कर सकती है, और अब समय आ गया है कि राज्य 'सच्चा बदलाव' लाने की जिम्मेदारी ले।
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उच्च न्यायालय ने कहा कि तमिलनाडु के हाल के विधानसभा चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि जनता जाति और समुदाय के बंधनों से ऊपर उठकर भी वोट कर सकती है, और अब समय आ गया है कि राज्य 'सच्चा बदलाव' लाने की जिम्मेदारी ले।
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उच्च न्यायालय ने कहा कि तमिलनाडु के हाल के विधानसभा चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि जनता जाति और समुदाय के बंधनों से ऊपर उठकर भी वोट कर सकती है, और अब समय आ गया है कि राज्य 'सच्चा बदलाव' लाने की जिम्मेदारी ले।
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