
नई दिल्ली- देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) में पढ़ाने वाले प्रोफेसरों का सामाजिक स्वरूप क्या है? क्या ये संस्थान भारत की सामाजिक विविधता को दर्शाते हैं? आरजेडी प्रवक्ता कंचना यादव द्वारा प्रस्तुत एक विश्लेषण में दावा किया गया है कि आईआईटी में आरक्षण के नियमों की अनदेखी की जा रही है और पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व न के बराबर है।
यह विश्लेषण पूरी तरह से आरटीआई के माध्यम से प्राप्त सरकारी आंकड़ों पर आधारित है। ऑल इंडिया ओबीसी स्टूडेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष किरण कुमार द्वारा 2024 में पूछे गए आरटीआई के जवाबों में देशभर के 18 आईआईटी ने फैकल्टी पदों से जुड़े चौंकाने वाले आंकड़े उपलब्ध कराए हैं।
आरटीआई में तीन बुनियादी सवाल पूछे गए थे: संस्थानों में कुल स्वीकृत फैकल्टी पद कितने हैं, उनमें से श्रेणीवार (जनरल/यूआर, ओबीसी, एससी, एसटी) कितने पद भरे हुए हैं और कितने रिक्त हैं। प्राप्त जानकारियों के अनुसार, अधिकांश आईआईटी ने या तो अधूरा डेटा दिया या फिर उसे साझा करने से ही इनकार कर दिया।
विश्लेषण में शामिल आईआईटी दिल्ली, खड़गपुर, कानपुर, रुड़की, बीएचयू, गुवाहाटी, हैदराबाद, गांधीनगर, रोपड़, पलक्कड़, मंडी, जोधपुर, भुवनेश्वर, इंदौर, तिरुपति, धारवाड़, गोवा और पटना में एक समान पैटर्न देखने को मिला।
संविधान द्वारा अपेक्षित प्रतिनिधित्व (ओबीसी-27%, एससी-15%, एसटी-7.5%) की तुलना में आईआईटी की वर्तमान स्थिति इस प्रकार है:
आईआईटी पालाक्काड: कुल 161 फैकल्टी में जनरल के 121 (75.15%), ओबीसी 24 (14.9%), एससी 15 (9.31%) और एसटी सिर्फ 1 (0.62%)। प्रोफेसर पद पर एक भी एससी या एसटी नहीं है।
आईआईटी बीएचयू (वाराणसी): कुल 344 फैकल्टी में जनरल 79.36%, ओबीसी 11.63%, एससी 7.85% और एसटी मात्र 1.16%। 608 में से 260 पद रिक्त हैं, लेकिन यह नहीं बताया गया कि किस श्रेणी के पद खाली हैं।
आईआईटी खड़गपुर: 775 फैकल्टी में जनरल का प्रतिनिधित्व 91.22% है, जबकि ओबीसी महज 5.55%, एससी 2.71% और एसटी 0.26% है। 1600 स्वीकृत पदों में से 825 रिक्त हैं, जिनकी श्रेणी नहीं बताई गई।
आईआईटी गांधीनगर: 135 फैकल्टी में जनरल 85.93%, ओबीसी 5.93%, एससी 5.91% और एसटी 2.96%। प्रोफेसर स्तर पर ओबीसी, एससी, एसटी का प्रतिनिधित्व शून्य है।
आईआईटी रोपड़: 177 फैकल्टी में जनरल 78.53%, ओबीसी 14.69%, एससी 5.65% और एसटी 1.69%
आईआईटी पटना: यह एकमात्र आईआईटी है जिसने श्रेणीवार स्वीकृत पदों की जानकारी दी। यहां कुल 390 पदों में से 228 भरे हैं। भरे पदों में ओबीसी 38.16%, एससी 21.49% और एसटी 12.72% हैं, जो अन्य आईआईटी के मुकाबले बेहतर है।
आईआईटी रुड़की: 939 स्वीकृत पदों में से सिर्फ 533 फैकल्टी कार्यरत हैं। संस्थान ने श्रेणीवार कोई डेटा नहीं दिया।
आईआईटी तिरुपति: 114 फैकल्टी में जनरल 69.30%, ओबीसी 18.42%, एससी 8.77% और एसटी 2.63%
आईआईटी मंडी: 175 फैकल्टी में जनरल 81.14%, ओबीसी 11.43%, एससी 5.71% और एसटी 1.71%। प्रोफेसर स्तर पर ओबीसी, एससी और एसटी का प्रतिनिधित्व शून्य है।
आईआईटी भुवनेश्वर: 213 फैकल्टी में जनरल 80.28%, ओबीसी 13.15%, एससी 5.63% और एसटी महज 0.46%
आईआईटी जोधपुर: 244 फैकल्टी में जनरल 79.10%, ओबीसी 13.11%, एससी 6.15% और एसटी 0.82%
आईआईटी दिल्ली: 633 फैकल्टी में जनरल 88.94%, ओबीसी 7.11%, एससी 2.68% और एसटी 1.10%। 1093 स्वीकृत पदों में से 460 रिक्त हैं।
आईआईटी गोवा: 62 फैकल्टी में जनरल 67.74%, ओबीसी 19.35%, एससी 8.06% और एसटी 1.61%
आईआईटी इंदौर: यहां भी श्रेणीवार डेटा मिला। कुल 92 फैकल्टी में जनरल 50%, ओबीसी 32.61%, एससी 15.22% और एसटी 2.17%
आईआईटी गुवाहाटी: 454 फैकल्टी में जनरल 88.11%, ओबीसी 5.07%, एससी 4.84% और एसटी 1.98%
आईआईटी हैदराबाद: 322 फैकल्टी में जनरल 74.84%, ओबीसी 15.84%, एससी 8.07% और एसटी 0.93%
आईआईटी धारवाड़: 93 फैकल्टी में जनरल 72.04%, ओबीसी 17.20%, एससी 5.38% और एसटी 3.27%
आईआईटी कानपुर: 564 फैकल्टी में जनरल 87.41%, ओबीसी 7.80%, एससी 4.26% और एसटी 0.89%। प्रोफेसर पद पर ओबीसी केवल 3, जबकि एससी और एसटी शून्य हैं।
कंचना यादव के विश्लेषण का निष्कर्ष है कि आईआईटी में प्रतिनिधित्व की कमी सबसे ज्यादा प्रोफेसर (सबसे वरिष्ठ) स्तर पर है। एसोसिएट प्रोफेसर स्तर पर भी संख्या बेहद कम है, जबकि असिस्टेंट प्रोफेसर स्तर पर कुछ प्रतिनिधित्व दिखता है। इससे संकेत मिलता है कि नीचे के स्तर पर भले ही आरक्षित वर्ग के लोग पहुंच जाएं, लेकिन प्रमोशन के समय उन्हें रोक दिया जाता है, ताकि वे निर्णय लेने वाले पदों (प्रोफेसर, डीन, एचओडी) तक न पहुंच सकें।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में आरक्षण लागू नहीं हो पा रहा है। ओबीसी का प्रतिनिधित्व 5% से 15% के बीच है, एससी 9% से नीचे है और एसटी अधिकतर जगहों पर 1-2% से भी कम है। विश्लेषण में कहा गया कि यह सिर्फ एक डेटा नहीं, बल्कि एक असहज सच्चाई है कि भारत के इलीट क्लासरूम्स में सामाजिक विविधता सिर्फ दिखावे के लिए है।
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