
मुंबई- अखिल भारतीय स्वतंत्र अनुसूचित जाति संघ (AIISCA) ने साहिल वाकोडे प्रकरण में केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले की भूमिका की कड़ी निंदा की है। संगठन का आरोप है कि आठवले IIT बॉम्बे के निदेशक प्रोफेसर शिरीष बी. केदारे को संरक्षण दे रहे हैं। AIISCA द्वारा 2 नवम्बर को जारी एक स्टेटमेंट में कहा गया कि आठवले ने 20 सितंबर को IIT बॉम्बे के निदेशक से मुलाकात की थी। इस बात को एक महीने से ज़्यादा हो चुका है।
संगठन का कहना है कि मुलाकात के बाद आठवले ने साहिल की मौत के आरोपों में जिनका नाम आया है, उन्हीं केदारे के साथ मुस्कुराते हुए पोज़ देकर तस्वीर भी खिंचवाई। संगठन ने पूछा कि खुद को "पैंथर" कहने वाले और केंद्रीय मंत्री पद पर बैठे आठवले ने क्या संस्थान के निदेशक से सीधे जवाब माँगने का साहस दिखाया, और साहिल की मौत का कारण बनी संस्थागत विफलताओं पर क्या सवाल पूछे।
संगठन के अनुसार, आठवले उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत शिक्षा मंत्रालय और संबंधित सक्षम प्राधिकरणों से ये माँगें कर सकते थे:
निष्पक्ष जाँच पूरी होने तक केदारे और प्रोफेसर सूर्यनारायण दूल्ला का अस्थायी निलंबन
संस्थान की आंतरिक समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करना
संस्थागत जवाबदेही तय करना
समयबद्ध और निष्पक्ष जाँच
AIISCA ने कहा कि इसके बजाय सिर्फ बैठकें करने का आश्वासन, फॉलो-अप की बातें और न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा रखने की अपील दिखाई दी।
संगठन का आरोप यह है कि IIT बॉम्बे के दौरे के बाद एक इंटरव्यू में आठवले ने केदारे और दुल्ला के बताए नैरेटिव को ही दोहराया। उस नैरेटिव के अनुसार साहिल ने नकल की थी, उसे बहुत नरमी से दोबारा ऐसी गलती न करने को कहा गया था, फिर भी उसने आत्महत्या कर ली। AIISCA ने पूछा कि जातिगत भेदभाव और संस्थागत उत्पीड़न की पृष्ठभूमि में किसी छात्र की आत्महत्या को देखने का यह कौन-सा तरीका है। संगठन के अनुसार जिन पर पीड़ित परिवार ने आरोप लगाए हैं, उन्हीं का पक्ष दोहराने के बजाय संस्थान के जातिगत माहौल और संस्थागत विफलताओं पर सवाल पूछना उनकी जिम्मेदारी थी। AIISCA ने यह भी पूछा कि क्या आठवले को उच्च शिक्षा संस्थानों में दलित छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव, बहिष्कार और अपमान पर मौजूद व्यापक शोध की जानकारी नहीं है, और गंभीर संस्थागत समस्या को "जातिगत भेदभाव होने की संभावना है" जैसी राजनीतिक रूप से सुविधाजनक भाषा में क्यों लपेटा जा रहा है।
संगठन ने सवाल उठाया कि आठवले की मुलाकात के बाद भी IIT बॉम्बे के विद्यार्थियों और साहिल के लिए आंदोलन कर रहे AIISCA कार्यकर्ताओं को पुलिस की सख्त कार्रवाई और गिरफ्तारी का सामना क्यों करना पड़ा। उसने पूछा कि इन मुलाकातों का असली नतीजा क्या निकला? संस्थान की जवाबदेही पर कौन-सी ठोस कार्रवाई हुई? एक महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी CID जाँच की माँग पर कोई स्पष्ट सार्वजनिक फैसला क्यों नहीं हुआ? आंतरिक समिति की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
AIISCA ने माना कि केंद्रीय मंत्री के रूप में आठवले के पास कर्मचारियों को सीधे निलंबित करने का व्यक्तिगत अधिकार शायद न हो। लेकिन संगठन के मुताबिक शिक्षा मंत्रालय और सक्षम प्राधिकरणों से कार्रवाई की माँग करने, उन पर दबाव बनाने और संस्थागत जवाबदेही तय कराने की राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत उनके पास निश्चित रूप से है।
बयान में कहा गया कि मंत्री पद संस्थानों का दौरा करने, तस्वीरें खिंचवाने, वक्तव्य जारी करने और बिना ठोस कार्रवाई के लौट आने तक सीमित नहीं रह सकता। संगठन ने कहा कि उसे साहिल के माता-पिता के साथ खड़े होने का एक और आश्वासन नहीं चाहिए, वह देखना चाहता है कि आठवले अपने पद के अधिकारों का वास्तव में क्या उपयोग करेंगे। AIISCA के अनुसार आंबेडकरी राजनीति का काम संस्थागत जातिवाद से जवाब माँगना है, उससे समझौता करना नहीं। बयान का समापन इस सवाल पर होता है: यदि केंद्रीय मंत्री होकर भी वे अपने पद का उपयोग संस्थागत जवाबदेही तय करने में नहीं कर सकते, तो आंबेडकरी राजनीति के नाम पर यह मंत्री पद धारण करने का क्या उपयोग है?
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