
नई दिल्ली- अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ लागू करने तथा किसी परिवार की एक पीढ़ी को आरक्षण का लाभ मिलने के बाद अगली पीढ़ी को इससे बाहर करने की बहस के बीच सीनियर IRS अधिकारी नेत्रपाल ने इसके खिलाफ 10 प्रमुख तर्क रखे हैं। उनका तर्क है कि SC/ST समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को केवल वर्तमान आय, नौकरी या किसी एक व्यक्ति की सफलता के आधार पर नहीं देखा जा सकता।
उनके द्वारा बताये आंकड़े अंतर-पीढ़ीगत रोजगार, नियमित नौकरी से अनौपचारिक क्षेत्र में वापस जाने की संभावना, संपत्ति के अभाव, कैजुअल रोजगार की अधिक हिस्सेदारी, उच्च शिक्षा में मौजूद सामाजिक अंतर और आरक्षित पदों की रिक्तियों जैसी स्थितियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। नेत्रपाल का कहना है कि ऐसे में ‘क्रीमी लेयर’ अथवा पीढ़ीगत प्रतिबंध लागू करने से पहले उसके प्रभाव को ठोस अनुभवजन्य आंकड़ों के आधार पर समझना जरूरी है।
नेत्रपाल के पहले तर्क का आधार 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2023' में दिए गए अंतर-पीढ़ीगत रोजगार संबंधी आंकड़े हैं। रिपोर्ट में कार्यबल और आय के वितरण में जाति-वार अंतर स्पष्ट रूप से देखा गया, जहाँ सामाजिक पहचान का असर श्रम बाजार के परिणामों पर पड़ता है।
2018 में दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले SC/ST पुरुषों में से 75.6% के बेटे भी दिहाड़ी मज़दूरी ही करते थे। इन आंकड़ों के अनुसार, 2018 में ‘अन्य’ जाति समूहों में यदि पिता कैजुअल श्रमिक था, तो उसके बेटे के भी कैजुअल श्रमिक बने रहने की संभावना घटकर लगभग 53 प्रतिशत रह गई थी। इसके विपरीत SC/ST समुदाय में यह संभावना लगभग 75 प्रतिशत थी।
इसकी तुलना में 2004 में यह आंकड़ा 86.5% था, जिससे पता चलता है कि SC/ST वर्ग के दिहाड़ी मज़दूरों के बेटे अब दूसरे तरह के रोज़गार, खासकर अनौपचारिक नियमित वेतन वाले काम की ओर बढ़ गए लेकिन यह ग्रोथ बहुत धीमी है।
नेत्रपाल के अनुसार यह अंतर बताता है कि SC/ST परिवारों के लिए कैजुअल और अस्थायी रोजगार के चक्र से बाहर निकलना अन्य सामाजिक समूहों की तुलना में अधिक कठिन बना हुआ है। आरक्षण जैसी निरंतर सरकारी सहायता के बिना मेहनत-मजदूरी और अनियमित रोजगार का चक्र टूटना मुश्किल है।
उनका तर्क है कि यदि एक पीढ़ी के सरकारी समर्थन या आरक्षण के माध्यम से रोजगार और शिक्षा तक पहुंच बनाने के बाद अगली पीढ़ी को आरक्षण से बाहर कर दिया जाए, तो इस अंतर-पीढ़ीगत गतिशीलता की वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज किया जा सकता है।
दूसरा तर्क यह है कि SC/ST परिवार के किसी सदस्य का नियमित वेतन वाली नौकरी में पहुंच जाना अपने आप में स्थायी सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं है।
नेत्रपाल द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार, नियमित रोजगार हासिल करने वाले SC/ST माता-पिता के बच्चों के लिए भी अनौपचारिक क्षेत्र, कैजुअल काम या स्वरोजगार की ओर जाने की संभावना बनी रहती है।
इसका अर्थ यह है कि एक पीढ़ी का नियमित रोजगार अगली पीढ़ी के लिए उसी स्थिति को बनाए रखने की गारंटी नहीं देता। आरक्षण को एक पीढ़ी तक सीमित करना दलितों की इस सामाजिक चढ़ाई की नाजुकता को नजरअंदाज करता है।
इसी आधार पर नेत्रपाल का कहना है कि केवल पहली पीढ़ी के किसी सदस्य के नियमित रोजगार में पहुंच जाने को आधार बनाकर अगली पीढ़ी को आरक्षण से बाहर करना सामाजिक उन्नति की अस्थिरता को नजरअंदाज कर सकता है।
आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि आर्थिक रूप से संपन्न SC/ST परिवार आरक्षण का लगातार लाभ ले रहे हैं।
नेत्रपाल इसके जवाब में क्रीमी लेयर के वास्तविक आकार पर सवाल उठाते हैं।
वे बिहार जाति सर्वेक्षण के आंकड़ों का हवाला देते हैं, जिसके अनुसार SC/ST आबादी का 99.5 प्रतिशत हिस्सा आर्थिक क्रीमी लेयर की सीमा से नीचे आता है। इसके अलावा, राष्ट्रीय आयकर आंकड़ों में भी एक करोड़ रुपये से अधिक आय वाले लोगों की संख्या कुल आबादी की तुलना में बहुत कम है। नेत्रपाल के अनुसार SC/ST समुदाय के भीतर इस आय वर्ग में आने वाले लोगों की संख्या और भी बेहद सीमित है।
इस आधार पर उनका तर्क है कि एक बहुत छोटे आर्थिक समूह की मौजूदगी को पूरे SC/ST समुदाय के लिए आरक्षण संबंधी पात्रता सीमित करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
नेत्रपाल का चौथा तर्क आरक्षित पदों और सीटों की रिक्तियों से जुड़ा है।
उनके अनुसार आरक्षित वर्गों में पहले से ही कई पद और सीटें खाली रहने की समस्या मौजूद है। ऐसे में यदि क्रीमी लेयर अथवा दूसरी पीढ़ी के अभ्यर्थियों को आरक्षण से बाहर कर दिया जाता है, तो पात्र उम्मीदवारों का दायरा और छोटा हो जाएगा।
इससे आरक्षित पदों के लिए उपलब्ध उम्मीदवारों की संख्या घट सकती है और बैकलॉग रिक्तियां बढ़ सकती हैं।
नेत्रपाल के अनुसार आरक्षण के लाभार्थियों का दायरा सीमित करने से पहले यह देखना आवश्यक है कि मौजूदा व्यवस्था में ही कितने आरक्षित पद भरे जा रहे हैं और कितने खाली हैं।
नेत्रपाल के अनुसार SC/ST कर्मचारियों की वर्तमान आय को उनके परिवार की पीढ़ीगत संपत्ति का संकेतक मानना उचित नहीं है।
वे एक सरकारी कर्मचारियों से संबंधित अध्ययन का हवाला देते हैं। इसके अनुसार 96 प्रतिशत SC कर्मचारी पांच एकड़ से कम जमीन के मालिक थे।
इसी तरह ग्रामीण SC स्नातकों के बीच सेवा में मौजूद लोगों में 82 प्रतिशत के पास 1.23 एकड़ से कम जमीन थी।
नेत्रपाल इन आंकड़ों के आधार पर यह तर्क रखते हैं कि सरकारी सेवा में पहुंचे अनेक SC कर्मचारी ऐसे परिवारों से आते हैं जिनके पास बड़ी मात्रा में जमीन या पारिवारिक संपत्ति नहीं है।
इसलिए किसी व्यक्ति की वर्तमान आय और उसके परिवार की पीढ़ियों से जमा संपत्ति को एक ही पैमाने पर नहीं देखा जा सकता।
नेत्रपाल का छठा तर्क SC समुदाय के रोजगार के स्वरूप से संबंधित है।
2021-22 के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 40 प्रतिशत SC श्रमिक कैजुअल रोजगार में थे। इसके मुकाबले ‘अन्य’ सामाजिक समूहों में कैजुअल रोजगार की हिस्सेदारी करीब 13 प्रतिशत थी।
इन आंकड़ों के आधार पर नेत्रपाल का कहना है कि SC समुदाय के लिए नियमित वेतन वाला रोजगार अभी भी व्यापक स्थिति नहीं है।
इसलिए आर्थिक आधार पर आरक्षण से बाहर करने वाली व्यवस्था उस अपेक्षाकृत छोटे हिस्से पर केंद्रित होगी जो नियमित रोजगार तक पहुंच पाया है, जबकि समुदाय का बड़ा हिस्सा अभी भी कैजुअल रोजगार में है।
नेत्रपाल ने उच्च शिक्षा में प्रवेश पाने वाले SC/ST विद्यार्थियों की पृष्ठभूमि से जुड़े अध्ययनों को भी अपने तर्कों में शामिल किया है।
IIT जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों के सर्वेक्षणों के अनुसार SC/ST विद्यार्थी अन्य समूहों की तुलना में अलग सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं।
इन विद्यार्थियों के अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों से आने की संभावना कम होती है। उनके माता-पिता के कॉलेज स्तर की शिक्षा प्राप्त करने की संभावना भी कम होती है।
इसके अलावा, ‘कल्चरल कैपिटल’ जैसे सामाजिक आत्मविश्वास और संस्थागत वातावरण को समझने के लिए जरूरी कुछ सामाजिक कौशल में भी अंतर दिखाई देता है।
नेत्रपाल का तर्क है कि किसी विद्यार्थी का प्रतिष्ठित संस्थान में प्रवेश हासिल कर लेना इन सामाजिक और शैक्षिक अंतरों को अपने आप समाप्त नहीं करता।
नेत्रपाल ने ‘मेरिट’ से जुड़े उस तर्क पर भी सवाल उठाया है जिसमें SC/ST समुदाय के कुछ सफल विद्यार्थियों या टॉपर्स के उदाहरण दिए जाते हैं।
उनका कहना है कि ये सांख्यिकीय अपवाद (statistical outliers) हैं। कुछ लोगों की असाधारण सफलता को पूरे समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।
उनके अनुसार व्यापक आंकड़ों में SC/ST समुदाय के विद्यार्थियों के बीच उच्च शिक्षा में ड्रॉपआउट और आत्महत्या जैसे मुद्दे भी सामने आते हैं।
इसलिए किसी परीक्षा या संस्थान में कुछ SC/ST विद्यार्थियों की असाधारण सफलता को इस बात का प्रमाण नहीं माना जा सकता कि समुदाय ने सामाजिक और शैक्षिक बाधाओं को पूरी तरह पार कर लिया है।
नेत्रपाल के अनुसार प्रतिनिधित्व की समस्या को समझने के लिए उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों के ऊपर के स्तर के बजाय शिक्षा की शुरुआती अवस्था को भी देखना होगा।
उनका तर्क है कि SC/ST समुदाय के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा, विशेष रूप से अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा, की कमी के कारण आगे चलकर उच्च शिक्षा के लिए उपलब्ध स्नातक उम्मीदवारों का आधार सीमित रहता है।
यदि योग्य उम्मीदवारों का पूल ही पर्याप्त बड़ा नहीं होगा, तो आरक्षण के शीर्ष स्तर पर पात्रता को और सीमित करने से प्रतिनिधित्व की समस्या हल नहीं होगी।
इसलिए नेत्रपाल का जोर आरक्षण का दायरा कम करने के बजाय शिक्षा की बुनियाद मजबूत करने पर है, ताकि SC/ST समुदाय से उच्च शिक्षा और रोजगार के लिए पर्याप्त संख्या में उम्मीदवार तैयार हो सकें।
नेत्रपाल का दसवां तर्क यह है कि SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर, उप-वर्गीकरण या पीढ़ीगत प्रतिबंध जैसे बड़े बदलाव अनुमानों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस आंकड़ों के आधार पर होने चाहिए।
उनके अनुसार सरकार को पहले व्यापक रूप से यह पता लगाना चाहिए कि SC/ST समुदाय में रोजगार, शिक्षा, आय, संपत्ति, भूमि स्वामित्व और अंतर-पीढ़ीगत सामाजिक गतिशीलता की वास्तविक स्थिति क्या है।
इसके साथ यह भी अध्ययन किया जाना चाहिए कि यदि आर्थिक या पीढ़ीगत आधार पर कुछ लोगों को आरक्षण से बाहर किया जाता है, तो इसका आरक्षित सीटों और सरकारी पदों की रिक्तियों तथा बैकलॉग पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
नेत्रपाल के अनुसार व्यापक जाति जनगणना और उससे जुड़े सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों के बिना ऐसी नीतियों के संभावित प्रभाव का सटीक आकलन करना मुश्किल होगा।
नेत्रपाल के दसों तर्कों को एक साथ देखने पर उनका मुख्य सवाल यह है कि SC/ST समुदाय में किसी व्यक्ति या परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार को किस आधार पर स्थायी सामाजिक उन्नति माना जाए।
उनके द्वारा रखे गए आंकड़े तीन अलग-अलग स्तरों की तस्वीर सामने रखते हैं—एक ओर SC/ST समुदाय में कैजुअल रोजगार की ऊंची हिस्सेदारी और कमजोर अंतर-पीढ़ीगत गतिशीलता है, दूसरी ओर सरकारी या नियमित रोजगार तक पहुंच बनाने वाले लोगों के बीच भी बड़ी मात्रा में पीढ़ीगत संपत्ति का अभाव बताया गया है। तीसरी ओर, उच्च शिक्षा में प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों के बीच भी सामाजिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि के अंतर मौजूद होने की बात कही गई है।
इसी आधार पर नेत्रपाल का निष्कर्ष है कि किसी परिवार की एक पीढ़ी के सरकारी नौकरी या उच्च शिक्षा तक पहुंचने मात्र को सामाजिक बराबरी का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
उनका जोर इस बात पर है कि SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर अथवा पीढ़ीगत प्रतिबंध जैसे किसी भी बदलाव से पहले व्यापक और समुदाय-विशिष्ट आंकड़ों के आधार पर यह तय किया जाए कि ऐसे बहिष्करण का विशेषकर आरक्षित सीटों, सरकारी पदों, बैकलॉग और सामाजिक प्रतिनिधित्व पर वास्तविक प्रभाव क्या होगा।
आरक्षण केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भेदभाव और सामाजिक बहिष्करण के खिलाफ प्रतिनिधित्व का औजार है। क्रीमी लेयर और अंतर-पीढ़ी प्रतिबंधों जैसे कदम इस औजार को कमजोर करेंगे। जब तक समुदाय के बड़े हिस्से की स्थिति में वास्तविक सुधार नहीं होता, तब तक आरक्षण को सीमित करने की बजाय इसे मजबूत और प्रभावी बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
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