Rajasthan डांगावास हत्याकांड: 11 साल बाद 40 आरोपी बरी, दलित समुदाय स्तब्ध; ‘हमारे पांच लोगों की हत्या किसने की?’

दलित चिंतक और लेखक भंवर मेघवंशी ने 'द मूकनायक' से बात करते हुए कहा, “डांगावास हत्याकांड में सभी आरोपियों के बरी होने का फैसला केवल एक मुकदमे का अंत नहीं है, बल्कि यह दलितों के न्याय के अधिकार पर एक गहरा प्रश्नचिह्न है।
5 अगस्त को मेड़ता के एससी-एसटी स्पेशल कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई द्वारा नामजद सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया।
5 अगस्त को मेड़ता के एससी-एसटी स्पेशल कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई द्वारा नामजद सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया।इंटरनेट
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नागौर- 14 मई 2015 को नागौर जिले के डांगावास गांव में जमीन विवाद के चलते हुई उस बर्बर घटना की याद आज भी दलित समुदाय को कंपा देती है, जिसमें ट्रैक्टर से कुचलकर और धारदार हथियारों से हमला कर छह लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई थी। इनमें पांच दलित मेघवाल परिवार के सदस्य शामिल थे। बुधवार 5 अगस्त को मेड़ता के एससी-एसटी स्पेशल कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई द्वारा नामजद सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया। फैसला सुनाते समय कोर्ट परिसर के बाहर काफी तादाद में लोग जुटे हुए थे, जहाँ आरोपी पक्ष के लोगों के चेहरों पर ख़ुशी थी वहीं पीड़ित परिवारों में निराशा के भाव साफ़ झलक रहे थे।

यह फैसला दलित समुदाय के लिए स्तब्ध करने वाला रहा है। समुदाय में गहरी निराशा और शोक की लहर है। पीड़ित परिवार सवाल कर रहा है, "जब सभी आरोपी बरी हो गए तो हमारे पांच लोगों की हत्या किसने की? हम हाईकोर्ट जाएंगे।"

मेड़ता एससी-एसटी स्पेशल कोर्ट के न्यायाधीश आशीष बिजराणियां ने फैसला सुनाते हुए सभी 40 आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। एडवोकेट महिपाल लटियाल के अनुसार, परिवादी पक्ष की ओर से 8 गवाह पेश किए गए जबकि अभियोजन पक्ष की ओर से 82 गवाह अदालत के सामने आए। लंबे मुकदमे के बाद अदालत ने आरोपियों को बरी कर दिया।

क्या था विवाद?

यह मामला करीब 40 साल पुराने जमीन विवाद से जुड़ा था। डांगावास गांव में 3.77 हेक्टेयर जमीन को लेकर जाट और दलित (मेघवाल) परिवारों के बीच विवाद चल रहा था। दलित परिवार का कहना था कि उन्होंने करीब 40 साल पहले जाट परिवार को खेती करने का अधिकार देकर 1500 रुपये उधार लिए थे। पैसे लौटाने पर जमीन वापस नहीं मिली। राजस्थान किरायेदारी अधिनियम 1955 की धारा 42 के तहत अनुसूचित जाति की जमीन गैर-एससी व्यक्ति को बेची या हस्तांतरित नहीं की जा सकती। मई 2015 में रतनाराम मेघवाल ने उसी जमीन पर मकान बनाना शुरू किया तो विवाद चरम पर पहुंच गया।

14 मई 2015 को जाट समुदाय के 200 से अधिक सदस्यों ने कथित तौर पर लाठियों, धारदार हथियारों और ट्रैक्टर से हमला किया। दलित महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की गई, पुरुषों को बुरी तरह पीटा गया और कई लोगों को ट्रैक्टर से कुचला गया। इस हमले में रतनाराम मेघवाल, पोखरराम मेघवाल, पांचाराम मेघवाल, खेमाराम मेघवाल, गणपतराम मेघवाल और रामपाल गोसाईं की मौत हो गई। पांच दलित सहित कुल छह लोग मारे गए।

मामले की गंभीरता को देखते हुए राजस्थान सरकार ने पहले सीआईडी और फिर सीबीआई को जांच सौंपी। सीबीआई ने आरोप पत्र दायर किया। 2019 में राजस्थान हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया था और फरार आरोपियों को पकड़ने के लिए ट्रायल तीन महीने रोकने का आदेश दिया था। इसके बाद पुलिस की विशेष टीमों ने दबिश देकर सभी 40 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। जनवरी 2018 से मेड़ता की अदालत में सुनवाई चल रही थी।

जब छह लोगों की निर्मम हत्या हुई,पूरा देश उस बर्बरता का साक्षी बना। वर्षों तक पीड़ित परिवार न्याय की उम्मीद में अदालतों के चक्कर लगाते रहे लेकिन अंततः यदि कोई भी दोषी नहीं ठहराया जाता,तो यह केवल अभियोजन की नहीं, बल्कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया की विफलता का संकेत है।
-भंवर मेघवंशी, दलित चिंतक

पीड़ित परिवार ने फैसले पर गहरा दुख जताया है। उनका कहना है कि जब सभी आरोपी बरी हो गए तो हमारे पांच लोगों की हत्या किसने की? वे हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं।

दलित चिंतक और लेखक भंवर मेघवंशी ने द मूकनायक से बात करते हुए कहा, “डांगावास हत्याकांड में सभी आरोपियों के बरी होने का फैसला केवल एक मुकदमे का अंत नहीं है, बल्कि यह दलितों के न्याय के अधिकार पर एक गहरा प्रश्नचिह्न है। सवाल सीधा है कि क्या उन छह निर्दोष लोगों को किसी ने नहीं मारा? क्या वे अपने आप मर गए थे? जब छह लोगों की निर्मम हत्या हुई, पूरा देश उस बर्बरता का साक्षी बना। वर्षों तक पीड़ित परिवार न्याय की उम्मीद में अदालतों के चक्कर लगाते रहे। लेकिन अंततः यदि कोई भी दोषी नहीं ठहराया जाता, तो यह केवल अभियोजन की नहीं, बल्कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया की विफलता का संकेत है। निष्पक्ष जांच, निर्भीक साक्ष्य और निष्पक्ष सुनवाई के अभाव में यदि ऐसे मामलों में आरोपी बरी होते हैं, तो इसका सबसे बड़ा संदेश यह जाता है कि दलितों के लिए न्याय पाना लगातार कठिन होता जा रहा है। इससे न्यायपालिका में वंचित समुदायों का भरोसा कमजोर पड़ता है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम का उद्देश्य पीड़ितों को प्रभावी न्याय दिलाना था, लेकिन यदि इतने जघन्य मामलों में भी दोषसिद्धि नहीं हो पाती, तो यह कानून के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। डांगावास के पीड़ितों को न्याय नहीं मिला। यह केवल पीड़ित परिवारों की हार नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के उस वादे की भी हार है जिसमें कहा गया था कि कानून सबके लिए समान है। यह फैसला हमें आत्ममंथन के लिए मजबूर करता है कि आखिर दलितों के लिए न्याय का रास्ता कहाँ है?”

यह फैसला उन तमाम मामलों की याद दिलाता है जहां जातिगत हिंसा के पीड़ित लंबे इंतजार के बाद भी न्याय से वंचित रह जाते हैं। डांगावास का घाव अब फिर से ताजा हो गया है।

5 अगस्त को मेड़ता के एससी-एसटी स्पेशल कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई द्वारा नामजद सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया।
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