
CJP आंदोलन की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि सोशल मीडिया पर एक नया तूफान खड़ा हो गया है। ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ नाम का अभियान कुछ ही दिनों में 60 लाख के करीब फॉलोअर्स जुटा चुका है। यह अभियान इंस्टाग्राम पर मुख्य रूप से सक्रिय है और जाति-आधारित आरक्षण को हटाने या उसमें बदलाव की मांग करता है। अभियान खुद को राजनीतिक दल से स्वतंत्र, नागरिक-समर्थित और योग्यता तथा आर्थिक आधार पर समान अवसर का पक्षधर बताता है। इसके प्रोफाइल में डॉ. भीमराव आंबेडकर का नारा “Educate, Agitate, Organize” और “सारी जाति एक समान, मेरा बस ये देश महान” जैसे संदेश शामिल हैं।
इस मुहिम पर केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने जोरदार प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने साफ कहा है कि आरक्षण कोई भीख नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है। इसके समानांतर, आरक्षण समर्थक समूह भी संविधान, सामाजिक न्याय और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों के पक्ष में अभियान चला रहे हैं। द मूकनायक ने इस पूरे मामले को समझने का प्रयास किया, कई बहुजन चिंतकों और अकादमिकों से इसपर चर्चा की जिन्होंने इस अभियान पर अपनी सख्त राय रखी है। समझिये पूरा मामला।
कई लोगों का मानना है कि तेजी से वायरल हो रहा यह आरक्षण हटाओ आन्दोलन जून में शुरू हुए कोकरोच जनता पार्टी के प्रोटेस्ट की सफलता से प्रेरित है जिसने लाखों की संख्या में युवाओं को जोड़ा और सरकार की मनमानी के विरोध में आवाज़ उठाने को प्रेरित किया।
आरक्षण हटाओ आन्दोलन अभियान जुलाई के अंतिम सप्ताह में CJP आंदोलन के बाद प्रमुखता से उभरा। इंस्टाग्राम अकाउंट @reservationhataomovement पर कुछ दिनों में ही फॉलोअर्स की संख्या तेजी से बढ़ी। रिपोर्ट्स के अनुसार, 26 जुलाई के आसपास लगभग 30 लाख से शुरू होकर 30 जुलाई तक लगभग 59 लाख से करीब 60 लाख फॉलोअर्स तक पहुंच गया। विभिन्न समाचार स्रोतों ने 5.5 से 5.9 मिलियन फॉलोअर्स की पुष्टि की है।
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री तथा रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रामदास आठवले ने इस अभियान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। 29 जुलाई को उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को चेतावनी दी। उन्होंने Meta, facebook, instagram, X और अन्य प्लेटफॉर्म्स को टैग करते हुए कहा कि आरक्षण विरोधी कंटेंट तुरंत हटाया जाए, अन्यथा प्लेटफॉर्म्स को देश से हटाने की बात कही। उन्होंने 10 दिनों के अंदर सारा संबंधित कंटेंट हटाने की अपेक्षा जताई और कहा कि अगर इन पोस्ट्स से कानून-व्यवस्था बिगड़ती है तो जिम्मेदारी प्लेटफॉर्म्स की होगी।
30 जुलाई को आठवले ने एक पोस्ट में लिखा: “आज हम इंटरनेट और Gen-Z के इस आधुनिक युग में आ गए हैं, लेकिन यह देखकर बहुत दुख होता है कि कुछ लोग आज भी सोशल मीडिया पर आरक्षण के संवैधानिक अधिकार को ‘भीख’ या ‘कैंसर’ कहकर अपमानित करते हैं। यह सोचकर मन व्यथित होता है कि ऐसी नफरत भरी बातें पढ़कर हमारे आरक्षित और वंचित वर्ग के युवाओं के दिलों पर क्या बीतती होगी। आज हालात ऐसे बन गए हैं कि कई जगहों पर हमारे युवा अपनी जाति बताने से भी शर्माते हैं। जब मैं इंटरनेट पर आने वाले भद्दे कमेंट्स और उनका हमारे युवाओं पर पड़ने वाला मानसिक परिणाम देखता हूँ, तो साफ लगता है कि कुछ लोग अपनी ओछी राजनीति चमकाने के लिए समाज को किस तरह से तोड़ रहे हैं। सोशल मीडिया पर जिस ‘क्रिएटिव’ तरीके से यह भावनात्मक भेदभाव किया जा रहा है, मैं इसे ‘राष्ट्रद्रोह’ की तरह देखता हूँ; क्योंकि यह देश को बांटने का काम है। कुछ ताकतों ने हमारे बच्चों के दिलों में बहुत बड़ी गलतफहमी खड़ी कर दी है। उनके मन में द्वेष का जो जहर घोल दिया गया है, हमें उसे हर हाल में दूर करना है। हम विकास में बहुत आगे आ गए हैं, लेकिन कुछ लोगों की मानसिकता में आज भी बीमारी है। पर मेरे युवा साथियों, हमें निराश नहीं होना है! हमें इस नफरत को प्यार से हराना है और समानता का सपना सच करना है। ऐसे जाहिल लोगों की बातों पर बिल्कुल ध्यान न दें। आज भी कई बच्चे जाति या पैसे की कमी के कारण अपने मुकाम तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। उन सभी को न्याय और अवसर दिलाना ही हमारा लक्ष्य है। एकजुट रहें, आगे बढ़ें!”
अठावले ने आरक्षण को बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा दिए गए संवैधानिक अधिकार के रूप में रेखांकित किया और इसे गरीबी उन्मूलन मात्र बताने वाले प्रचार को भ्रामक बताया।
सोशल मीडिया पर उभरे 'आरक्षण हटाओ' अभियान और उसके जवाब में शुरू हुए 'आरक्षण बचाओ' अभियानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में सामाजिक न्याय की बहस अब केवल संसद, अदालतों, विश्वविद्यालयों या सड़कों तक सीमित नहीं रह गई है। अब इंस्टाग्राम की रील, एक्स की पोस्ट, यूट्यूब वीडियो और फेसबुक के एल्गोरिदम भी इस बहस को प्रभावित कर रहे हैं।
द मूकनायक ने कई बहुजन चिंतकों और अकादमिकों से बात की। भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी एम.एस. नेत्रपाल ने एक महत्वपूर्ण विश्लेषण पेश किया है। उन्होंने साफ कहा है कि आरक्षण को खत्म करना लगभग नामुमकिन है। ट्राइबल आर्मी के फाउंडर हंसराज मीणा कहते हैं, "आरक्षण किसी की कृपा नहीं, बल्कि सदियों के सामाजिक भेदभाव और असमानता के खिलाफ प्रतिनिधित्व और अवसर सुनिश्चित करने का संवैधानिक माध्यम है। इतिहास को समझे बिना आरक्षण का विरोध करना सामाजिक न्याय की वास्तविकता से आंखें मूंदना है।"
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई फिल्ममेकर एवं अकादमिक डॉ. विक्रांत किशोर कहते हैं , “आरक्षण पर बहस को जाति के इतिहास से अलग नहीं किया जा सकता। जाति सिर्फ ऐतिहासिक घटना नहीं है; यह पीढ़ियों से चली आ रही भेदभाव की व्यवस्था है जिसके प्रभाव आज भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अनुभव किए जाते हैं।" वे आगे बताते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में जातिवाद पर उनके शोध और डॉक्यूमेंट्री कार्य से साफ है कि जाति पूर्वाग्रह भारत की सीमाओं से परे भी पहुंचा है और उदार लोकतंत्रों में भी लोगों के जीवन को प्रभावित करता है।
किशोर कहते हैं, "अधिकांश लोकतांत्रिक समाज यह मानते हैं कि लंबे समय तक संरचनात्मक बहिष्कार झेलने वाले समुदायों को वास्तविक समानता के लिए सकारात्मक उपायों की जरूरत होती है। SC, ST और बहुजन समुदायों द्वारा सदियों से झेली गई उत्पीड़न को कुछ दशकों में खत्म नहीं किया जा सकता। असली लक्ष्य सकारात्मक कार्रवाई को खत्म करना नहीं होना चाहिए जब तक वास्तविक समानता हासिल न हो जाए, बल्कि जाति को ही खत्म करना होना चाहिए। इसके लिए सामाजिक चेतना, जारी भेदभाव की ईमानदार स्वीकृति और जातिगत विशेषाधिकार से लाभान्वित लोगों की सक्रिय सहभागिता जरूरी है। जब समाज सच में न्यायसंगत हो जाए और जाति अवसर या गरिमा तय न करे, तब सकारात्मक उपायों की जरूरत स्वाभाविक रूप से कम हो जाएगी। तब तक ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे समुदायों को मिले संवैधानिक अधिकार और सुरक्षा को बनाए रखना और मजबूत करना जरूरी है।”
डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर नेशनल एसोसिएशन ऑफ इंजीनियर्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष नागसेन सोनारे ने वर्तमान स्थिति का मूल्यांकन अलग दृष्टिकोण से किया। उन्होंने कहा कि उनके अनुसार पिछले लगभग 12 वर्षों में अनेक प्रशासनिक और नीतिगत बदलावों के कारण आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन पर असर पड़ा है। सोनारे ने कहा:
"हमारा मानना है कि आरक्षण को सीधे समाप्त नहीं किया गया, लेकिन उसके क्रियान्वयन को धीरे-धीरे कमजोर किया गया है।"
सोनारे ने कई कारण गिनाए। उनके अनुसार सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) के निजीकरण, अनेक सरकारी पदों के लंबे समय तक रिक्त रहने, केंद्रीय संस्थानों में नियुक्तियों की धीमी प्रक्रिया तथा अन्य नीतिगत बदलावों का असर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के युवाओं पर पड़ा है। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में शिक्षित युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन नियुक्तियां अपेक्षित गति से नहीं हो रही हैं।
सोनारे कहते हैं, “पिछले 12 वर्षों में आरक्षण का क्रियान्वयन RSS कैडर द्वारा कुलपति, PSU बोर्ड प्रमुख, IIT, IIM और अन्य केंद्रीय संस्थानों के प्रमुख बनने, PSU के निजीकरण, सैकड़ों-हजारों स्कूलों के बंद होने, NCSC और NCST पर कब्जे जैसी चालों से लगभग समाप्त हो गया है। मीडिया अनुमानों के अनुसार केंद्रीय सरकार और PSUs में 60 लाख रिक्तियां खाली हैं और SC-ST-OBC शिक्षित युवा विज्ञापन का इंतजार कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन लगभग हर परीक्षा में पेपर लीक के कारण कोई उम्मीद नहीं। मोदी सरकार में SC-ST प्रतिनिधि मंत्री बोलने और काम करने से किसने रोका? उन्हें मोदी सरकार से कहना चाहिए कि सभी PSUs, केंद्रीय, राज्य सरकारों और IIT, IIM, NIT जैसे संस्थानों में सभी रिक्तियां भरी जाएं और SC-ST-OBC समुदाय के प्रति अपना कर्तव्य निभाएं। अनुसूचित जाति समुदाय ने पुणे की येरवडा जेल में महात्मा गांधी के आमरण अनशन के बाद दो वोटों का अधिकार और स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र खो दिया। 1932 में लंदन के राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने जाति हिंदू नेताओं से लड़कर अछूतों के लिए कम्युनल अवॉर्ड हासिल किया था, जिसमें हर अछूत को दो वोटों का अधिकार मिला, एक अछूत उम्मीदवार के लिए और एक सामान्य के लिए। इस तरह SC या अछूतों को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मान्यता मिली। वही पूना पैक्ट के जरिए ऊपरी जाति हिंदुओं ने छीन लिया।"
सोनारे कहते हैं, "अब समय आ गया है कि पूना पैक्ट को निरस्त कर कम्युनल अवॉर्ड के दो वोट अधिकार हर SC समुदाय को और वही अधिकार ST समुदाय को बहाल किया जाए। यह संवैधानिक संशोधन से संभव है। वर्तमान मोदी सरकार के SC-ST मंत्रियों को ऐसा विधेयक लाना चाहिए जो संसद और राज्य विधानसभाओं में SC-ST के सच्चे प्रतिनिधि भेजने का रास्ता खोले। 2032 कम्युनल अवॉर्ड घोषणा और पूना पैक्ट के 100 वर्ष होंगे। राष्ट्र को संसद और विधानसभाओं में अपने सच्चे प्रतिनिधि भेजने का अधिकार बहाल करना चाहिए।”
ऑल इंडिया ओबीसी स्टूडेंट्स असोसिएशन के अध्यक्ष किरण गौड़ ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा अन्य सामाजिक रूप से वंचित समुदायों के छात्रों और शोधार्थियों को एकजुट होने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा "देशभर में आरक्षण और सामाजिक न्याय के खिलाफ काम करने वाली शक्तियां संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास कर रही हैं। ऐसे समय में छात्रों और शोधार्थियों को पहले से अधिक एकजुट होना होगा।"
गौड़ ने कहा कि आरक्षण को दया, कृपा या विशेष सुविधा के रूप में प्रस्तुत करना संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं है। उन्होंने आगे कहा, "आरक्षण कोई दान नहीं है। यह समान प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है।" उन्होंने युवाओं से संविधान की रक्षा और सामाजिक न्याय के पक्ष में संगठित रहने की अपील की।
नागपुर से अम्बेडकरवादी चिन्तक और रिसर्चर डॉ पंकज तांबे से द मूकनायक ने विषय पर गहन चर्चा की। तांबे कहते हैं “आरक्षण का विरोध न करें बल्कि सस्ती सीटों की मांग करें। हर एडमिशन सीजन में छात्रों को बताया जाता है कि आरक्षण के कारण उन्हें इंजीनियरिंग सीट नहीं मिली। यह तर्क राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है लेकिन तथ्यात्मक रूप से कमजोर। आरक्षण सीटों की संख्या नहीं घटाता। यह सिर्फ मौजूदा सीटों के वितरण का तरीका तय करता है। असली समस्या सस्ती सार्वजनिक सीटों की कमी और महंगी निजी शिक्षा का तेजी से विस्तार है। NIRF 2025 डेटा से साफ है। 22 IITs में चार साल के अंडरग्रेजुएट कार्यक्रमों में कुल 54,534 छात्र हैं। इसके मुकाबले 35 निजी और PPP संस्थानों में 304,050 छात्र हैं। निजी संस्थानों ने IITs की तुलना में 5.58 गुना ज्यादा चार साल के छात्र नामांकित किए; इन दोनों श्रेणियों के संयुक्त छात्रों का 84.8 प्रतिशत; और प्रति संस्थान औसत 8,687 छात्र, जबकि IITs में 2,479। VIT अकेले 35,957 छात्र बताता है, जो IIT बॉम्बे के 5,164 का लगभग सात गुना है।"
ये आंकड़े संस्थान के पैमाने को मापते हैं, गुणवत्ता को नहीं। लेकिन ये बताते हैं कि इंजीनियरिंग शिक्षा का विस्तार मुख्य रूप से निजी क्षेत्र में हुआ है। फिर भी आरक्षण की बहस छोटे सार्वजनिक क्षेत्र पर केंद्रित रहती है। आरक्षण खत्म करने से एक भी नई IIT सीट नहीं बनेगी। निजी कॉलेज फीस नहीं घटेगी। एडमिशन पारदर्शी नहीं होगा। यह सिर्फ मौजूदा सीमित सीटों पर कौन छात्र बैठेगा, यह बदलेगा।
तांबे आगे कहते हैं कि आरक्षण का विरोध करने वालों को इसलिए ज्यादा उपयोगी मांग करनी चाहिए: निजी और PPP इंजीनियरिंग संस्थानों में कम से कम 35 प्रतिशत सरकारी-कोटा सीटें, नियंत्रित कम फीस और केंद्रीकृत एडमिशन के साथ। रिपोर्टेड निजी और PPP छात्र संख्या पर 35 प्रतिशत लागू करने से लगभग 1,06,418 स्थान सार्वजनिक रूप से नियंत्रित पहुंच पूल में आ सकते हैं---यह तुलना में सभी 22 IITs की कुल चार साल की छात्र संख्या का लगभग दोगुना है। ये सीटें कॉमन काउंसलिंग से भरी जाएं, प्रकाशित सीट मैट्रिक्स, नियंत्रित फीस, छात्रवृत्ति और डोनेशन या कैपिटेशन फीस पर सख्त प्रतिबंध के साथ। इस सार्वजनिक नियंत्रित पूल में संवैधानिक आरक्षण लागू हो। यह प्रस्ताव सभी समुदायों के छात्रों को लाभ पहुंचाएगा।
अनारक्षित श्रेणी के कई छात्र भी निजी फीस नहीं भर पाते। उनकी समस्या आरक्षण नहीं, शिक्षा का व्यापारीकरण है। सरकारी-कोटा सिस्टम उन्हें सस्ती सीटें देगा बिना SC, ST या OBC छात्रों के अधिकार छीने। आरक्षण और सस्ती सीटों का विस्तार अलग-अलग समस्याओं का समाधान करते हैं। आरक्षण ऐतिहासिक बहिष्कार और प्रतिनिधित्व की कमी को संबोधित करता है। सरकारी-कोटा सीटें कमी, ऊंची फीस और असमान पहुंच को संबोधित करती हैं। भारत को दोनों की जरूरत है। असली सवाल यह नहीं कि किस समुदाय की सीटें घटाई जाएं। असली सवाल है, जब ज्यादातर इंजीनियरिंग छात्र पहले से निजी संस्थानों में पढ़ रहे हैं तो सस्ती सीटें इतनी कम क्यों हैं? सरकार से दूसरे छात्र के अवसर छीनने की मांग न करें। ज्यादा सार्वजनिक कॉलेज, ज्यादा सस्ती सीटें, केंद्रीकृत एडमिशन और निजी इंजीनियरिंग संस्थानों में कम से कम 35 प्रतिशत सरकारी-कोटा सीटों की मांग करें। आरक्षण का विरोध घटाव की राजनीति है। सस्ती शिक्षा का विस्तार न्याय की राजनीति है।”
बीसी दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कर्नाटक हाईकोर्ट के अधिवक्ता डुंड्रा कुमार स्वामी कहते हैं, "आरक्षण एक संवैधानिक गारंटी है जो समान अवसर और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देती है। आरक्षण की रक्षा करने का अर्थ है भारत के संविधान में निहित समानता, सम्मान और समावेशी विकास के मूल्यों की रक्षा करना। आरक्षण बचाएं – सामाजिक न्याय की रक्षा करें।"
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