
अहमदाबाद/नई दिल्ली - बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रेरणा से दलित समुदाय के लोगों के बौद्ध धर्म अपनाने का सिलसिला देश के कई हिस्सों में आज भी जारी है। डॉ.अंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर के दीक्षाभूमि मैदान में अपने लगभग 4 लाख समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। अशोक विजयदशमी के अवसर पर 21 अक्टूबर को शहर के नवा वडाज क्षेत्र में हुए एक समारोह में गुजरात के आठ जिलों के अनुसूचित जाति समुदाय के 44 लोगों ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इससे एक दिन पहले मंगलवार को अहमदाबाद शहर के गीता मंदिर के पास आयोजित एक कार्यक्रम में दलित समुदाय के 76 लोगों ने भी बौद्ध धर्म अपनाया था।
इसी बीच सोशल मीडिया पर एक नई बहस खड़ी हो गई है कि दलितों को धर्मांतरण करना चाहिए या नहीं। इस बहस में वरिष्ठ IRS अधिकारी नेत्रपाल जैसे बहुजन बुद्धिजीवियों ने कानूनी जोखिमों पर सवाल उठाए हैं। नेत्रपाल का कहना है कि धर्म परिवर्तन विरोधी कानून किसी व्यक्ति की आरक्षण स्थिति को प्रभावित कर सकता है। उत्तर प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक जैसे कई राज्यों में धर्म परिवर्तन विरोधी कड़े कानून लागू हैं। धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी तरह से कानूनी प्रावधानों के अनुसार ही होनी चाहिए। यदि इन प्रावधानों का उल्लंघन किया जाता है, तो वह धर्म परिवर्तन अवैध माना जाएगा। अगर धर्म परिवर्तन अवैध है, तो जाति प्रमाण पत्र भी अवैध हो सकता है। आज धर्म परिवर्तन से जुड़े हजारों कानूनी मामले अदालतों में लंबित हैं।
नवा वडाज क्षेत्र में हुए समारोह लोटस बौद्ध संघ ट्रस्ट द्वारा आयोजित किया गया था। समारोह की अध्यक्षता सुरेंद्रनगर स्थित अमर बौद्ध विहार के भंते पथिक श्रेष्ठी ने की। आयोजक प्रशांत मेहता ने बताया कि यह धर्मांतरण गुजरात फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट, 2003 और नियम, 2008 के प्रावधानों के अनुसार किया गया।
इन 44 लोगों में अहमदाबाद, वडोदरा, गांधीनगर, मेहसाणा, राजकोट, सुरेंद्रनगर, साबरकांठा और पाटन जिलों के लोग शामिल थे। इनमें 10 नाबालिग भी थे, जो छह परिवारों के सदस्य हैं।
समारोह में शामिल हुए अहमदाबाद स्थित लेखक और यूनियन लीडर आनंद परमार ने कहा कि वे लंबे समय से बौद्ध जीवन जी रहे थे। उन्होंने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर पर आधारित दो पुस्तकों का हिंदी से गुजराती में अनुवाद भी किया है।
सानंद में क्वालिटी कंट्रोल इंजीनियर के रूप में कार्यरत 26 वर्षीय रितेश सोलंकी ने कहा, “जाति व्यवस्था में हमें अधिकार नहीं मिलते। शहरों में स्थिति बेहतर है, लेकिन गांवों में सामाजिक अन्याय जारी है। बौद्ध धर्म में जाति व्यवस्था नहीं है और सभी समान हैं।”
गुजरात समाचार की जून माह की एक रिपोर्ट में बताया गया कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अहमदाबाद जिले में पिछले ढाई वर्षों में कुल 545 लोगों ने धर्म परिवर्तन किया है। इनमें से 95 प्रतिशत से अधिक लोगों ने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया।
धर्मांतरण के मुख्य कारणों में विवाह, व्यक्तिगत विश्वास और सामाजिक कारक शामिल बताए गए हैं। लगभग 60 प्रतिशत लोग शहरी क्षेत्रों से थे। पूर्वी अहमदाबाद के अमराईवाड़ी जैसे क्षेत्रों में धर्मांतरण की दर अधिक पाई गई। पिछले एक वर्ष में धोलका, सनांद और विरमगाम जैसे ग्रामीण क्षेत्रों से भी आवेदन प्राप्त हुए हैं।
कुछ मुस्लिम और ईसाई समुदाय के लोगों ने भी हिंदू धर्म अपनाया। कई मामलों में पूरे परिवार, जिनमें बच्चे भी शामिल थे, ने धर्म परिवर्तन किया। नियमों के अनुसार, धर्म परिवर्तन के इच्छुक व्यक्तियों को कम से कम 30 दिन पहले जिला कलेक्टर कार्यालय से अनुमति लेनी होती है। अनुमति संबंधित उप-मंडल अधिकारियों और पुलिस की जांच रिपोर्ट के बाद ही दी जाती है।
एक तरफ दलितों के बौद्ध धर्म अपनाने की खबरें हैं, तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर बहुजन बुद्धिजीवियों के बीच इस पर बहस छिड़ी है। वरिष्ठ IRS अधिकारी नेत्रपाल ने अपने पोस्ट में दलितों को किसी अन्य धर्म में जाने से पहले सोच-विचार की सलाह दी है।
नेत्रपाल के अनुसार, ऐसे न्यायिक फैसलों की संख्या बढ़ रही है जिनमें धर्मांतरण के बाद आरक्षण से वंचित कर दिया गया। उन्होंने कहा है कि धर्मांतरण में अंतर्निहित जटिलताएं हैं और आरक्षण छिनने की आशंका बहुत अधिक है। इसलिए उनकी सलाह है कि धर्मांतरण करने वाले पहले कानूनी सलाह लें।
उन्होंने यह भी समझाया कि धर्मांतरण-विरोधी कानून किसी के आरक्षण की स्थिति को कैसे प्रभावित कर सकता है। उनके मुताबिक उत्तर प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक जैसे कई राज्यों में कड़े धर्मांतरण-विरोधी कानून हैं। धर्म परिवर्तन पूरी तरह कानूनी प्रावधानों के अनुसार होना चाहिए। प्रावधानों का उल्लंघन हुआ तो धर्मांतरण अवैध हो सकता है, और अवैध धर्मांतरण की स्थिति में जाति प्रमाणपत्र भी अवैध हो सकता है। इसी कारण उन्होंने लोगों से सावधान रहने और झूठी उम्मीदों के झांसे में न आने की अपील की है।
नेत्रपाल का कहना है कि धर्मांतरण से जुड़े हजारों कानूनी मामले आज अदालतों में लंबित हैं। उनकी सलाह है कि आंख मूंदकर धर्म न बदला जाए, और माता-पिता ने स्कूल व ट्रांसफर सर्टिफिकेट जैसे दस्तावेजों में जो धर्म और जाति दर्ज कराई है, उसी की जांच की जाए। उनके शब्दों में, पिता हिंदू हैं तो हिंदू ही दर्ज करें, वरना समस्या होगी।
नेत्रपाल ने धर्मांतरण की सलाह देने वालों पर भी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि सलाह देने वाले पहले खुद कानूनी तौर पर बौद्ध धर्म अपनाएं और अपने तथा परिवार के लिए नया जाति प्रमाणपत्र बनवाएं।
उनका यह भी कहना है कि लोग इस मुद्दे में धर्म को मिलाकर माहौल बिगाड़ना चाहते हैं। उनके अनुसार, हिंदू रहते हुए अनुसूचित जाति में होना आज एक लाभ की स्थिति है। उन्होंने सवाल किया कि बौद्ध, ईसाई या इस्लाम धर्म क्यों अपनाया जाए, जबकि धर्म बदल चुके दलितों को भी भेदभाव झेलना पड़ता है। उनके शब्दों में इसमें "शून्य लाभ" है और आरक्षण पर खतरा है। इसलिए उनकी सलाह है कि हिंदू बने रहकर दलित बने रहें। उनका यह भी कहना है कि दलितों की समृद्धि केवल आरक्षण से ही संभव है, किसी और रास्ते से नहीं।
नेत्रपाल डेटा विश्लेषण के साथ कहते हैं कि कुल आबादी का केवल 0.7% हिस्सा ही बौद्ध है।
अक्सर यह गलत नैरेटिव (धारणा) बनाया जाता है कि दलित हिंदू नहीं हैं। यह पूरी तरह से गलत बात है। 2011 की जनगणना का साथ में दिया गया ग्राफ़ पूरा डेटा दिखाता है। 121 करोड़ की आबादी में से, भारत में केवल 84.42 लाख लोग बौद्ध थे। यह कुल आबादी का 0.7% है।
उत्तर प्रदेश, जहाँ BSP ने बुद्ध विहारों आदि के ज़रिए एक राजनीतिक ताकत के रूप में जगह बनाई, वहाँ बौद्ध आबादी केवल 0.1% है। कर्नाटक में यह 0.16% थी। आंध्र प्रदेश में 0.04% थी। तमिलनाडु में 0.02% थी।
ज़्यादातर बौद्ध आबादी केवल एक राज्य महाराष्ट्र से आती है, और दलितों की भी केवल एक जाति महार से है। महाराष्ट्र के बाहर भारत में बौद्ध धर्म का कोई बड़ा विस्तार नहीं है। यहाँ तक कि महाराष्ट्र में भी, यह केवल एक उप-जाति तक ही सीमित है। इसके अलावा, अगर हम महार उप-जाति को देखें, तो इसमें से केवल 60% लोग ही बौद्ध हैं; बाकी 40% हिंदू हैं।
भारत में लाखों दलित हिंदू धर्म को मानते हैं। वे अपने देवी-देवताओं को पूजते हैं।
वे अपने धर्म में विश्वास रखते हैं। वे अपने धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र हैं। उनका धर्म बदलने का कोई इरादा नहीं है और न ही वे धर्म बदलेंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि वे डॉ. अंबेडकर को नहीं मानते या उनका सम्मान नहीं करते। हिंदू दलित इस देश में बस किसी तरह अपना जीवन गुज़ार रहे हैं और अपना अस्तित्व बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक प्रतिनिधित्व से लेकर प्रशासनिक (ब्यूरोक्रेटिक) प्रतिनिधित्व तक, हर जगह उन्हें नज़रअंदाज़ किया जाता है। लेकिन उनकी संस्कृति पर जो हमले हो रहे हैं, वे हैरान करने वाले हैं।
नेत्रपाल कहते हैं, "आरक्षण ही एकमात्र कारगार उपाय है। कई लोग कहते हैं कि SC-ST फंड का वितरण होना चाहिए। लेकिन, आप शायद ही कभी देखेंगे कि सरकारी योजनाएं असल लाभार्थियों तक पहुँच पाती हैं। कुछ लोगों का कहना है कि SC-ST समुदाय के लोगों को उद्यमी बनना चाहिए, लेकिन बैंक उन्हें पूंजी नहीं देते और न ही उनके पास व्यापार के लिए कोई सामुदायिक समर्थन होता है। आंकड़े बताते हैं कि SC-ST समुदाय के लोगों के पास ऐसे कोई उद्यम नहीं हैं जिनमें 20 से ज़्यादा कर्मचारी हों। इनमें से ज़्यादातर छोटे उद्यम हैं, जहाँ से बड़ा मुनाफा कमाना संभव नहीं है।" वे आगे कहते हैं, " सबसे अच्छा तरीका यह है कि आरक्षण का लाभ उठाकर अच्छे कॉलेजों से शिक्षा प्राप्त की जाए, और फिर सरकारी या निजी क्षेत्र में एक स्थिर, वेतन वाली नौकरी हासिल की जाए। सफलता का यही एक सरल फॉर्मूला है...यह मेरा निजी अनुभव नहीं है, बल्कि अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की 'स्टेट ऑफ़ वर्किंग कैपिटल 2023' रिपोर्ट में यही बात कही गई है।"
इस बहस में एक और पक्ष सामने आया है, जो आम दलित परिवारों की जमीनी स्थिति की ओर इशारा करता है। इसके अनुसार एक सामान्य दलित बौद्ध घर में बुद्ध की मूर्ति होती है, जिन्हें वह भगवान विष्णु का अवतार मानता है। वह औपचारिक रूप से धर्मांतरण नहीं करता और कागजों पर हिंदू ही रहता है। वह सभी पूजा-पाठ और त्योहार मनाता है, अयोध्या और प्रयागराज की यात्रा करता है, और साथ ही डॉ. आंबेडकर की विचारधारा का सम्मान भी करता है।
इस तरह बहस दो रास्तों के बीच खड़ी है। एक तरफ आंबेडकर से प्रेरित होकर औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपनाने वाले लोग हैं, जैसे अहमदाबाद के ये 44 और 76 लोग। दूसरी तरफ वे बुद्धिजीवी हैं जो कानूनी सलाह लेने और आरक्षण की सुरक्षा पर जोर देते हैं।
अमेरिकी आयोग USCIRF की अगस्त 2026 की भारत पर रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2026 तक भारत के 28 में से 13 राज्यों में ऐसे धर्मांतरण-विरोधी कानून हैं जो धर्म परिवर्तन को अपराध की श्रेणी में रखते हैं, और इनमें उत्तर प्रदेश व गुजरात भी शामिल हैं। इस सूची में सबसे ताजा राज्य महाराष्ट्र है। 31 जुलाई को राष्ट्रपति ने महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट, 2026 को मंजूरी दी, जिससे वह ऐसा कानून बनाने वाला 13वां राज्य बन गया। बेयलर यूनिवर्सिटी के रिलीजन वॉच ने भी जुलाई 2026 में 28 में से 13 राज्यों में ऐसे कानून होने की बात कही। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड , गुजरात, हिमाचल प्रदेश , छत्तीसगढ़, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, राजस्थान, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश और महाराष्ट्र राज्यों में धर्मांतरण-विरोधी कानून लागू किए जा चुके हैं।
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