छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण पर बवाल: 26 आदिवासी परिवारों का हुक्का-पानी बंद, 'मूल संस्कृति' में लौटने के लिए 30 दिन का अल्टीमेटम

नारायणपुर में धर्मांतरण का मुद्दा गहराया: 26 आदिवासी परिवारों का हुक्का-पानी बंद, गांव में तनाव के बाद भारी पुलिस बल तैनात और शांति वार्ता जारी।
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छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में धर्मांतरण पर भारी बवाल। 26 आदिवासी परिवारों का सामाजिक बहिष्कार, मूल संस्कृति में लौटने के लिए मिला 30 दिन का अल्टीमेटम।फोटो साभार- इंटरनेट
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नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में धर्मांतरण का मुद्दा एक बार फिर गहरा गया है। यहां के भरंडा गांव में 26 आदिवासी परिवारों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया है। हालात को देखते हुए गांव में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। इन परिवारों को अपनी मूल आदिवासी संस्कृति में वापस लौटने के लिए 30 दिनों की मोहलत दी गई है।

इस तनावपूर्ण स्थिति को काबू में करने के लिए गांव में 100 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। मंगलवार को उपजे विवाद के बाद ग्रामीणों के बीच करीब 12 घंटे तक लंबी बातचीत चली। प्रशासन का दावा है कि स्थिति शांत कर ली गई है, लेकिन प्रभावित परिवार अब भी किसी अनहोनी के खौफ में जी रहे हैं।

अधिकारियों के अनुसार, गांव में शांति स्थापित करने के लिए कुल 13 दौर की वार्ता करनी पड़ी। नारायणपुर के एसपी रॉबिन्सन गुड़िया ने स्पष्ट किया है कि शांति बैठक के बाद अब हालात पूरी तरह नियंत्रण में हैं। उन्होंने बताया कि प्रशासन गांव की हर गतिविधि पर कड़ी नजर रख रहा है।

स्थानीय लोगों की मानें तो भरंडा गांव में सांप्रदायिक तनाव की नींव पिछले साल दिसंबर में ही पड़ गई थी। उस वक्त पड़ोसी जिले कांकेर के बड़ेतेवड़ा गांव में दफनाने के अधिकार को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हुआ था। इसके बाद 16, 17 और 18 दिसंबर को हिंसक झड़पें हुई थीं, जिसकी आंच कांकेर के कई हिस्सों के साथ-साथ नारायणपुर के भरंडा गांव तक भी पहुंची थी।

प्रभावित परिवारों का कहना है कि यह ताजा विवाद पिछले एक महीने से चल रही लगातार घटनाओं का नतीजा है। 9 जून को गांव आए एक पादरी और उनकी पत्नी पर धर्मांतरण के आरोप में 'धार्मिक भावनाओं को आहत करने' का मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद 21 जून को हुए एक अन्य विवाद में एक परिवार को जान बचाकर जंगल में भागना पड़ा, जहां पुलिस को आकर बीच-बचाव करना पड़ा।

ग्रामीणों के अनुसार, 23 जून को हुए विवाद के बाद से बदले की कार्रवाई का डर और ज्यादा बढ़ गया है। एक निवासी ने बताया कि यह पहली बार है जब ग्रामीणों ने खुलेआम बहिष्कार का ऐलान किया है। उन्होंने बताया कि पहले गैर-ईसाई ग्रामीण खुद कहते थे कि चर्च 10 किलोमीटर दूर है, इसलिए घर पर ही प्रार्थना कर लें, लेकिन अब उन्हें घरों में प्रार्थना करने पर भी सख्त ऐतराज है।

बहिष्कार का आह्वान करने वाले एक ग्रामीण ने 30 दिन के अल्टीमेटम की पुष्टि की है। उसने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि अगर ये परिवार अपनी पुरानी संस्कृति में वापस नहीं लौटते हैं, तो एक और बैठक कर आगे की कठोर कार्रवाई तय की जाएगी।

छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण को लेकर इस तरह के विवाद लगातार बढ़ते जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान बस्तर, नारायणपुर, कांकेर और कोंडागांव जिलों से ऐसी कई चिंताजनक घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

नवंबर 2024 में भी इसी तरह का एक बड़ा विवाद सामने आया था। उस दौरान 'ईसाई प्रथाओं' के खिलाफ हुए कड़े विरोध के चलते लगभग 500 लोगों को कई दिनों तक नारायणपुर के इंडोर स्टेडियम में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

इससे पहले जनवरी 2023 में भी धर्मांतरण के मुद्दे पर भारी हिंसा भड़की थी। तब आदिवासियों और दक्षिणपंथी समूहों की भीड़ ने एक स्कूल के अंदर बने चर्च में तोड़फोड़ की थी। उग्र भीड़ ने तत्कालीन पुलिस अधीक्षक सदानंद कुमार सहित कई पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमला कर दिया था, जिस मामले में एक भाजपा नेता की गिरफ्तारी भी हुई थी।

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