नई दिल्ली: धर्मांतरण कर चुके दलितों को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा देने के संवेदनशील मुद्दे पर जस्टिस (सेवानिवृत्त) के.जी. बालकृष्णन आयोग ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर ली है। लगभग चार साल के गहन अध्ययन के बाद, तीन सदस्यीय यह आयोग जल्द ही अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपने वाला है।
केंद्र सरकार ने इस जांच आयोग का गठन अक्टूबर 2022 में किया था। यह कदम ठीक उस समय उठाया गया था जब सुप्रीम कोर्ट दलित मुसलमानों और ईसाइयों को एससी का दर्जा देने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई शुरू करने वाला था। यह पूरा विवाद देश की शीर्ष अदालत में पिछले 20 सालों से लंबित है।
आयोग का मुख्य काम यह परखना था कि 1950 के संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश में शामिल धर्मों के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने वाले दलितों को एससी का दर्जा दिया जा सकता है या नहीं। वर्तमान व्यवस्था के तहत, केवल हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म के दलितों को ही यह दर्जा मिलता है। इसके विपरीत, अनुसूचित जनजाति (ST) के मामले में धर्म की ऐसी कोई बाध्यता नहीं है।
शुरुआत में आयोग को अपना काम पूरा करने के लिए दो साल का समय दिया गया था। हालांकि, साल 2024 से लेकर अब तक इसे कई बार सेवा विस्तार मिल चुका है। आखिरी बार इस साल अप्रैल में इसका कार्यकाल बढ़ाया गया था, जिसके तहत अंतिम समय सीमा 10 जून 2026 तय की गई थी।
अब रिपोर्ट को एक 'किताबी रूप' में अंतिम रूप दिया जा रहा है और आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि इसे कुछ ही दिनों में पेश कर दिया जाएगा। राजपत्र के रिकॉर्ड में अब आयोग को कोई नया सेवा विस्तार दिए जाने का जिक्र नहीं है।
सरकार ने आयोग को धर्मांतरित दलितों की मांग और इस मांग के विरोध का बारीकी से अध्ययन करने का निर्देश दिया था। साथ ही, यह भी जांचना था कि दूसरे धर्मों में जाने के बाद इन समुदायों को किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है और अगर उन्हें यह दर्जा मिलता है तो मौजूदा एससी समुदायों पर इसका क्या असर पड़ेगा।
इस बड़े संवैधानिक सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में अभी भी कई याचिकाएं लंबित हैं कि क्या दलित ईसाइयों और मुसलमानों को एससी का दर्जा दिया जा सकता है। हालांकि, हाल ही में आंध्र प्रदेश के एक ईसाई पादरी के मामले में शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया था कि एससी वर्गीकरण के लिए धर्म की बाध्यता पूर्ण रूप से लागू होती है।
इस पूरे मामले में केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्रालय का रुख भी बेहद स्पष्ट रहा है। मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि इस्लाम और ईसाई जैसे विदेशी मूल के धर्मों को अपनाने वालों को एससी का दर्जा नहीं मिलना चाहिए। सरकार का तर्क है कि वर्तमान में एससी सूची में शामिल धर्म पूरी तरह से भारतीय मूल के हैं।
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