
नागपुर- महाराष्ट्र विधानसभा में बजट सत्र के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री डॉ. नितिन राउत ने महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलिजन प्रोटेक्शन बिल (एंटी-कन्वर्जन बिल) का कड़ा विरोध किया। उन्होंने इसे राज्य की प्रगतिशील परंपरा पर कलंक और संविधान द्वारा गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया। डॉ. राउत ने कहा कि यह बिल महज एक कागजी मसौदा नहीं, बल्कि शाहू महाराज, ज्योतिराव फुले और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की विचारधारा को जड़ से उखाड़ फेंकने और धम्म दीक्षा की ऐतिहासिक विरासत को कमजोर करने की साजिश है।
विधानसभा में बिल पर अपनी राय रखते हुए डॉ. राउत ने संविधान के अनुच्छेद 25, 21 और 13 का हवाला देते हुए कहा कि संविधान हर नागरिक को अपनी पसंद का धर्म अपनाने, मानने और प्रचार करने का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट के 'पुट्टास्वामी' और 'हादिया' मामलों में स्पष्ट किया गया है कि विवाह या धर्म अपनाने का फैसला पूरी तरह निजी मामला है। लेकिन इस सरकार द्वारा जिला कलेक्टर के माध्यम से नागरिकों के निजी जीवन में हस्तक्षेप करना प्राइवेसी के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
डॉ. राउत ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि 13 अक्टूबर 1935 को येवला में बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा की गई घोषणा ने शोषित वर्गों को गुलामी की जंजीरों से मुक्ति का रास्ता दिखाया था। आज यह बिल दलित-वंचित भाइयों के सम्मानजनक जीवन के अधिकार पर हमला है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह बिल 'महाराष्ट्र में बना' नहीं, बल्कि गुजरात और उत्तर प्रदेश से 'आयातित' है।
बिल की तकनीकी खामियों पर प्रकाश डालते हुए डॉ. राउत ने 'रिवर्स ऑनस' प्रावधान की आलोचना की, जिसमें आरोपी को अपनी निर्दोषता साबित करनी पड़ती है, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। इससे समाज में स्वयंभू निगरानीकर्ताओं (vigilantes) की संख्या बढ़ेगी और अल्पसंख्यक समुदायों में डर का माहौल बनेगा।
सरकार पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि एक तरफ 'लाड़की बहिण' योजना से महिलाओं को सशक्त बनाने का दावा किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ उसी 'बहन' को पुलिस के चक्कर काटने पड़ते हैं कि वह किससे शादी करेगी या कौन सा धर्म अपनाएगी। डॉ. राउत ने इसे किसानों की बेरोजगारी, आत्महत्या और ड्रग्स की समस्या से ध्यान भटकाने की साजिश बताया।
अंत में उन्होंने चेतावनी दी कि राजनीतिक सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन इतिहास उन लोगों को कभी माफ नहीं करेगा जो लोकतंत्र को गला घोंटने की कोशिश करेंगे।
सोशल मीडिया पर भी डॉ. राउत को समर्थन मिला है। डॉ. नितिन राउत ने खुद X पर पोस्ट कर कहा, "मैंने विधानसभा में 'एंटी-कन्वर्जन बिल' का दृढ़ता से विरोध किया। यह कानून धर्म की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत liberty का उल्लंघन करता है तथा बी.आर. आंबेडकर, ज्योतिराव फुले और शाहू महाराज के आदर्शों के खिलाफ है। लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की लड़ाई जारी रहेगी।" अन्य पोस्ट्स में विपक्षी नेताओं और नागरिकों ने बिल को बाबासाहेब की भूमि पर अन्याय बताया, जिसमें AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इसे अन्य राज्यों के कानूनों से भी बदतर करार दिया।
ओवैसी ने कहा, " महाराष्ट्र का धर्मांतरण विरोधी बिल, UP जैसे सबसे खराब कानूनों से भी ज़्यादा बुरा है। ये कानून पहले से ही असली धर्मांतरण को भी अपराध मानते हैं, अलग-अलग धर्मों के जोड़ों के लिए शादी करना जोखिम भरा बना देते हैं, और धर्मांतरण के लिए पहले से इजाज़त लेना ज़रूरी कर देते हैं। लेकिन महाराष्ट्र का कानून अब धर्मांतरण के कागज़ात पर दस्तखत करने वाले किसी भी व्यक्ति को भी सज़ा देता है और ‘शिक्षा के ज़रिए ब्रेनवाशिंग’ करके धर्मांतरण करने पर रोक लगाता है। इन बड़े-बड़े शब्दों का इस्तेमाल लोगों को मनमाने ढंग से गिरफ्तार करने के लिए किया जा सकता है, और इस बिल का मकसद भी यही है। उदाहरण के लिए, अगर कोई किसी पवित्र किताब को पढ़ता है और किसी जानकार विद्वान से उस धर्म के बारे में सीखता है, तो क्या इसे ब्रेनवाशिंग माना जाएगा? यह पुलिस को बिना किसी शिकायत के, अपनी मर्ज़ी से ही जांच शुरू करने की इजाज़त भी देता है। असल में, इसका मतलब यह है कि भले ही किसी व्यक्ति के परिवार वाले उसके धर्मांतरण पर कोई ऐतराज़ न करें, फिर भी पुलिस उसे गिरफ्तार कर सकती है। विडंबना यह है कि ऐसा कानून बाबासाहेब अंबेडकर की धरती पर लाया जा रहा है — वही राज्य जहाँ उन्होंने 3 से 6 लाख लोगों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया था। यह निजता के अधिकार का खुला उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि इस अधिकार में किसी धर्म को चुनने या न चुनने की आज़ादी भी शामिल है। आखिर, संविधान की प्रस्तावना हर किसी को “विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना” की आज़ादी का वादा करती है।"
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