
मुंबई- आईआईटी बॉम्बे के छात्र समूह अंबेडकर पेरियार फुले स्टडी सर्कल (APPSC) का मानना है कि साहिल वाकोडे की मौत के मामले में संस्थान की आंतरिक जाँच का निष्कर्ष पहले ही तय हो चुका है। समूह के अनुसार, अनिकेत अंभोरे और दर्शन सोलंकी के मामलों की तरह इस प्रकरण में भी यही माना जाएगा कि कोई जातिगत भेदभाव नहीं हुआ। समूह ने आरोप लगाया कि संस्थान अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों की मौतों की जाँच एक तयशुदा "टेम्पलेट" पर करता है। उसने वाकोडे की मौत को "संस्थागत मौत" बताया है और स्वतंत्र बाहरी जाँच की माँग दोहराई।
रविवार को एक स्टेटमेंट में समूह ने पहले की दो आंतरिक समितियों की रिपोर्टों का हवाला दिया है। छात्रों के समूह ने बताया कि अनिकेत अंभोरे की आत्महत्या से हुई मौत के बाद प्रो. ए. के. सुरेश की अध्यक्षता में समिति बनी थी। समूह के अनुसार, उसकी रिपोर्ट (पृष्ठ 24) में निष्कर्ष दिया गया कि संस्थान और उसके आधिकारिक अंग न प्रकट रूप से और न परोक्ष रूप से किसी तरह का भेदभाव करते हैं।
दर्शन सोलंकी की मौत की जाँच के लिए प्रो. नंद किशोर की अध्यक्षता में बनी समिति ने अपनी रिपोर्ट (पृष्ठ 6) में कहा कि जिन लोगों से बात की गई, यानी दोस्त, विंग-मेट्स, शिक्षक, टीए, मेंटर और हॉस्टल-16 का स्टाफ, उनमें से किसी ने भी जाति आधारित या किसी अन्य भेदभाव का ज़िक्र नहीं किया। यह बात न सोलंकी ने खुद बताई थी, न उनके किसी मित्र ने।
APPSC का कहना है कि ये नतीजे स्वतंत्र जाँच के बजाय एक पैटर्न दिखाते हैं, "टेम्पलेट तैयार है और निष्कर्ष पहले से तय है।"
जाँच समितियों की कार्य प्रणाली पर सवाल उठाते हुए समूह ने कहा, "ये समितियाँ बोर्ड ऑफ गवर्नर्स द्वारा गठित होती हैं और जातिगत भेदभाव को जल्द खारिज करने की दिशा में तालमेल से काम करती हैं।" समूह का आरोप है कि वे अलग-थलग रहकर, एक सुनियोजित संस्थागत ढाँचे के भीतर, हर बार वही सीमित नमूना लेती हैं और अंत में संस्थान को हर आरोप से बरी कर देती हैं। बयान इन तदर्थ समितियों को "संस्थागत जड़ता का प्लेसहोल्डर" बताता है।
समूह ने समितियों की सामाजिक संरचना पर भी टिप्पणी की। उसके अनुसार, इनके सदस्य देश के सामाजिक ताने-बाने से अलग नहीं हैं, और उनके लिए जाति इसलिए अस्तित्व में नहीं है कि वह उनके जीवन का अंतरंग अनुभव नहीं है। समूह का कहना है कि भेदभाव को इस तरह सिरे से नकारना ही बताता है कि जातिगत विशेषाधिकार संस्थान के भीतर की असमानता को कैसे ढँक लेता है।
स्टूडेंट्स कलेक्टिव का कहना है कि जाँच में "जातिगत आक्रामकता के स्पष्ट कृत्यों" के प्रमाण माँगे जाते हैं। इससे एक बहुस्तरीय और सूक्ष्म परिघटना को सीमित कसौटी में बाँध दिया जाता है। समूह के अनुसार, इससे सबूत जुटाने का बोझ उसी व्यक्ति पर आ जाता है जो इसके लिए सबसे कम सक्षम है, क्योंकि "मंशा" और "स्पष्ट कृत्य" की परिभाषा प्रभुत्वशाली समूह ही तय करते हैं।
समूह ने परिसर की तैयारियों पर भी तीन सवाल उठाए:
स्कूल से अभी निकले छात्रों पर अधिकार रखने वाले लोगों को क्या जातिगत संवेदनशीलता का प्रशिक्षण मिला है?
क्या साथियों के बीच सामाजिक और भौतिक स्थिति की खाई को पहचानने और पाटने की कोई व्यवस्था है?
SC/ST छात्रों पर ही सुरक्षित और समावेशी माहौल बनाने का बोझ क्यों हो, जबकि वे पहले से योग्यता साबित करने का दोहरा बोझ उठाते हैं, "कोटे के कलंक" से जूझते हैं और अपनी जातिगत पहचान को लेकर लगातार सतर्क रहते हैं?
बयान में कहा गया है कि 25 जुलाई 2025 से सुकदेब साहा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश देश के हर शैक्षणिक संस्थान पर बाध्यकारी हैं। इनके तहत ज़रूरी है:
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में तत्काल रेफरल के लिए लिखित प्रोटोकॉल।
चेतावनी के संकेत पहचानने के लिए स्टाफ का साल में दो बार प्रशिक्षण।
विशेषकर परीक्षा अवधि के दौरान समर्पित मेंटर।
समूह का कहना है कि आईआईटी बॉम्बे प्रशासन इनमें से कई बिंदुओं पर दोषी है, लेकिन संस्थागत उदासीनता और "जाति-अंधी ताकतों के वर्चस्व" के कारण उसके हर मोड़ पर बरी हो जाने की आशंका है।
स्टेटमेंट आईआईटी की उस छवि पर सवाल उठाता है जिसमें उन्हें देश के सबसे प्रतिभाशाली दिमागों की मंज़िल बताया जाता है। समूह के अनुसार, रैंकिंग और शोध उत्पादन के प्रदर्शन से "अकादमिक उत्पादन की सुचारु मशीनरी" की छवि गढ़ी जाती है, जबकि जिस मेरिट का बखान होता है, वह "आधुनिकता और जातिविहीनता की भाषा में ढला सवर्ण वर्चस्व" है।
समूह का आरोप है कि व्यवस्था में अप्रत्यक्ष अपेक्षा यही है कि छात्र सवर्ण हों, जबकि वंचित छात्रों के लिए जगह "सीमित और बाधित" है। उसके अनुसार, जातिगत भेदभाव को स्वीकार करना उस उत्तर-औपनिवेशिक आधुनिकता और मेरिट की धारणा के लिए हानिकारक होगा जिसका जश्न विशेषाधिकार प्राप्त जातियाँ मनाती हैं।
आरटीआई आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया कि इस साल सितंबर तक आईआईटी बॉम्बे के 412 प्रोफेसरों में केवल 5 SC और 6 OBC वर्ग से हैं, जबकि ST समुदाय का कोई प्रोफेसर नहीं है। समूह के अनुसार, यह दर्शाता है कि ज्ञान-उत्पादन समाज के एक खास हिस्से तक सीमित है। छात्रों के समूह ने संस्थान के आदर्श वाक्य "ज्ञानं परमं ध्येयम्" का ज़िक्र करते हुए भी कहा कि संस्थान की ज्ञान-निर्माण प्रक्रिया "सवर्ण-प्रसारित ज्ञान की प्रतिध्वनि-कक्ष" है, जो उसे विविधता से रहित बनाती है।
स्टूडेंट्स कलेक्टिव का कहना है कि प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 1961 के तहत आईआईटी को "राष्ट्रीय महत्व के संस्थान" का दर्जा मिला है। विद्वान जयराम (2011) के हवाले से कहा गया है कि ये संस्थान स्वायत्त रूप से काम करते हैं और मोटे तौर पर सरकारी या राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रहे हैं।
समूह के अनुसार, अब समय आ गया है कि आईआईटी को गहन जाँच के दायरे में लाया जाए और हितधारकों व नागरिक समाज के बीच इन पर खुला संवाद हो। उसने संस्थान की "जातिगत भूलने की बीमारी" को "हास्यास्पद और हिंसक" बताया। बयान में यह भी कहा गया कि आईआईटी लंबे समय से छात्र राजनीति से मुक्त रहे हैं, जो लोकतांत्रिक ढाँचे में निंदनीय होना चाहिए। समूह का दावा है कि इन संस्थानों का उद्देश्य "आज्ञाकारी, जाति-अंधा और कुशल कार्यबल" तैयार करना है।
वाकोडे के मामले का उल्लेख करते हुए APPSC ने कहा कि यहाँ भी वही संस्थागत उदासीनता बरती जाएगी और आईआईटी की उत्कृष्टता व प्रतिष्ठा का "छलावा" बिना चुनौती के कायम है। समूह ने अपनी मांगे दोहराते हुए संस्थागत हस्तक्षेप या आरोपी के "बिना शर्त समर्थन" के बिना बाहरी और स्वतंत्र जाँच की मांग की, उनकी मांग है कि समिति की अध्यक्षता SC/ST वर्ग का कोई व्यक्ति करे और कम से कम एक बाहरी विशेषज्ञ सदस्य हो, ताकि निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित हो। समिति में कम से कम 50% SC/ST प्रतिनिधित्व हो और विभिन्न विषयों से कम से कम 50% महिला सदस्य हो।
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