तीन हफ्ते बाद सरेंडर करेगा स्वतंत्र भारद्वाज: दिल्ली कोर्ट ने अंतरिम जमानत तो दी लेकिन लगाईं ये पाबंदियाँ, पूरी खबर पढ़ें

पुलिस जांच में खामियों का आरोपी को मिला लाभ! जज ने कहा- “जमानत अदालत के भरोसे का इजहार है, ट्रॉफी नहीं जिसे दिखाया जाए।”
जमानत अवधि में स्वतंत्र भारद्वाज को निशु आज़ाद के परिवार से दूर रहने के निर्देश हैं और सोशल मीडिया पर केस से जुड़े कंटेंट डालने पर मनाही है।
जमानत अवधि में स्वतंत्र भारद्वाज को निशु आज़ाद के परिवार से दूर रहने के निर्देश हैं और सोशल मीडिया पर केस से जुड़े कंटेंट डालने पर मनाही है।
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नई दिल्ली। दलित कंटेंट क्रिएटर निशु आज़ाद के पिता संजय कुमार पर जून माह में जानलेवा हमला करने के आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज को पटियाला हाउस कोर्ट ने 3 सप्ताह की अंतरिम जमानत तो दी लेकिन अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ प्रताप सिंह ललर ने साफ निर्देश दिया है कि इस अवधि में वे मामले, अपनी डिफेंस या शिकायतकर्ता परिवार के बारे में कोई बयान, वीडियो, पॉडकास्ट, इंटरव्यू, रील या पोस्ट किसी पब्लिक प्लेटफॉर्म पर न बनाएँ, न अपलोड करें, न शेयर करें। नियमित जमानत या अंतरिम जमानत बढ़ाने की सुनवाई 6 अक्टूबर तय हुई।

कोर्ट ने कहा कि डिजिटल युग में पीड़ित को डराने के लिए पास खड़े होना जरूरी नहीं। सोशल मीडिया पर हमले की डींग पूरे परिवार तक ज्यादा दूर और स्थायी रूप से पहुँचती है। अनुच्छेद 19(1)(ए) की स्वतंत्रता असीम नहीं। लंबित मामले को जनता के सामने ट्रायल करना या पीड़ित को दबाना अभिव्यक्ति की छूट नहीं। जज ने कहा- “जमानत अदालत के भरोसे का इजहार है, ट्रॉफी नहीं जिसे दिखाया जाए।”

अभियोजन का पक्ष है कि 23 जून को शिकायतकर्ता संजय कुमार अपनी बेटी और दोस्त के साथ जंतर-मंतर प्रदर्शन में थे। वीडियो बनाने पर आपत्ति हुई। भारद्वाज और साथियों ने घेरकर मुक्कों और कड़े जैसे सख्त औजार से हमला किया। सिर पर दो घाव बताए गए। पहले FIR संसद मार्ग थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 115(2), 126(2) में बेलयोग्य अपराधों पर दर्ज हुई। भारद्वाज BNSS की धारा 35(3) के नोटिस पर पेश हुए, तब गिरफ्तार नहीं हुए। 4 सितंबर को पूरक बयान में अनुसूचित जाति होने और जातिवादी टिप्पणी का आरोप आया। इसके बाद SC/ST एक्ट और धारा 351(3) जोड़ी गई, गिरफ्तारी हुई।

जमानत अवधि में स्वतंत्र भारद्वाज को निशु आज़ाद के परिवार से दूर रहने के निर्देश हैं और सोशल मीडिया पर केस से जुड़े कंटेंट डालने पर मनाही है।
जंतर-मंतर पर दलित एक्टिविस्ट के पिता से मारपीट के आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज को 3 हफ्ते की अंतरिम जमानत
कोर्ट ने नोट किया कि मूल FIR में जातिवादी गाली नहीं थी, आरोप घटना के करीब दस हफ्ते बाद आया। विलंबित आरोप अपने आप झूठ नहीं होता, न ही जमानत के चरण में सच्चाई तय की जा सकती; वजन जरूर प्रभावित होता है। अदालत ने कहा कि कई नंबरों से शिकायतकर्ता और नाबालिग बेटी को भेजे गए गाली-गलौज और यौन संदेश मौजूदा सामग्री के आधार पर भारद्वाज से नहीं जोड़े जा सके, लेकिन ये दिखाते हैं कि सार्वजनिक टिप्पणी पीड़ित परिवार के खिलाफ नफरत पैदा कर सकती है।

पुलिस जांच में रहीं ये कमियां

जांच पर कोर्ट ने खामियाँ गिनाईं। पुलिस ने पॉडकास्ट का हवाला जमानत का विरोध करने में दिया, लेकिन चैनल संचालक की पूछताछ, मूल फुटेज मंगवाना और फॉरेंसिक जांच का जिक्र जवाब में नहीं था। जंतर-मंतर के सीसीटीवी, तैनात पुलिस के रिकॉर्डिंग, कॉल डिटेल और लोकेशन डेटा पर भी जवाब चुप था। कोर्ट ने इन्हें बुनियादी कदम बताते हुए आईओ से स्टेटस रिपोर्ट मांगी जिसमें सीसीटीवी, पुलिस रिकॉर्डिंग, सीडीआर, टावर लोकेशन, सोशल मीडिया अकाउंट डिटेल, पॉडकास्ट संचालक की जांच और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री की फॉरेंसिक जांच कि सामग्री असली है, मॉर्फ़्ड है या एआई से बनी, आदि ये जानकारियां तलब की है।

गैर-सहयोग के रूप में मोबाइल और साथियों के नाम न बताने का हवाला आया। कोर्ट ने कहा कि यह शर्त से पूरा हो सकता है। असली खतरा शारीरिक नहीं, पब्लिक प्लेटफॉर्म से गवाह प्रभावित होना है; इसके लिए सख्त, सीमित शर्तें काफी, अनिश्चितकालीन हिरासत नहीं। आरोप अधिकतम सात साल तक की सजा वाले हैं, कस्टोडियल पूछताछ पूरी हो चुकी। पीड़ित के संरक्षण और आरोपी की अनुच्छेद 21 की स्वतंत्रता का संतुलन करते हुए तीन हफ्ते की अंतरिम जमानत दी गई।

अन्य शर्तों में आरोपी पर पाबंदी है कि वह शिकायतकर्ता, नाबालिग बेटी, परिवार या अभियोजन गवाहों से संपर्क नहीं करेगा; सबूत से छेड़छाड़ नहीं करेगा; जब बुलाया जाए जांच में शामिल होना पड़ेगा ; बिना अनुमति देश नहीं छोड़ेगा ; जमानत अवधि खत्म होते ही सरेंडर करना है।

जमानत अवधि में स्वतंत्र भारद्वाज को निशु आज़ाद के परिवार से दूर रहने के निर्देश हैं और सोशल मीडिया पर केस से जुड़े कंटेंट डालने पर मनाही है।
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