
नई दिल्ली: दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने 14 वर्षीय सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर नीशू आजाद के पिता पर कथित हमले के मामले में स्वतंत्र भारद्वाज को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दे दी है। यह घटना जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई थी। अदालत ने जमानत याचिका पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के अगले दिन यह राहत प्रदान की।
सुनवाई के दौरान अदालत ने दिल्ली पुलिस से पूछा कि क्या 23 जून की घटना में भारद्वाज ने किसी जातिगत अपशब्द का इस्तेमाल किया था। इस पर पुलिस ने स्पष्ट किया कि शुरुआती शिकायत में ऐसी कोई बात दर्ज नहीं थी। यह आरोप तब सामने आया जब शिकायतकर्ता का बयान दोबारा दर्ज किया गया, जिसके आधार पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएं जोड़ी गईं।
बचाव पक्ष के वकील ने अदालत को बताया कि भारद्वाज के खिलाफ पहली एफआईआर 23 जून को ही दर्ज कर ली गई थी। इसके बाद पुलिस ने 27 जून को नोटिस जारी कर उन्हें जांच में शामिल होने को कहा। वे 29 जून को पूछताछ के लिए पेश भी हुए, जिसके बाद उन्हें जाने दिया गया।
वकील ने दावा किया कि 4 सितंबर को हुए राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण भारद्वाज की गिरफ्तारी हुई और उनकी गिरफ्तारी के बाद एक और एफआईआर दर्ज की गई। बचाव पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान शिकायतकर्ता ने खुद भारद्वाज पर हमला किया था। अदालत में सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो भी चलाया गया, जिसके हवाले से वकील ने कहा कि इसमें साफ दिख रहा है कि भारद्वाज गिर गए थे और पुलिस ने उन्हें बचाया।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता के वकील ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि भारद्वाज की गिरफ्तारी पूरी तरह कानूनी है। उन्होंने बताया कि इस मामले में एससी/एसटी एक्ट और पॉक्सो (POCSO) एक्ट समेत कुल चार एफआईआर दर्ज की गई हैं। वकील ने एक अन्य वीडियो का भी जिक्र किया जिसमें भारद्वाज कथित तौर पर मारपीट की बात कबूल करते नजर आ रहे हैं और दलील दी कि जांच अभी शुरुआती चरण में है।
अंतरिम जमानत का यह आदेश ऐसे समय में आया है जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने नीशू आजाद को मिल रही धमकियों और उत्पीड़न की रिपोर्ट तलब की थी। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी नाबालिग के उत्पीड़न के आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने जोर देकर कहा कि कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए किसी बच्ची और उसके परिवार पर दबाव नहीं डाला जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को एफआईआर का विस्तृत ब्योरा, पीड़ित परिवार की सुरक्षा व्यवस्था और आरोपियों के खिलाफ की गई कार्रवाई की जानकारी देने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से भी यह सुनिश्चित करने को कहा कि लड़की की शिकायत पर उचित कदम उठाए जाएं।
शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान पीड़िता के वकील ने चिंता जताते हुए कहा कि 23 जून के हमले में भारद्वाज के साथ मौजूद लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि वीडियो में हमलावरों के साथ चार पुलिसकर्मी भी दिखाई दे रहे हैं और लड़की के घर पर पथराव भी किया गया है। वकील ने कहा कि अगर बच्ची के साथ कोई अनहोनी होती है, तो उन चीजों को वापस ठीक नहीं किया जा सकेगा।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने बेहद सख्त लहजे में कहा कि अगर बच्चों के खिलाफ हिंसा करने वाले असामाजिक तत्व खुलेआम घूम रहे हैं और बच्ची को डराने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह एक गंभीर चिंता का विषय है। इस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। इसी क्रम में न्यायमूर्ति बागची ने अधिकारियों को लड़की और उसके परिवार को तुरंत पुलिस सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दिया।
गौरतलब है कि स्वतंत्र भारद्वाज को 4 सितंबर को एक विवादास्पद इंटरव्यू के वायरल होने के बाद गिरफ्तार किया गया था। उस इंटरव्यू में उन्होंने कथित तौर पर दावा किया था कि उन्होंने लड़की के पिता का सिर फोड़ दिया है और अपने राजनीतिक रसूख के चलते वे गिरफ्तारी से बचे हुए हैं। जब लड़की ने इस हमले के खिलाफ आवाज उठाई और पुलिस से संपर्क किया, तो उसे बलात्कार की धमकियां दी गईं, गालियां दी गईं और उसकी आपत्तिजनक तस्वीरें भी प्रसारित की गईं।
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