
मुंबई- मुंबई के सिटी सिविल एंड सेशंस कोर्ट ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) परिसर में अक्टूबर 2025 में प्रो. जीएन साईबाबा को श्रद्धांजलि देने और कथित तौर पर उमर खालिद तथा शरजील इमाम की रिहाई के नारे लगाने से जुड़े मामले में दो स्टूडेंट्स की अग्रिम जमानत याचिका पर अलग-अलग फैसला सुनाया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वी. बी. बोहरा ने अभिरूप पॉल की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी, जबकि निकिता मोनिका डिसूजा को कुछ शर्तों के साथ गिरफ्तारी की स्थिति में अग्रिम जमानत दे दी। आदेश 7 अगस्त को सुनाया गया।
यह मामला मुंबई के ट्रॉम्बे पुलिस स्टेशन में दर्ज क्राइम नंबर 464/2025 और बाद में CID यूनिट द्वारा दर्ज क्राइम नंबर 107/2025 से संबंधित है। आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 189(2), 190, 192, 196, 197, 223 और 61(2)(a) तथा महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। जांच पहले ट्रॉम्बे पुलिस ने शुरू की थी, जिसे बाद में अपराध जांच विभाग (CID) ने अपने हाथ में ले लिया।
अभियोजन के अनुसार, 12 अक्टूबर 2025 की शाम TISS परिसर में हॉस्टल नंबर 4 के सामने करीब 10 से 12 छात्र बिना संस्थान प्रशासन की पूर्व अनुमति के जीएन साईबाबा को श्रद्धांजलि देने के लिए एकत्र हुए थे। FIR के मुताबिक, इस दौरान कथित तौर पर “उमर खालिद को रिहा करो” और “शरजील इमाम को रिहा करो” जैसे नारे लगाए गए। FIR में कुल नौ लोगों को नामजद किया गया था।
आरोपियों की ओर से अदालत में कहा गया कि वे छात्र हैं और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप झूठे और निराधार हैं। उनका कहना था कि उन्होंने मानवाधिकारों के क्षेत्र में जीएन साईबाबा के योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी थी। छात्रों का तर्क है कि चूंकि यह किसी विशेष छात्र समूह द्वारा आयोजित औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक सहज सभा थी, इसलिए प्रशासन से अनुमति लेने की जरूरत नहीं समझी गई। उन्होंने यह भी कहा कि कार्यक्रम कैंपस सुरक्षा गार्ड्स की मौजूदगी में हुआ और यदि गार्ड्स ने रोका होता तो वे तुरंत रुक जाते।
उन्होंने उमर खालिद या शरजील इमाम की रिहाई के लिए कोई नारा लगाने से इनकार किया और कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों से कथित अपराधों के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि दोनों के खिलाफ कोई आपराधिक पूर्ववृत्त नहीं है और वे जांच एजेंसी के साथ सहयोग कर चुके हैं।
राज्य की ओर से इसका विरोध किया गया। जांच अधिकारी और विशेष लोक अभियोजक ने अदालत को बताया कि जीएन साईबाबा को पहले गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA और IPC के तहत दोषी ठहराया गया था, हालांकि बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने 5 मार्च 2024 को उन्हें बरी कर दिया था। राज्य के अनुसार, 12 अक्टूबर 2025 को आरोपियों ने TISS परिसर में उन्हें श्रद्धांजलि दी और इस दौरान कथित तौर पर उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के नारे लगाए।
अभियोजन ने अभिरूप पॉल से जुड़े डिजिटल उपकरणों की जांच का भी हवाला दिया। अदालत के आदेश के मुताबिक, उसके लैपटॉप और मोबाइल फोन से कुछ ऐसी किताबें डाउनलोड मिलीं जिन्हें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) से जुड़े सदस्यों द्वारा प्रकाशित बताया गया। जांच के दौरान उसके मोबाइल फोन में व्हाट्सऐप चैटिंग, अलग-अलग स्थानों पर फील्ड वर्क से संबंधित जानकारी और कुछ डिलीट की गई सामग्री मिलने की बात भी अदालत के सामने रखी गई। अभियोजन ने इन सामग्रियों के आधार पर अबीरूप के कथित माओवादी विचारधारा से प्रभावित होने का आरोप लगाया।
अदालत ने हालांकि स्पष्ट किया कि केवल माओवादी संगठन से जुड़ी किताबें डाउनलोड करना अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन अदालत के मुताबिक इस मामले में जांच के दौरान किताबें डाउनलोड करने के साथ-साथ आरोपी के विभिन्न स्थानों पर कथित फील्ड वर्क करने की जानकारी भी सामने आई थी। अदालत ने कहा कि इस पृष्ठभूमि में यह पता लगाने के लिए अभिरूप की हिरासत में पूछताछ जरूरी है कि उसने ये किताबें किस उद्देश्य से डाउनलोड की थीं और इसका कथित नारों तथा अन्य गतिविधियों से क्या संबंध था। अदालत ने यह भी कहा कि जांच एजेंसी को यह पता लगाना है कि उसका किसी प्रतिबंधित संगठन से कोई संबंध था या नहीं।
जीएन साईबाबा को श्रद्धांजलि देने के सवाल पर अदालत ने कहा कि साईबाबा को श्रद्धांजलि देना अपने आप में गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट ने 5 मार्च 2024 को मामले में बरी कर दिया था। हालांकि अदालत ने कहा कि उसके सामने मौजूद आरोपों के मुताबिक कार्यक्रम केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं था और उसमें उमर खालिद तथा शरजील इमाम की रिहाई के कथित नारे भी शामिल थे। अदालत ने यह भी नोट किया कि ये दोनों UAPA के तहत मामलों का सामना कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर चुका है।
न्यायालय ने कार्यक्रम में इस्तेमाल किए गए “Rest in Power (1967- Forever)” शब्दों का भी उल्लेख किया। आदेश में कहा गया कि आम तौर पर किसी दिवंगत व्यक्ति के लिए “Rest in Peace” शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि आरोपियों ने “Rest in Power” लिखा। अदालत ने कहा कि यह गतिविधि संस्थान परिसर में बिना प्रशासन की अनुमति के हुई थी और अबीरूप के पास मिली अन्य सामग्री के साथ इसे देखते हुए उसके आचरण पर संदेह पैदा होता है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के कृत्य को अकेले आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता।
अभिरूप की ओर से जिन न्यायिक फैसलों का हवाला दिया गया, उनमें बॉम्बे हाईकोर्ट के उर्वशी चूड़ावाला मामले का फैसला भी शामिल था। अदालत ने कहा कि उस मामले में परिस्थितियां अलग थीं। उर्वशी चूड़ावाला के मामले में शांतिपूर्ण सार्वजनिक सभा और मौलिक अधिकार के तहत असहमति व्यक्त करने के संदर्भ को ध्यान में रखते हुए अग्रिम जमानत दी गई थी। मौजूदा मामले में अदालत ने कहा कि आरोपी बिना प्रशासन की अनुमति के संस्थान परिसर में एकत्र हुए थे और कथित तौर पर ऐसे व्यक्तियों की रिहाई के नारे लगाए गए जिनकी जमानत सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज की जा चुकी थी। इसलिए अबीरूप को उस फैसले का लाभ नहीं दिया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि अभिरूप के संबंध में जांच एजेंसी के पास मौजूद सामग्री पर पूछताछ जरूरी है। आदेश में Progressive Students Forum की उसकी कथित सदस्यता और संस्थान प्रशासन पर सोशल मीडिया के माध्यम से दबाव बनाए जाने के अभियोजन के आरोपों का भी उल्लेख किया गया है। एक अभियोजन गवाह को कथित तौर पर धमकी दिए जाने की बात भी अदालत के सामने रखी गई। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने माना कि मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए अभिरूप की हिरासत में पूछताछ आवश्यक है। इसलिए उसे अग्रिम जमानत देने के पर्याप्त आधार नहीं पाए गए।
वहीं निकिता मोनिका डिसूजा के मामले में अदालत ने अलग रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि उसके खिलाफ मुख्य आरोप यह है कि वह घटना के समय मौके पर मौजूद थी और कथित कार्यक्रम में सक्रिय रूप से शामिल हुई थी। उसके खिलाफ इसके अलावा कोई अन्य गंभीर आरोप नहीं बताया गया और उसके पास से कोई आपत्तिजनक सामग्री मिलने की बात भी सामने नहीं आई। अदालत ने यह भी नोट किया कि उसने पहले जांच एजेंसी के साथ सहयोग किया है। इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि उचित शर्तें लगाकर जांच एजेंसी के हितों की रक्षा की जा सकती है।
अदालत ने निकिता को गिरफ्तारी की स्थिति में 25,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की एक जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। उसे जांच अधिकारी के लिखित निर्देश पर CID यूनिट-6, चेंबूर में उपस्थित होकर जांच में सहयोग करना होगा। इसके अलावा उसे मामले से जुड़े किसी व्यक्ति को प्रभावित, धमकाने या दबाव डालने से रोक दिया गया है। अदालत की अनुमति के बिना वह भारत से बाहर भी नहीं जा सकती।
इस तरह कोर्ट ने दोनों आरोपियों को समान राहत नहीं दी। अभिरूप पॉल की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई, जबकि निकिता डिसूजा को शर्तों के साथ अग्रिम जमानत प्रदान की गई। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि इस स्तर पर जमानत पर विचार करते समय अदालत को FIR में प्रथमदृष्टया सामने आए मामले को देखना होता है और जांच के पूरे साक्ष्यों का विस्तृत विश्लेषण करना उचित नहीं है, क्योंकि इससे जांच प्रभावित हो सकती है।
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