
नई दिल्ली- दिल्ली पुलिस ने 20 जुलाई को "चलो संसद" मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन इस्तेमाल करने के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पुलिस ने इसे "पूरी तरह झूठा और भ्रामक" बताया है और कहा कि उसके पास पेलेट गन है ही नहीं।
लेकिन द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा आहूत संसद मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई में घायल हुए करीब 80 प्रदर्शनकारियों में से एक को पेलेट गन से चोट आई है। लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के सूत्रों ने यह जानकारी दी, जहां घायल व्यक्ति का इलाज चल रहा है। शेख इरशाद मंसूरी (25) के दोस्त ने द हिंदू को बताया कि उन्हें कनॉट प्लेस के पालिका बाजार के पास यूनिफॉर्म में एक RAF जवान ने मारा।
यह दिल्ली में सुरक्षाबलों द्वारा आम नागरिकों पर पेलेट गन का पहला ज्ञात मामला माना जा रहा है। 21 जुलाई को एक महिला को शॉक बैटन (इलेक्ट्रिक शॉक देने वाली छड़ी) से बेहोश करने का वीडियो भी सामने आया। यह दिल्ली में शॉक बैटन के इस्तेमाल का भी पहला ज्ञात मामला है। पेलेट गन और शॉक बैटन RAF के उपकरणों का हिस्सा हैं, जो CRPF के अंतर्गत आता है और 20 जुलाई को जंतर मंतर क्षेत्र में दिल्ली पुलिस के साथ तैनात किया गया था।
इधर, दिल्ली पुलिस ने इस बात का खंडन कियाऔर कहा कि यह दावा पूरी तरह से गलत और गुमराह करने वाला है कि दिल्ली पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया। सोशल मीडिया पोस्ट में कहा गया कि "दिल्ली पुलिस के पास न तो पैलेट गन हैं और न ही वे चल रहे विरोध-प्रदर्शन में इनका इस्तेमाल कर रहे हैं। जनता से अनुरोध है कि वे किसी भी बिना पुष्टि वाली या गुमराह करने वाली जानकारी को शेयर या फैलाएं नहीं।"
आपको बता दें 20 जुलाई को हजारों युवा प्रदर्शनकारी, ज्यादातर छात्र, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद की ओर बढ़े। बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश के बाद दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने कई जगहों पर लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। दोनों पक्षों में घायल हुए लोग, कुछ जगहों पर तोड़फोड़ और पथराव की खबरें आईं।
दिल्ली पुलिस के अनुसार 118 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए, जबकि प्रदर्शनकारियों की संख्या भी दर्जनों बताई जा रही है। करीब 70 लोगों को हिरासत में लिया गया। दिल्ली पुलिस द्वारा स्टूडेंट्स के बर्बरता से पीटने के कई विडियो सामने आया जिसके बाद देशभर में आक्रोश की लहर छा गई। उसी शाम को कई शहरों में लोगों ने विरोध प्रदर्शन किये।
21 जुलाई को कांग्रेस के राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा समेत नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर प्रदर्शन किया। छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाई गई। कई नेताओं को हिरासत में लिया गया जिन्हें देर रात को रिहा किया।
दिल्ली की घटनाओं ने पूरे देश में आक्रोश फैला दिया। कई शहरों में एकजुटता प्रदर्शन हुए।
कैंपेन अगेंस्ट स्टेट रेप्रेशन ने दिल्ली में युवाओं के खिलाफ क्रूर दमन की निंदा की है। CASR ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और पेलेट गन के इस्तेमाल की आलोचना करते हुए स्वतंत्र जांच, दोषियों पर कार्रवाई और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की मांग की है। संगठन ने एक बयान जारी कर कहा कि सरकार की प्रतिक्रिया सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक असहमति को हिंसक रूप से कुचलने की थी। "दिल्ली पुलिस ने अर्धसैनिक बलों के साथ मिलकर प्रदर्शनकारियों पर बार-बार लाठीचार्ज, आंसू गैस और पैलेट गन का इस्तेमाल करके सुनियोजित हमला किया। इस कार्रवाई के दौरान कई प्रदर्शनकारी गंभीर रूप से घायल हो गए। ऐसी परेशान करने वाली तस्वीरें भी सामने आई हैं जिनमें वर्दीधारी पुलिसकर्मियों के साथ-साथ सादे कपड़ों में लोग महिलाओं सहित प्रदर्शनकारियों पर हमला करते दिख रहे हैं; इससे नागरिकों के ख़िलाफ़ सरकारी हिंसा में अज्ञात लोगों के इस्तेमाल को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा होती हैं।"
सगंठन ने कहा, "दिल्ली में पैलेट गन का कथित इस्तेमाल चिंता बढाती है, एक दशक से ज़्यादा समय से, पैलेट गन कश्मीर में देखे गए बेरहम दमन का पर्याय बन गई हैं, जहाँ बच्चों और युवाओं सहित हज़ारों आम नागरिकों को हमेशा के लिए अंधापन और जीवन बदलने वाली चोटों का सामना करना पड़ा है। आम नागरिकों के ख़िलाफ़ इनके इस्तेमाल की कई मानवाधिकार संगठनों ने आलोचना की है क्योंकि इनसे अंधाधुंध और कभी न ठीक होने वाला नुकसान होता है। राष्ट्रीय राजधानी में प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ पैलेट गन का इस्तेमाल कश्मीर से दिल्ली तक दमन के इस मॉडल के बेहद चिंताजनक विस्तार को दर्शाता है। अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे नागरिकों के ख़िलाफ़ ऐसे हथियारों का सामान्य इस्तेमाल संवैधानिक आज़ादी के खतरनाक ह्रास का संकेत देता है और सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों के प्रति सरकार के बढ़ते सैन्यवादी रवैये को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा करता है।" साथ ही CASR ने कहा कि दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल की भूमिका गंभीर चिंताएं पैदा करती है, दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के इंस्पेक्टर निशांत दहिया को प्रदर्शनकारियों पर हमले में शामिल दिखाया गया है।
इस घटनाक्रम को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता। इस साल मार्च में, दस कार्यकर्ताओं जिनमें छात्र कार्यकर्ता और मज़दूर अधिकार कार्यकर्ता शामिल थे, को दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के अधिकारियों ने न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी स्थित कार्यालय में अवैध रूप से अगवा किया, हिरासत में लिया और बेरहमी से प्रताड़ित किया। हिरासत में लेने की वे अवैध घटनाएं और हिरासत में प्रताड़ना के आरोप इंस्पेक्टर निशांत दहिया की देखरेख में हुए थे। इन घटनाओं से जुड़ी कार्यवाही अभी दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है।
CASR ने अपने बयान में कहा कि एक बड़े लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन को दबाने में उसी अधिकारी की भागीदारी एक परेशान करने वाले पैटर्न को दिखाती है, जिसमें आतंकवाद-रोधी विशेष पुलिस इकाइयों को वास्तविक सुरक्षा खतरों के बजाय लोकतांत्रिक आंदोलनों के ख़िलाफ़ तैनात किया जा रहा है। यह बात भी उतनी ही चिंताजनक है कि ऐसे अधिकारी को वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। जिन अधिकारियों पर हिरासत में यातना देने और मानवाधिकारों के उल्लंघन के गंभीर आरोप हों और जिनकी न्यायिक जांच चल रही हो, उन्हें पुरस्कृत करना बिना सज़ा के बच निकलने का एक खतरनाक संदेश देता है।
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