
जंतर मंतर आंदोलन और ऐतिहासिक संसद मार्च ने युवा आक्रोश को ठोस अभिव्यक्ति की है। यह आंदोलन अब क्या दिशा लेगा, यह भविष्य बताएगा। लेकिन इसे आरंभ से फॉलो।करने के नाते इसके एक विशिष्ट पहलू पर बात करना जरूरी लगा। वह है, सीपीआई एमएल महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य का मास्टरस्ट्रोक। उन्होंने पहले ही दिन से इसमें बिनाशर्त, सक्रिय भागीदारी नहीं की होती, तो शायद आज इतनी बड़ी उपलब्धि दिखना मुश्किल था।
कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत महज एक संयोग से हुई। सीजीआई के कॉकरोच वाले वक्तव्य के बाद इसे मजाक में बनाया गया था। खुद अभिजीत को नहीं मालूम था कि यह इतनी बड़ी बात हो जाएगी। सिलसिला चल पड़ा तो अभिजीत ने भी हिम्मत दिखाकर इसे अंजाम तक पहुंचाने का फैसला लिया। अभिजीत के आम आदमी पार्टी से रिश्ते सर्व विदित हैं। इसलिए प्रारम्भ में ही इसे आम आदमी पार्टी द्वारा प्रायोजित बताने का प्रयास किया गया। कुछ लोगों ने तो भाजपा द्वारा आयोजित आंदोलन तक कह दिया।
दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी ने इस आंदोलन को पूरा समर्थन देते हुए बेहद संतुलित तरीके से सम्मानजनक दूरी बनाए रखी ताकि इसे आप की बी टीम न कहा जाए। लेकिन आंदोलन के प्रारम्भ से ही भाजपा और कांग्रेस इकोसिस्टम के जरिए कई तरह के झूठ और भ्रम के माध्यम से बदनाम करने की कोशिश की गई। ऐसा लग रहा था कि इस बड़ी संभावना की भ्रूण हत्या हो जाएगी।
जबकि यह विषय किसी अभिजीत दिपके या तथाकथित कॉकरोच जनता पार्टी का नहीं था। यह नीट तथा अन्य तमाम परीक्षाओं में भयंकर अनियमितता, बेरोजगारी जैसे विषयों के खिलाफ युवा आक्रोश की अभिव्यक्ति थी। सीजेपी की यह बात आसानी से दिल को छूने वाली थी कि "यह सिस्टम देश के युवाओं को कॉकरोच समझता है।"
इस बात ने एक चिंगारी का काम किया। सोशल मीडिया के जरिये ढाई करोड़ से युवाओं के समर्थन के साथ एक बड़ी ताकत उभरकर सामने आई।
हालांकि कांग्रेस और भाजपा से जुड़े आईटी सेल और बुद्धिजीवियों के साथ ही गोदी मीडिया और कुछ यूट्यूबर्स ने जबरदस्त कुप्रचार अभियान प्रारम्भ कर दिया। ऐसा लग रहा था कि इसे शुरुआत के पहले ही खत्म कर दिया जाएगा। अभिजीत दिपके के भारत लौटने वाले दिन 6 जून को जंतर मंतर पर प्रदर्शन को लेकर काफी झूठ फैलाया गया। लेकिन उसी दिन माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने जंतर-मंतर बिना शर्त खुला समर्थन जाहिर किया। यह सिर्फ नैतिक समर्थन नहीं था बल्कि माले के छात्र संगठन आइसा ने इसमें बढ़-चढ़कर भूमिका निभाई। बाद में अनशन की शुरुआत हुई तो कॉमरेड नेहा सहित 6 युवाओं ने भी इसमें हिस्सा लेकर अंत तक टिकाए रखा।
इसमें खास बात यह रही कि आइसा ने अपना कोई भी एजेंडा नहीं थोपा। सीजेपी के आंदोलन के समानांतर आइसा के साथियों ने अनशन करते हुए भी ऐसा कभी अलग प्लेटफॉर्म का एहसास नहीं होने दिया।
सीजेपी की रणनीति थी कि सिर्फ पेपरलीक और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर केंद्रित करके संभावित भटकाव को रोका जाए। आइसा ने इसे पूरी शिद्दत से निभाया। वाम आंदोलन की पारंपरिक शब्दावली को बेहद खूबसूरती से युवाओं के सवालों, परीक्षाओं में अनियमितता और मंत्रियों की जवाबदेही से जोड़ दिया। यही कारण है कुछ लोगों द्वारा भ्रामक सवालों के बावजूद सीजेपी और आइसा के साथियों के बीच कोई मतभेद नहीं दिखा। यह जनता के किसी हिस्से के स्वतःस्फूर्त आंदोलन में सहभागिता का शानदार उदाहरण है।
कामरेड दीपंकर की इस दूरगामी रणनीति ने मास्टर स्ट्रोक का काम किया। जो लोग अभिजीत और सीजेपी को आम आदमी पार्टी की 'बी' टीम बताकर खारिज कर रहे थे, उनके लिए यह आसान नहीं रहा। वामपंथी संगठनों की सक्रिय भागीदारी ने सीजेपी आंदोलन को एक बड़ी विश्वसनीयता प्रदान की। आंदोलन के भटकाव और बिखराव को रोकने में भी यह पहल बेहद सकारात्मक रही। जब 18 जुलाई को सोनम वांगचुक को उठाकर ले जाया गया, तब आइसा के साथियों ने अपना अनशन जारी रखने की घोषणा करके आंदोलन को निरंतरता प्रदान की। हालांकि इस पूरे दौर में आइसा ने कभी खुद को श्रेष्ठ दिखाने या नेतृत्व छीन लेने की कोई कोशिश नहीं की।
यह किसी जन आंदोलन को अंदर और बाहर से बिना शर्त समर्थन करने का और उसमें बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाने का बेहद रचनात्मक और साहसिक प्रयोग कहा जाएगा। इस आंदोलन की प्रगति क्या होगी और आगे यह किस दिशा में जाएगा यह देखना अभी बाकी है। लेकिन इतनी बात निश्चित है कि अगर माले का व्यापक नैतिक समर्थन वाले सहित अन्य दलों का व्यापक नैतिक समर्थन और आइसा सहित अन्य छात्र संगठनों एवं छात्र संगठनों की सक्रिय भागीदारी नहीं होती तो इस आंदोलन को अधिक बदनामी, कुप्रचार और बिखराव का सामना करना पड़ता।
प्रारंभ में प्रोग्रेसिव खेमे के जो लोग इस आंदोलन को खारिज कर रहे थे, उन्हें दीपांकर भट्टाचार्य की भागीदारी के कारण दोबारा सोचने को मजबूर होना पड़ा। दिलचस्प यह है कि जब इस आंदोलन की गूंज संसद तक सुनाई देने लगी, तब कुछ आलोचकों ने आइसा के बहाने आंदोलन का समर्थन शुरू किया। यह बताते हुए कि हम आइसा का समर्थन कर रहे हैं, दूसरों का पता नहीं। हालांकि यह तर्क हास्यास्पद है। खुद आइसा ने सीजेपी की पहल में शुरू हुए आंदोलन में साथ दिया हो, तो आइसा के साथ उस पहल का भी समर्थन स्वतः माना जाएगा। फिलहाल देशभर में युवा आक्रोश को क्या दिशा मिलती है, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन यह बात निश्चित तौर पर दर्ज की जाएगी कि कॉमरेड दीपंकर की सामयिक पहल ने इस आंदोलन को मजबूती, विश्ववसनीयता और निरंतरता प्रदान की। क्रेडिट की परवाह किये बिना जनहित को आगे रखने की विशिष्ट वामशैली का यह शानदार उदाहरण कहा जाएगा।
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