खबर का असर: ‘द मूकनायक’ की पड़ताल से सत्ता के गलियारों में हलचल, आनंदपुर धाम मामला विधानसभा में गूंजा

आदिवासी ज़मीन से शुरू हुई रिपोर्टिंग ने खोली शोषण, सत्ता संरक्षण और रहस्यमयी ढांचे की परतें द मूकनायक पत्रकार अंकित पचौरी की लगातार पड़ताल बनी बड़ी वजह.
खबर का असर: विधानसभा में गूंजा आनंदपुर धाम मामला
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नई दिल्ली। द मूकनायक की खोजी पत्रकारिता ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जब ज़मीन पर उतरकर सच को सामने लाने की ठान लेते हैं, तो सबसे मजबूत सत्ता तंत्र भी हिल जाता है। मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले के ईसागढ़ स्थित आनंदपुर धाम ट्रस्ट से जुड़ा मामला इसका जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया है। ‘द मूकनायक’ के पत्रकार अंकित पचौरी की सिलसिलेवार गहराई से और जोखिम उठाकर की गई रिपोर्टिंग ने न सिर्फ एक स्थानीय विवाद को उजागर किया, बल्कि उसे राज्य की राजनीति और विधानसभा तक पहुँचा दिया। जब बजट सत्र के दौरान यह मुद्दा सदन में उठा और राजस्व मंत्री को जवाब देना पड़ा, तब यह साफ हो गया कि यह सिर्फ एक खबर नहीं रही, बल्कि एक बड़ा जनमुद्दा बन चुका है।

इस पूरी कहानी की शुरुआत किसी राजनीतिक बयान या प्रशासनिक फाइल से नहीं, बल्कि एक पत्रकार के उस फैसले से हुई, जिसमें उसने गाँवों की पगडंडियों पर चलकर उन आवाज़ों को सुना, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। 27 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित ‘द मूकनायक’ की ग्राउंड रिपोर्ट ने पहली बार यह सामने रखा कि प्रदेश के अशोकनगर जिले के आनंदपुर धाम के आसपास रहने वाले सहारिया आदिवासी परिवार अपनी ही जमीन पर बेगाने होते जा रहे हैं। पत्रकार ने जब जमड़ेहरा जैसे गाँवों में जाकर लोगों से बात की, तो सामने आई कहानियाँ सिर्फ जमीन के विवाद की नहीं थीं, बल्कि डर, हिंसा, बेबसी और व्यवस्था की चुप्पी की थीं।

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भमरिया बाई जैसी बुजुर्ग महिला की आँखों में भरा डर और दर्द उस पूरे तंत्र की कहानी कहता है, जहाँ एक गरीब आदिवासी परिवार अपनी ही जमीन पर रहने के लिए संघर्ष कर रहा है। उनका यह कहना कि उनकी झोपड़ी को जला दिया गया, उनके बेटे को पीटा गया और उन्हें जमीन छोड़ने की धमकी दी गई ये सिर्फ आरोप नहीं थे, बल्कि उस हकीकत के टुकड़े थे, जिन्हें लंबे समय से दबाया जा रहा था। इसी तरह लालाराम सहरिया का बयान, जिसमें वे अपनी 18 बीघा जमीन पर ट्रस्ट के कब्जे की कोशिश का जिक्र करते हैं, यह दिखाता है कि यह मामला व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक है। द मूकनायक ने इन आवाज़ों को सिर्फ रिकॉर्ड नहीं किया, बल्कि उन्हें उस ताकत के साथ सामने रखा, जिससे पूरा प्रदेश इन पर ध्यान देने को मजबूर हो गया।

लालाराम आदिवासी और उनकी माँ, घर के सामने बैठे हुए
लालाराम आदिवासी और उनकी माँ, घर के सामने बैठे हुए फ़ोटो- अंकित पचौरी, द मूकनायक

इस ग्राउंड रिपोर्ट की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि इसमें सिर्फ आरोप नहीं थे, बल्कि एक पैटर्न था एक ऐसा तरीका, जिसमें पहले ग्रामीणों से संबंध बनाए जाते हैं, उन्हें काम दिया जाता है, फिर कागजों के जरिए जमीन पर दावा किया जाता है और जब विरोध होता है, तो कथित तौर पर दबाव, धमकी और हिंसा का सहारा लिया जाता है। यह एक संगठित प्रक्रिया की तरह सामने आया, जिसे पत्रकार ने बारीकी से समझा और उजागर किया।

लेकिन इस कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहाँ पत्रकारिता एक रिपोर्ट पर खत्म नहीं हुई। अक्सर देखा जाता है कि एक बड़ी खबर सामने आने के बाद मामला ठंडा पड़ जाता है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। रिपोर्टर ने इस पूरे प्रकरण को लगातार फॉलो किया। द मूकनायक पत्रकार ने प्रशासनिक अधिकारियों से जवाब लेने की कोशिश की, तहसील से लेकर थाने तक गए, लेकिन हर जगह एक अजीब सी चुप्पी देखने को मिली। यह चुप्पी ही इस कहानी का एक अहम हिस्सा बन गई, क्योंकि जब जिम्मेदार लोग बोलने से बचते हैं, तो यह अपने आप में कई सवाल खड़े करती है।

धाम के अंदर यौन उत्पीड़न

समय बीतने के साथ यह मामला और गंभीर होता गया। 19 जनवरी 2026 को प्रकाशित इन्वेस्टिगेशन ने इस पूरे विवाद को एक नए स्तर पर पहुँचा दिया। इस बार मामला सिर्फ जमीन का नहीं था, बल्कि मानवाधिकारों का था। पत्रकार ने एक्सक्लूसिव वीडियो, ऑडियो और दस्तावेजों के आधार पर यह खुलासा किया कि आनंदपुर धाम आश्रम से जुड़े कुछ लोगों पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगे हैं। एक युवक का वीडियो, जिसमें वह अपने साथ हुए अत्याचार की बात करता है, और सेविकाओं के आरोप, जिनमें वे बताती हैं कि उनसे अन्य लड़कियों को महात्माओं के पास भेजने का दबाव बनाया जाता है, ये सब इस मामले को बेहद संवेदनशील और गंभीर बना देते हैं।

यहाँ यह समझना जरूरी है कि इस तरह के आरोप सिर्फ किसी संस्थान पर सवाल नहीं उठाते, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही तय करते हैं। जब शिकायतें पुलिस तक पहुँचती हैं, PMO तक जाती हैं, और फिर भी कार्रवाई नहीं होती, तो यह सिर्फ एक संस्थान की नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है। द मूकनायक पत्रकार अंकित पचौरी ने इस पहलू को भी मजबूती से उठाया और यह दिखाया कि कैसे पीड़ितों की आवाज़ दबाई जाती है।

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हालांकि इस समाचार के प्रकाशन के बाद प्रशासन और विपक्षी दल सक्रिय हो गए कांग्रेस पार्टी के एससी विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने प्रेस कांफ्रेंस में द मूकनायक के एक्सलूसिव वीडियो, शिकायतों को मीडिया के सामने जारी कर दिया। खबर के 48 घण्टे के भीतर ही शासन ने एकल आदेश जारी करते हुए अशोकनगर कलेक्टर आदित्य सिंह को पद से हटा कर भोपाल पदस्थ कर दिया। यह कार्रवाई इसलिए भी बड़ी मानी गई क्योंकि उस समय भारतीय निर्वाचन आयोग का स्थानांतरण पर प्रतिबंध था, इसके बाबजूद मध्यप्रदेश शासन ने निर्वाचन आयोग दिल्ली से आनन-फानन में अनुमति लेकर कलेक्टर को हटाया।

इसके बाद 27 जनवरी 2026 को आई एक्सक्लूसिव रिपोर्ट ने इस पूरे मामले को और भी रहस्यमय बना दिया। आनंदपुर धाम के भीतर कथित सात तहखानों का मुद्दा सामने आया, जिसने नए सवाल खड़े कर दिए। यह आरोप कि इन तहखानों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है, निर्माण की अनुमति स्पष्ट नहीं है और प्रशासन को इसकी जानकारी तक नहीं थी, यह सब मिलकर एक ऐसे ढांचे की तस्वीर पेश करता है, जहाँ पारदर्शिता की कमी साफ दिखाई देती है। द मूकनायक पत्रकार अंकित पचौरी ने इस रिपोर्ट में यह भी बताया कि निर्माण कार्यों में बाहरी राज्यों के लोगों की भूमिका बताई जा रही है और धाम के भीतर प्रवेश सीमित है, जिससे अंदर क्या हो रहा है, इसकी जानकारी बाहर तक नहीं पहुंचती।

इन सभी रिपोर्ट्स का असर धीरे-धीरे सामने आने लगा। राजनीतिक हलचल तेज हुई, विपक्ष ने सवाल उठाए, और अंततः यह मामला विधानसभा तक पहुँचा। अशोकनगर कलेक्टर का 48 घंटे के भीतर हटाया जाना इस बात का संकेत है कि प्रशासनिक स्तर पर भी दबाव और जवाबदेही का असर दिखने लगा था। जब सदन में यह स्वीकार किया गया कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण है, तो यह स्पष्ट हो गया कि पत्रकार की रिपोर्टिंग सिर्फ आरोप नहीं थी, बल्कि एक मजबूत आधार पर खड़ी थी।

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विधानसभा में उठा मामला

आनंदपुर धाम के कुछ महात्मा, भगत पिछले 30-40 वर्षों से धाम के आसपास गाँव के लोगों को प्रताड़ित करते रहें लेकिन पहली बार यह मामला विधानसभा में उठाया गया। द मूकनायक की खबरों के लगातार प्रकाशन के बाद कांग्रेस नेताओं ने भी इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से उठाया। कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की थी। इसके बाद मामला प्रदेश की राजनीति में चर्चा का केंद्र बन गया।

5200 एकड़ से अधिक भूमि ट्रस्ट के नाम, 10 एकड़ सरकारी जमीन पर अतिक्रमण दर्ज

विधानसभा में कांग्रेस विधायक हरिबाबू राय के द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में शासन के राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने बताया कि अशोकनगर जिले में संचालित आनंदपुर ट्रस्ट के नाम पर कुल मिलाकर 5200 एकड़ से अधिक भूमि दर्ज है। मंत्री ने स्वीकार किया कि कुछ सरकारी जमीन पर ट्रस्ट द्वारा कब्जा किया गया है।

सरकारी जवाब के अनुसार, अशोकनगर के ग्राम बांसाखेड़ी में 0.618 हेक्टेयर तथा वन विभाग के आनंदपुर वन खंड, ईसागढ़ क्षेत्र की 3.52 हेक्टेयर भूमि पर ट्रस्ट का कब्जा पाया गया है। कुल मिलाकर लगभग 10 एकड़ सरकारी भूमि पर अतिक्रमण दर्ज किया गया है। यह जानकारी स्वयं सरकार की ओर से सदन में लिखित उत्तर के रूप में दी गई, जिसने मामले को और गंभीर बना दिया है।

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सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, तहसील ईसागढ़ के 11 स्थानों आनंदपुर, नैथाई, दयालपुर, जमडेरा, शांतपुर, कुलवार, सकर्य, गोपालपुर, ईसागढ़, बहेरिया और आकलोन में लगभग 4811 एकड़ (करीब 1948 हेक्टेयर) भूमि आनंदपुर ट्रस्ट के नाम दर्ज है। इसके अतिरिक्त अशोकनगर तहसील के बांसाखेड़ी, पवारगढ़ और कस्बा अशोकनगर में 157.77 हेक्टेयर जमीन ट्रस्ट के नाम पर दर्ज है। इनमें आनंदपुर, दयालपुर, शांतपुर, गोपालपुर और जमडेरा में सबसे अधिक भूमि स्थित है।

अनुसूचित जनजाति की जमीन खरीद पर भी सवाल

विधायक राय ने सरकार से यह भी पूछा कि ट्रस्ट ने अनुसूचित जनजाति के लोगों से कितनी जमीन खरीदी है और क्या इस प्रक्रिया में नियमानुसार अनुमति ली गई थी। इस संबंध में भी सरकार की ओर से लिखित जवाब प्रस्तुत किया गया। हालांकि, विपक्षी सदस्यों ने संकेत दिया कि जमीन हस्तांतरण की प्रक्रिया की गहन जांच आवश्यक है, विशेषकर तब जब मामला आदिवासी जमीन से जुड़ा हो, जहां कानूनन विशेष प्रावधान लागू होते हैं।

आदिवासी क्षेत्रों में जमीन खरीद-बिक्री के लिए कड़े कानूनी प्रावधान हैं और बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति ऐसे हस्तांतरण अवैध माने जा सकते हैं। ऐसे में ट्रस्ट के पास बड़ी मात्रा में भूमि दर्ज होने से प्रशासनिक प्रक्रिया और वैधानिकता पर सवाल उठने लगे हैं।

समाचार पर कांग्रेस ने लिया संज्ञान

द मूकनायक से बातचीत में कांग्रेस नेता प्रदीप अहिरवार ने बताया कि उन्होंने ‘द मूकनायक’ में प्रकाशित रिपोर्ट्स को ध्यानपूर्वक पढ़ा। इन खबरों में आदिवासियों की जमीन पर कथित कब्जे और बाद में सामने आए यौन उत्पीड़न के आरोपों को देखने के बाद उन्होंने इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाने का निर्णय लिया।

अहिरवार ने कहा कि इन गंभीर मामलों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था, इसलिए उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पूरे मुद्दे को सामने रखा। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक को शिकायत भेजकर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग भी की।

‘द मूकनायक’ की सिलसिलेवार और तथ्याधारित रिपोर्ट्स सामने आने के बाद आनंदपुर धाम का मामला धीरे-धीरे स्थानीय मुद्दे से निकलकर मुख्यधारा मीडिया की सुर्खियों में आ गया। जिन सवालों को पहले नजरअंदाज किया जा रहा था, वे अब राष्ट्रीय स्तर की चर्चा का विषय बनने लगे। दैनिक भास्कर सहित कई बड़े मीडिया समूहों ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अपनी रिपोर्टिंग शुरू की। ग्राउंड रिपोर्ट, आरोपों की प्रकृति और सामने आए वीडियो व दस्तावेजों ने मुख्यधारा मीडिया को भी इस मुद्दे की गहराई में जाने के लिए मजबूर कर दिया।

दरअसल, ‘द मूकनायक’ की खबरों का प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि आनंदपुर धाम अब सिर्फ एक स्थानीय विवाद नहीं रहा, बल्कि एक बड़ा सार्वजनिक मुद्दा बन गया, जिस पर हर मीडिया संस्थान अपनी रिपोर्ट करना चाहता था। विभिन्न चैनल और अखबार इस विषय पर फॉलो-अप, ग्राउंड विजिट और विश्लेषण करने लगे। इससे न केवल मामले की व्यापकता बढ़ी, बल्कि पीड़ितों की आवाज़ भी अधिक मजबूती से सामने आने लगी। यह पूरी प्रक्रिया इस बात का उदाहरण बनी कि एक मजबूत और निरंतर खोजी पत्रकारिता कैसे पूरे मीडिया इकोसिस्टम को किसी मुद्दे की ओर मोड़ सकती है।

आरोपों पर सफाई नहीं

पूरे विवाद के दौरान आनंदपुर धाम ट्रस्ट या उससे जुड़े प्रमुख महात्माओं की ओर से अब तक कोई स्पष्ट, औपचारिक और विस्तृत सफाई सामने नहीं आई है। जमीन कब्जे, यौन उत्पीड़न और कथित तहखानों जैसे गंभीर आरोपों के बावजूद ट्रस्ट की तरफ से सार्वजनिक रूप से न तो तथ्यों के साथ कोई खंडन रखा गया और न ही आरोपों पर विस्तार से प्रतिक्रिया दी गई। कुछ मौकों पर सीमित स्तर पर आरोपों को साजिश बताया गया, लेकिन इन दावों के समर्थन में ठोस जानकारी या पारदर्शी स्पष्टीकरण सामने नहीं आया। इस चुप्पी ने पूरे मामले को और अधिक संदिग्ध बना दिया है, क्योंकि इतने गंभीर आरोपों के बीच स्पष्ट जवाब न देना कई नए सवाल खड़े करता है।

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह सिर्फ एक आश्रम या ट्रस्ट का मामला नहीं है, बल्कि यह उस संघर्ष की कहानी है, जहाँ समाज के सबसे कमजोर वर्ग सहारिया आदिवासी अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। उनके लिए जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। जब वही जमीन खतरे में होती है, तो यह संघर्ष सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि अस्तित्व का बन जाता है।

आनंदपुर धाम को लंबे समय से एक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन जब उसी जगह से इस तरह के आरोप सामने आते हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आस्था के नाम पर अधिकारों का हनन हो रहा है। यह सवाल सिर्फ इस मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है।

समझिए क्या था पूरा मामला?

मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले के ईसागढ़ क्षेत्र में स्थित आनंदपुर धाम इन दिनों गंभीर आरोपों के चलते चर्चा में है। इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब आसपास के गाँवों के सहारिया आदिवासी परिवारों ने आरोप लगाया कि उनकी पुश्तैनी जमीनों पर ट्रस्ट से जुड़े लोगों द्वारा कब्जा किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वे पीढ़ियों से इन जमीनों पर खेती करते आए हैं, लेकिन अब उनसे कागजी प्रक्रियाओं, दबाव और धमकियों के जरिए जमीन छीनी जा रही है। कई लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि विरोध करने पर उन्हें मारपीट, डराने-धमकाने और यहां तक कि झोपड़ियाँ जलाने जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ा।

जैसे-जैसे मामला सामने आया, इसमें एक पैटर्न भी दिखा, ग्रामीणों के अनुसार पहले उन्हें आश्रम से जोड़ा जाता है, काम दिया जाता है और फिर धीरे-धीरे दस्तावेजों के जरिए जमीन पर दावा किया जाता है। जब कोई व्यक्ति विरोध करता है, तो उस पर कथित तौर पर दबाव बनाया जाता है। इस दौरान प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठे, क्योंकि कई शिकायतों के बावजूद समय पर ठोस कार्रवाई नहीं होने की बात सामने आई। इससे यह मामला सिर्फ जमीन विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करने लगा।

मामला और गंभीर तब हुआ जब आश्रम से जुड़े कुछ महात्माओं और भगत पर यौन शोषण के आरोप सामने आए। वीडियो, ऑडियो और शिकायतों के आधार पर यह दावा किया गया कि आश्रम में रहने वाले कुछ युवक और महिलाएं शोषण और प्रताड़ना का शिकार हुए। आरोप यह भी है कि शिकायत करने पर पीड़ितों को धमकाया गया और चुप रहने के लिए दबाव बनाया गया। इन आरोपों ने पूरे मामले को बेहद संवेदनशील बना दिया और यह सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि मानवाधिकार और सुरक्षा का मुद्दा बन गया।

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