
अहमदाबाद- पत्रकार रवि नायर को न्यायिक हिरासत से फ़िलहाल राहत नहीं मिल सकी है। अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड की ओर से दायर आपराधिक मानहानि मामले में सजा के खिलाफ उनकी अपील लंबित है। इसी बीच 23 सितंबर को गुजरात हाईकोर्ट ने नायर को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया और गैर-जमानती वारंट को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर आदेश 30 सितंबर के लिए सुरक्षित रख लिया।
नायर को 17 सितंबर को गांधीनगर की अदालत के आदेश के बाद हिरासत में लिया गया था। यह कार्रवाई उस गैर-जमानती वारंट के आधार पर हुई थी, जो 3 सितंबर को अपीलीय कार्यवाही के दौरान व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित नहीं होने के बाद जारी किया गया था। नायर ने उस दिन व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट मांगी थी, लेकिन उनकी अर्जी खारिज कर दी गई और बाद में गैर-जमानती वारंट जारी हुआ। 17 सितंबर को अदालत में पेश होने पर वारंट रद्द नहीं किया गया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
नायर ने गुजरात हाईकोर्ट में गैर-जमानती वारंट और उसके बाद हुई हिरासत को चुनौती देते हुए अंतरिम राहत मांगी थी। उनके वकील अभीक चिमनी ने दलील दी कि नायर अपील की आठ सुनवाइयों में से तीन में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए थे और एक अन्य तारीख पर उन्हें अदालत से उपस्थिति में छूट भी मिली थी। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि नायर को छह महीने तक अनुपस्थित रहने वाला व्यक्ति बताने संबंधी निचली अदालत की टिप्पणी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं थी।
नायर के वकील ने यह तर्क भी दिया कि गैर-जमानती वारंट सीधे जारी करने से पहले समन या कम से कम जमानती वारंट की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी। इसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का हवाला दिया।
दूसरी ओर, अडानी एंटरप्राइजेज की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मितेश अमीन ने नायर की अपीलीय कार्यवाही में उपस्थिति और उनके आचरण को अदालत के समक्ष रखा। उन्होंने कहा कि अपील स्वीकार होने और सजा निलंबित किए जाने के बाद नायर ने अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने की अर्जी भी लगाई थी, जिससे अपील की कार्यवाही में देरी हुई।
हाईकोर्ट ने 23 सितंबर को अंतरिम रिहाई देने से इनकार करते हुए मामले में अपना आदेश 30 सितंबर के लिए सुरक्षित रखा। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जिस गैर-जमानती वारंट को चुनौती दी जा रही है, वह पहले ही लागू हो चुका है। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि नायर ने गांधीनगर की सत्र अदालत में नियमित जमानत की अर्जी दाखिल की थी, जिसकी जानकारी हाईकोर्ट को नहीं दी गई थी।
मामले की शुरुआत अडानी एंटरप्राइजेज की ओर से 3 सितंबर 2021 को दायर आपराधिक मानहानि शिकायत से हुई थी। शिकायत में अक्टूबर 2020 से जुलाई 2021 के बीच नायर द्वारा X (पूर्व में ट्विटर) पर किए गए पोस्ट और ऑनलाइन प्रकाशित सामग्री को मानहानिकारक बताया गया था। कंपनी ने आरोप लगाया था कि इन पोस्ट में उसके खिलाफ गलत और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाले दावे किए गए।
10 फरवरी 2026 को गुजरात के गांधीनगर जिले के मानसा में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत ने नायर को आपराधिक मानहानि के मामले में दोषी ठहराते हुए एक वर्ष के साधारण कारावास और 5,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। नायर ने इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की।
9 मार्च को गांधीनगर की अपीलीय अदालत ने उन्हें जमानत दी थी और अपील की सुनवाई के दौरान अदालत में उपस्थित रहने की शर्त रखी थी। बाद में 3 सितंबर की सुनवाई में उनकी व्यक्तिगत उपस्थिति नहीं हुई। उनके वकीलों के अनुसार, वह केरल से यात्रा करने और स्वास्थ्य संबंधी कारणों के चलते उस तारीख पर अदालत में उपस्थित नहीं हो सके थे। अपीलीय अदालत ने व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट की अर्जी खारिज करते हुए गैर-जमानती वारंट जारी किया।
हाईकोर्ट में नायर की ओर से कहा गया कि वह अपील की कार्यवाही में नियमित रूप से अदालत के सामने पेश होते रहे हैं। उनके वकील ने यह भी आपत्ति जताई कि बिना पहले समन या जमानती वारंट जारी किए सीधे गैर-जमानती वारंट जारी किया गया। नायर की याचिका में इसी प्रक्रिया को चुनौती दी गई है।
नायर की गिरफ्तारी और हिरासत पर कई मीडिया संगठनों ने चिंता व्यक्त की है। कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) ने फरवरी में उनकी दोषसिद्धि और एक वर्ष की सजा पर चिंता जताई थी। CPJ के अनुसार, नायर के वकीलों का तर्क था कि उनके पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री पर आधारित थे और उन्हें निष्पक्ष टिप्पणी के रूप में देखा जाना चाहिए।
23 सितंबर के घटनाक्रम के बाद DIGIPUB News India Foundation ने भी नायर की लगातार हिरासत को लेकर चिंता जताई है। संगठन ने कहा कि अपील लंबित रहते हुए पत्रकार का जेल में रहना व्यापक अभिव्यक्ति और पत्रकारिता से जुड़े सवाल उठाता है।
रवि नायर से जुड़ा एक अलग मामला भी गुजरात में चल रहा है। अगस्त 2026 में गुजरात पुलिस की क्राइम ब्रांच ने दिल्ली स्थित उनके आवास की तलाशी लेकर लैपटॉप, मोबाइल फोन और आईपैड समेत कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए थे। यह कार्रवाई एक अलग FIR की जांच के तहत हुई थी, जिसमें एक वाशिंगटन पोस्ट रिपोर्ट और उससे जुड़े सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर मानहानि और कथित जालसाजी के आरोप लगाए गए हैं। 11 अगस्त को गुजरात हाईकोर्ट ने उस FIR को रद्द करने की नायर की याचिका खारिज कर दी थी। यह मामला मौजूदा आपराधिक मानहानि मामले से अलग है।
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