TM Exclusive | रुचिका सिंह विवाद के बीच क्यों याद आईं मायावती? यूपी की पूर्व CM ने सेक्सिस्ट और जातिवादी हमले झेलकर भी कभी नहीं लिया राज्य मशीनरी का सहारा

आलोचकों का तर्क है कि किसी भी मुख्यधारा के नेता को मायावती की तरह इस हद तक अभद्र और व्यक्तिगत अपमान का सामना नहीं करना पड़ा। मोदी जी बेवजह बच्चों की तरह नाराज़ हो गए, जबकि मायावती ने सरकारी कार्रवाई न करने और लोगों को ही फैसला करने देने का विकल्प चुना।
 लोग बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में इससे कहीं अधिक अश्लील, लैंगिक और जातिवादी टिप्पणियों का सामना किया, लेकिन कभी आलोचकों के खिलाफ राज्य मशीनरी का इस्तेमाल नहीं किया।
लोग बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में इससे कहीं अधिक अश्लील, लैंगिक और जातिवादी टिप्पणियों का सामना किया, लेकिन कभी आलोचकों के खिलाफ राज्य मशीनरी का इस्तेमाल नहीं किया।एआई निर्मित चित्र
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नई दिल्ली- जंतर-मंतर पर 23 जुलाई को आयोजित एक प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित आपत्तिजनक नारे लगाने के आरोप में नोएडा निवासी रुचिका सिंह के खिलाफ दर्ज जीरो एफआईआर और उसके बाद सामने आए उनके सार्वजनिक माफीनामे ने देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नाबालिगों की जवाबदेही और राज्य की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का उदाहरण देते हुए दावा किया कि उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में इससे कहीं अधिक अश्लील, लैंगिक और जातिवादी टिप्पणियों का सामना किया, लेकिन कभी आलोचकों के खिलाफ राज्य मशीनरी का इस्तेमाल नहीं किया।

सोशल मीडिया पर अनेक लोगों ने लिखा कि मायावती भारतीय राजनीति की उन नेताओं में रही हैं, जिन्हें वर्षों तक उनके रंग-रूप, शारीरिक बनावट, जातीय पृष्ठभूमि और स्त्री होने को लेकर सार्वजनिक मंचों पर अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा।

क्या है रुचिका सिंह मामला?

23 जुलाई को जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन के दौरान एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें एक लड़की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित तौर पर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करती दिखाई दी। वीडियो वायरल होने के बाद मामले ने राजनीतिक तूल पकड़ लिया।

दिल्ली पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 352, 353(1) और 356(1) के तहत जीरो एफआईआर दर्ज की। बाद में जांच के लिए मामला संबंधित पुलिस थाने को स्थानांतरित किया गया।

मामले में एक और विवाद उम्र को लेकर सामने आया। एफआईआर में युवती की उम्र 25 वर्ष दर्ज होने की बात सामने आई, जबकि बाद में जारी अपने माफीनामे के वीडियो में रुचिका सिंह ने स्वयं को 15 वर्ष की बताया। इस विरोधाभास को लेकर भी सोशल मीडिया पर सवाल उठाए गए, हालांकि पुलिस की ओर से इस पर अंतिम स्थिति स्पष्ट नहीं की गई। एफआईआर दर्ज होने के बाद रुचिका सिंह का एक वीडियो सामने आया, जिसमें वह हाथ जोड़कर माफी मांगती दिखाई देती हैं। वीडियो में रुचिका ने कहा:

"मैं सीपी घूमने गई थी। वहां प्रदर्शन चल रहा था। वहां लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ गंदी-गंदी गालियां दे रहे थे। मैं भी उनसे प्रभावित होकर वही बोल गई। मैं सिर्फ 15 साल की हूं। यह मेरी पहली और आखिरी गलती है। मैंने कभी वह वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं किया। मैं पूरे देश से माफी मांगती हूं। मुझे अपनी गलती का एहसास है। शर्म के कारण मैं किसी की आंखों में देखकर बात भी नहीं कर पा रही हूं।"

इस वीडियो के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। एक वर्ग ने इसे गलती स्वीकार करने का साहस बताया, जबकि दूसरे वर्ग ने सवाल उठाया कि क्या एक किशोरी को इस तरह सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की स्थिति में पहुंचना चाहिए था।

इस विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कुछ युवाओं ने उनके और उनकी दिवंगत मां के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया, जिससे उन्हें सांस्कृतिक रूप से पीड़ा हुई। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि युवा उम्र में लोग गलतियां कर बैठते हैं और ऐसे मामलों में केवल दंड नहीं, बल्कि उन्हें सही दिशा दिखाना अधिक आवश्यक है।

प्रधानमंत्री ने संबंधित अधिकारियों से भी नरमी बरतने की अपील की और कहा कि यदि युवती ने अपनी गलती स्वीकार कर माफी मांग ली है तो उसे सीखने का अवसर दिया जाना चाहिए।

सोशल मीडिया पर क्यों याद आईं मायावती?

रुचिका सिंह प्रकरण के बाद सोशल मीडिया पर अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं, बहुजन चिंतकों और राजनीतिक टिप्पणीकारों ने मायावती का उदाहरण देना शुरू किया।

लॉयर्स डाइस नाम हैंडल से एक विचारोत्तेजक पोस्ट में बताया गया कि मायावती भारतीय राजनीति की उन नेताओं में रही हैं, जिन्हें दशकों तक सबसे अधिक व्यक्तिगत, लैंगिक और जातिवादी हमलों का सामना करना पड़ा। उनके रंग-रूप, शारीरिक बनावट, जाति और निजी जीवन को लेकर बार-बार सार्वजनिक मंचों, स्टैंड-अप कॉमेडी, सोशल मीडिया और मनोरंजन जगत में टिप्पणियां की गईं। "किसी भी दूसरे नेता के साथ, कभी भी इतनी अभद्र भाषा का इस्तेमाल नहीं किया गया जैसा कि मायावती के साथ; किसी भी मुख्यधारा के नेता को मायावती की तरह इस हद तक अभद्र और व्यक्तिगत अपमान का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन मायावती ने गरिमापूर्ण चुप्पी साधे रखने का रास्ता चुना और अपने विशाल जनाधार को अपनी बात कहने दी। मोदी जी बेवजह बच्चों की तरह नाराज़ हो गए, जबकि मायावती ने सरकारी कार्रवाई न करने और लोगों को ही फैसला करने देने का विकल्प चुना।"

आलोचकों का तर्क है कि इसके बावजूद मायावती ने अधिकांश मामलों में आलोचकों के खिलाफ राज्य की दंडात्मक व्यवस्था का सहारा नहीं लिया और न ही पुलिस कार्रवाई को अपना राजनीतिक हथियार बनाया।

 लोग बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में इससे कहीं अधिक अश्लील, लैंगिक और जातिवादी टिप्पणियों का सामना किया, लेकिन कभी आलोचकों के खिलाफ राज्य मशीनरी का इस्तेमाल नहीं किया।
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विवादित टिप्पणियां फिर चर्चा में

रुचिका मामले के बाद सोशल मीडिया पर कई पुराने विवाद फिर सामने आए।

कॉमेडियन अबीश मैथ्यू का 2012 का एक पुराना ट्वीट, जिसमें उन्होंने मायावती के रूप-रंग पर टिप्पणी की थी। ट्वीट में मैथ्यू ने लिखा था, "मायावती इतनी बदसूरत है... वहां सिर्फ मूर्तियां ही खड़ी की जा सकती हैं #मंचपरयहमजेदारहै"। व्यापक आलोचना के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी और स्वीकार किया कि वह टिप्पणी अनुचित थी।

कॉमेडियन एवं लेखक वरुण ग्रोवर का भी एक पुराना ट्वीट चर्चा में आया, जिसमें उन्होंने मायावती के रूप को लेकर टिप्पणी की थी। सोशल मीडिया पर विरोध के बाद उन्होंने भी सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त किया और कहा कि समय के साथ उनकी सोच बदली है तथा वे अपनी पुरानी टिप्पणी के लिए शर्मिंदा हैं।

इसी तरह कॉमेडियन वीर दास के पुराने स्टैंड-अप शो के कुछ अंश भी विवादों में रहे, जिनमें मायावती के पहनावे और शारीरिक बनावट को लेकर टिप्पणियां की गई थीं। इन अंशों को लेकर विभिन्न स्थानों पर शिकायतें भी दर्ज कराई गई थीं।

अभिनेता रणदीप हुड्डा का 2012 का एक पुराना वीडियो वर्ष 2021 में व्यापक विवाद का कारण बना था। साल 2012 में एक मीडिया हाउस द्वारा आयोजित कार्यक्रम में रणदीप हुड्डा ने मंच पर दर्शकों के सामने एक चुटकुला सुनाया था। वीडियो में उन्होंने मायावती को लेकर एक अत्यंत अश्लील और आपत्तिजनक चुटकुला सुनाया था। इस 43 सेकंड के क्लिप में हुड्डा ने बसपा प्रमुख मायावती का नाम लेकर एक बेहद भद्दा और अपमानजनक मज़ाक किया, जिस पर वह खुद और वहां मौजूद दर्शक हंसते नजर आए।

मई 2021 में जब यह वीडियो दोबारा सामने आया, तो लोगों ने दलित महिला राजनेता के प्रति इस रवैये को लेकर नाराजगी जताई। ट्विटर पर #ArrestRandeepHooda ट्रेंड होने लगा और लोगों ने उनकी गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई की मांग की।

विवाद बढ़ने पर संयुक्त राष्ट्र (UN) की पर्यावरण संधि Convention on Migratory Species (CMS) ने हुड्डा को अपने ब्रांड एंबेसडर (राजदूत) के पद से तत्काल हटा दिया। बाद में रणदीप हुड्डा ने सार्वजनिक बयान जारी कर बिना शर्त माफी मांगी और कहा कि उनका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं था।

उन्हें लगा कि वे बस एक नेता को निशाना बना रहे हैं, जैसा कि वे अक्सर करते हैं, लेकिन उन्हें कभी यह एहसास नहीं हुआ कि लाखों गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों के लिए मायावती सिर्फ़ एक नेता नहीं, बल्कि सम्मान का प्रतीक हैं।

आलोचकों का तर्क: फर्क राज्य की कार्रवाई और सामाजिक जवाबदेही का

रुचिका प्रकरण पर टिप्पणी करने वाले कई सामाजिक विश्लेषकों का कहना है कि मायावती के खिलाफ की गई टिप्पणियों का जवाब अदालतों या पुलिस के माध्यम से नहीं, बल्कि समाज की नैतिक प्रतिक्रिया के जरिए मिला।

उनके अनुसार जब मायावती पर अपमानजनक टिप्पणियां हुईं तो दलित, वंचित और बहुजन समुदायों में स्वतः आक्रोश पैदा हुआ। कई कलाकारों और सार्वजनिक हस्तियों को जनता के दबाव के बाद माफी मांगनी पड़ी।

इन विश्लेषकों का कहना है कि मायावती करोड़ों दलित, पिछड़े और वंचित लोगों के लिए केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान और प्रतिनिधित्व का प्रतीक हैं। इसलिए उनके खिलाफ की गई टिप्पणियों को बड़ी संख्या में लोगों ने अपने आत्मसम्मान पर हमला माना।

समाजशास्त्र की प्रोफ़ेसर डॉ राजकुमारी कहती हैं कि रुचिका सिंह प्रकरण ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि लोकतांत्रिक समाज में राजनीतिक नेताओं के प्रति अभद्र भाषा का जवाब किस प्रकार दिया जाना चाहिए। एक पक्ष का मानना है कि सार्वजनिक जीवन में मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है और अपमानजनक भाषा स्वीकार्य नहीं हो सकती। वहीं दूसरा पक्ष कहता है कि विशेषकर युवाओं और नाबालिगों से जुड़े मामलों में सुधारात्मक दृष्टिकोण को प्राथमिकता मिलनी चाहिए और राज्य की दंडात्मक शक्तियों का प्रयोग अत्यंत संयम से होना चाहिए।

फिलहाल यह मामला केवल एक वायरल वीडियो या माफीनामे तक सीमित नहीं रह गया है। इसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक असहमति, राज्य की भूमिका और लोकतंत्र में नैतिक जवाबदेही जैसे व्यापक प्रश्नों को फिर से सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

 लोग बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में इससे कहीं अधिक अश्लील, लैंगिक और जातिवादी टिप्पणियों का सामना किया, लेकिन कभी आलोचकों के खिलाफ राज्य मशीनरी का इस्तेमाल नहीं किया।
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