TM Exclusive | दिल्ली के दलित सफाईकर्मियों के त्याग और कानूनी संघर्ष पर केंद्रित डॉक्यूमेंट्री को फ़िल्म महोत्सवों में क्यों नहीं मिल रही स्क्रीनिंग परमिशन?

फिल्मकार आफिया और रिजवान कहते हैं कि फिल्म को सार्वजनिक करना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें उन श्रमिकों की आवाजें हैं, जिन्होंने महामारी के दौरान अस्पतालों को चलाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद में रोजगार तथा कानूनी संघर्ष की लंबी प्रक्रिया में फंस गए।
फिल्म इससे पहले दुर्गापुर और रितु रंगम जैसे फिल्म महोत्सवों में भी स्क्रीनिंग की प्रक्रिया से गुजर चुकी है, लेकिन वहां भी अनुमति संबंधी अड़चनें सामने आईं।
केंद्र सरकार से सेंसर से छूट न मिलने के कारण केरल के इंटरनेशनल डॉक्यूमेंट्री एंड शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल (IDSFFK) में कुल 31 फ़िल्में नहीं दिखाई जाएंगी जिसमें ‘सैनिटाइज़्ड रिपब्लिक: कास्ट (जाति) और कॉन्ट्रैक्ट्स (अनुबंध)’ भी शामिल है।द मूकनायक
Published on

कोविड-19 महामारी के दौरान अस्पतालों में सफाई, शवों को संभालने और मरीजों की देखभाल जैसे बेहद जोखिम भरे काम करने वाले सफाईकर्मियों की कहानी पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘सैनिटाइज़्ड रिपब्लिक: कास्ट और कॉन्ट्रैक्ट्स’ (Sanitised Republic: Cast(e) & Contracts’) एक बार फिर सार्वजनिक स्क्रीनिंग से दूर हो गई है। फिल्मकार आफिया खालिद और रिजवान रहमान की यह फिल्म केरल के 18 वें अंतर्राष्ट्रीय डॉक्यूमेंट्री और लघु फिल्म महोत्सव में प्रदर्शन के लिए चुनी गई थी लेकिन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से आवश्यक अनुमति नहीं मिल पाने के कारण इसकी स्क्रीनिंग रोक दी गई है। केंद्र सरकार से सेंसर से छूट न मिलने के कारण केरल के इंटरनेशनल डॉक्यूमेंट्री एंड शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल (IDSFFK) में कुल 31 फ़िल्में नहीं दिखाई जाएंगी।

आफिया और रिजवान की फिल्म दिल्ली के कालावती सरन चिल्ड्रन हॉस्पिटल और लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में कोविड के दौरान काम करने वाले सफाईकर्मियों के अनुभवों के जरिए यह सवाल उठाती है कि महामारी के दौरान जिन श्रमिकों के बिना अस्पतालों का संचालन संभव नहीं था, उनकी अपनी सामाजिक और रोजगार संबंधी स्थिति क्या रही। फिल्म का केंद्र सिर्फ ठेका श्रम नहीं, बल्कि उस श्रम के पीछे काम करने वाली जातिगत संरचना है, जिसमें सफाई का काम लंबे समय से दलित और हाशिये पर मौजूद समुदायों के हिस्से में आता रहा है।

फिल्मकारों का कहना है कि यह किसी अमूर्त या सैद्धांतिक जाति-विमर्श की फिल्म नहीं है। इसमें उन लोगों की वास्तविक जिंदगी और अनुभव दर्ज हैं, जिन्होंने महामारी के सबसे कठिन दौर में काम किया, अतिरिक्त जिम्मेदारियां निभाईं और इसके बावजूद स्थायी रोजगार हासिल नहीं कर सके। उनके अनुसार, यदि इन अनुभवों को भी सार्वजनिक विमर्श में जगह नहीं मिल सकती, तो समस्या सिर्फ एक फिल्म की स्क्रीनिंग तक सीमित नहीं रह जाती।

इससे पहले भी दुर्गापुर और रितु रंगम जैसे फिल्म महोत्सवों में भी फ़िल्म को स्क्रीनिंग अनुमति नहीं दी गई।

द मूकनायक से विशेष बातचीत में आफिया और रिजवान ने बताया कि सबसे पहले फिल्म के कुछ सेकंड को लेकर आपत्ति जताई गई थी, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कोविड-19 लॉकडाउन की घोषणा वाले संबोधन का ऑडियो शामिल था। मंत्रालय की आपत्ति के बाद उन्होंने वह ऑडियो हटा दिया। इसके बाद उन्हें बताया गया कि फिल्म में प्रधानमंत्री के कुछ ‘विशिष्ट संदर्भ’ मौजूद हैं।

फिल्मकारों ने इसके बाद फिल्म में दोबारा बदलाव किए और संशोधित संस्करण जमा कराया। लेकिन इसके बावजूद आवश्यक अनुमति नहीं मिली। उनका कहना है कि उन्हें आज तक यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया कि मंत्रालय की वास्तविक आपत्ति किस हिस्से या किस विषय को लेकर है।

फिल्मकारों के अनुसार, उन्होंने दिए गए सभी निर्देशों का पालन किया। इसलिए उनके लिए यह मामला केवल प्रधानमंत्री के संदर्भ या फिल्म में इस्तेमाल किए गए किसी विशेष अंश तक सीमित नहीं लगता। वे सवाल उठाते हैं कि यदि आपत्ति फिल्म के विषय या उसमें दर्ज किए गए श्रमिकों के अनुभवों पर है, तो उन्हें यह स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि समस्या आखिर क्या है।

 फिल्म दिल्ली के कालावती सरन चिल्ड्रन हॉस्पिटल और लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में कोविड के दौरान काम करने वाले सफाईकर्मियों के अनुभवों के जरिए यह सवाल उठाती है कि महामारी के दौरान जिन श्रमिकों के बिना अस्पतालों का संचालन संभव नहीं था, उनकी अपनी सामाजिक और रोजगार संबंधी स्थिति क्या रही।
फिल्म दिल्ली के कालावती सरन चिल्ड्रन हॉस्पिटल और लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में कोविड के दौरान काम करने वाले सफाईकर्मियों के अनुभवों के जरिए यह सवाल उठाती है कि महामारी के दौरान जिन श्रमिकों के बिना अस्पतालों का संचालन संभव नहीं था, उनकी अपनी सामाजिक और रोजगार संबंधी स्थिति क्या रही।

फिल्म इससे पहले दुर्गापुर और रितु रंगम जैसे फिल्म महोत्सवों में भी स्क्रीनिंग की प्रक्रिया से गुजर चुकी है, लेकिन वहां भी अनुमति संबंधी अड़चनें सामने आईं। अब यह तीसरा अवसर है जब फिल्म को दर्शकों तक पहुंचने में बाधा आई है।

फिल्मकारों का कहना है कि उन्होंने महामारी के दौरान श्रमिकों के साथ काम किया और बाद में उनके धरने, कानूनी संघर्ष और रोजगार से जुड़ी स्थिति को भी दर्ज किया। कोविड के दौरान इन श्रमिकों ने अपने निर्धारित काम के अलावा कई अतिरिक्त जिम्मेदारियां निभाईं। उन्हें उम्मीद थी कि महामारी के दौरान उनके काम और जोखिम को देखते हुए उन्हें स्थायी रोजगार दिया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

फिल्मकार सवाल उठाते हैं कि जब सफाईकर्मियों का श्रम हर अस्पताल और संस्थान के लिए अनिवार्य है, तो उनकी आवाज और उनके काम की परिस्थितियां सार्वजनिक रूप से असहज क्यों हो जाती हैं। उनका कहना है कि बार-बार स्क्रीनिंग में आ रही अड़चन यह बड़ा सवाल खड़ा करती है कि जब कोई फिल्म उन लोगों की जिंदगी दर्ज करती है, जिनका श्रम व्यवस्था के लिए जरूरी है लेकिन जिनकी सामाजिक स्थिति और काम की असुरक्षा पर सार्वजनिक चर्चा कम होती है, तो उसे सार्वजनिक मंच तक पहुंचने में इतनी मुश्किल क्यों आती है।

जब हाशिये के समुदाय अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरते हैं तो उन्हें अक्सर नागरिकों के रूप में नहीं, बल्कि व्यवस्था के लिए बाधा या समस्या के रूप में देखा जाता है।

‘क्या समस्या फिल्म के विषय से है, जाति से या कुछ और से?’

आफिया और रिजवान से जब पूछा गया कि क्या उन्हें लगता है कि समस्या फिल्म के कंटेंट से जुड़ी है, जाति के सवाल से या फिर उनके मुस्लिम होने से, तो उनका जवाब था कि मामला डिजिटल कंटेंट के नियमन से जुड़े नए सूचना प्रौद्योगिकी नियमों और संस्थागत प्रक्रियाओं से जुड़ा दिखाई देता है।

उनके मुताबिक, डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए अब केवल पारंपरिक सेंसरशिप का सवाल नहीं रह गया है। अलग-अलग संस्थागत और कानूनी प्रक्रियाएं यह तय करती हैं कि किस तरह की सामग्री को किस मंच पर सार्वजनिक रूप से दिखाया जा सकता है। इसलिए उनके लिए यह मामला केवल किसी एक फिल्म के एक दृश्य पर आपत्ति का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का भी है जो तय करती है कि कौन-सी कहानी सार्वजनिक मंच तक पहुंच पाएगी।

इंडियन डॉक्यूमेंट्री फेस्टिवल ऑफ केरल यानी आईडीएसएफएफके में कुल 31 फिल्मों को स्क्रीनिंग की अनुमति नहीं मिल सकी। उनकी फिल्म भी इनमें शामिल है।

उनका कहना है कि उनकी फिल्म का विषय दिल्ली के एक अस्पताल तक सीमित नहीं है। दिल्ली केवल वह जगह है जहां फिल्म में दर्ज घटनाएं हुईं। असली सवाल यह है कि देश के अलग-अलग अस्पतालों, संस्थानों और सार्वजनिक सेवाओं में सफाई का काम आखिर कौन करता है।

फिल्म इस सवाल का सामना करती है कि कोविड के दौरान अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर अपनी जान जोखिम में डालने वाले लोग कौन थे और महामारी के बाद सरकार ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया। फिल्मकार पूछते हैं कि हाशिये के समुदायों के लोगों को पीढ़ियों से ऐसे कामों में क्यों धकेला जाता है और जब वे वही काम संकट के समय सबसे अधिक जोखिम लेकर करते हैं, तब भी सरकारी संस्थाएं उन्हें स्थायी रोजगार क्यों नहीं देतीं।

उनके अनुसार, जाति केवल समाज तक सीमित नहीं है। वह सामाजिक संरचना से होते हुए राज्य की संस्थाओं तक गहराई से दर्ज है। इसी वजह से शोषण के पुराने रूप रोजगार की नई व्यवस्थाओं में भी दिखाई देते हैं। फिल्म दर्शकों के सामने यह सवाल रखती है कि क्या इस व्यवस्था की जड़ में जाति है। इसका अंतिम जवाब फिल्म दर्शकों पर छोड़ती है।

आफिया और रिजवान के अनुसार यदि फिल्म कभी दर्शकों तक नहीं पहुंचती तो सबसे बड़ी चिंता यह होगी कि इन लोगों की उम्मीद और संघर्ष भी एक हद तक सार्वजनिक स्मृति से बाहर रह जाएंगे।
आफिया और रिजवान के अनुसार यदि फिल्म कभी दर्शकों तक नहीं पहुंचती तो सबसे बड़ी चिंता यह होगी कि इन लोगों की उम्मीद और संघर्ष भी एक हद तक सार्वजनिक स्मृति से बाहर रह जाएंगे।

फिल्मकारों का कहना है कि मंत्रालय की आपत्तियों का क्रम भी अपने आप में सवाल खड़ा करता है। पहले ऑडियो पर आपत्ति हुई, ऑडियो हटाने के बाद ‘विशिष्ट संदर्भों’ पर सवाल उठाया गया। ऐसे में उन्हें यह संभावना दिखाई देती है कि असहजता शायद इस बात को लेकर है कि फिल्म में सफाई कर्मियों ने क्या बताया है।

फिल्म में सफाईकर्मी कोविड के दौरान अस्पतालों के भीतर की परिस्थितियों, महामारी के प्रबंधन और अग्रिम पंक्ति के श्रमिकों के साथ हुए व्यवहार के बारे में बात करते हैं। वे उस दौर को याद करते हैं जब लगातार मौतें हो रही थीं और कुछ मामलों में उनका मानना था कि मौतों को रोका जा सकता था।

फिल्मकार कहते हैं कि ये बातें उनकी अपनी ओर से लगाए गए आरोप नहीं हैं। फिल्म ने केवल उस समय और उस परिस्थिति को दर्ज किया है, जैसा उसे श्रमिकों ने अपने अनुभवों के आधार पर बताया।

इसी संदर्भ में फिल्म में कोविड के दौरान अस्पतालों पर फूल बरसाने वाले आधिकारिक प्रतीकात्मक दृश्य का भी उल्लेख आता है। फिल्मकारों के मुताबिक, उस समय की आधिकारिक कहानी उस घटना को एक खास तरीके से प्रस्तुत करती है, लेकिन उन्हीं अस्पतालों में काम करने वाले दलित और हाशिये के समुदायों से आने वाले सफाईकर्मियों की उस दौर की अपनी अलग स्मृति और कहानी है। फिल्म यह तय नहीं करती कि दर्शक किस संस्करण को सही मानें; वह दोनों के बीच मौजूद अंतर को सामने रखती है।

फिल्म की अब तक भारत में कोई आधिकारिक प्रीमियर स्क्रीनिंग नहीं हो सकी है। फिल्म ऑनलाइन भी उपलब्ध नहीं है। फिल्मकारों का कहना है कि वे आने वाले समय में कुछ सीमित स्क्रीनिंग आयोजित करने की कोशिश करेंगे और इसके बाद फिल्म को अपने यूट्यूब चैनल काउबेल्ट स्टूडियोज’ पर उपलब्ध कराने की योजना है।

उनके लिए फिल्म को सार्वजनिक करना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें दर्ज आवाजें केवल फिल्मकारों की नहीं हैं। ये उन श्रमिकों की आवाजें हैं, जिन्होंने महामारी के दौरान अस्पतालों को चलाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद में रोजगार तथा कानूनी संघर्ष की लंबी प्रक्रिया में फंस गए।

अस्पताल, शहर और राष्ट्र बाहर से साफ-सुथरे दिखाई दे सकते हैं, ‘स्वच्छ भारत’ की छवि बनाई जा सकती है, लेकिन उस स्वच्छता के पीछे काम करने वाला जाति-आधारित श्रम और उसे करने वाले लोग उस चमकदार तस्वीर से बाहर रह जाते हैं।
अस्पताल, शहर और राष्ट्र बाहर से साफ-सुथरे दिखाई दे सकते हैं, ‘स्वच्छ भारत’ की छवि बनाई जा सकती है, लेकिन उस स्वच्छता के पीछे काम करने वाला जाति-आधारित श्रम और उसे करने वाले लोग उस चमकदार तस्वीर से बाहर रह जाते हैं।

फिल्म में श्रमिकों के संघर्ष को सडकों से लेकर अदालत तक के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में दिखाया गया है। फिल्मकारों से जब पूछा गया कि क्या इन श्रमिकों को मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में नागरिक के रूप में पर्याप्त जगह मिलती है, तो उनका जवाब बेहद साफ़ था: उन्हें ऐसा कोई वास्तविक स्थान दिखाई नहीं देता जहां श्रमिकों को पूरी तरह नागरिक के रूप में स्वीकार किया जाता हो।

अदालतों से न्याय की उम्मीद की जाती है, लेकिन आफिया और रिजवान का कहना है कि हम सभी जानते हैं कि न्याय वास्तव में किन लोगों तक कितनी आसानी से पहुंचता है। उनके अनुसार, अदालत से श्रमिकों के पक्ष में फैसला आने के बावजूद कई बार उसका जमीन पर क्रियान्वयन नहीं होता।

फिल्म में शामिल श्रमिकों ने बताया कि अदालत ने उनके पक्ष में आदेश दिया था, लेकिन फिल्म पूरी होने तक दो साल बीत जाने के बावजूद उस आदेश को लागू नहीं किया गया था।

फिल्मकारों के शब्दों में, अदालत नागरिकता की भाषा तो तैयार कर सकती है, लेकिन वह भाषा हमेशा श्रमिकों के जीवन में वास्तविक नागरिकता में तब्दील नहीं होती। न्याय कई बार चयनात्मक, विलंबित और उन लोगों की पहुंच से बाहर रहता है जिनके पास उसे हासिल करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।

सड़क पर होने वाले विरोध को भी वे इसी संदर्भ में देखते हैं। उनके मुताबिक, जब हाशिये के समुदाय अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरते हैं तो उन्हें अक्सर नागरिकों के रूप में नहीं, बल्कि व्यवस्था के लिए बाधा या समस्या के रूप में देखा जाता है। राज्य की प्रतिक्रिया भी कई बार संवाद के बजाय सुरक्षा बलों और नियंत्रण के रूप में सामने आती है।

फिल्म में शामिल सफाईकर्मियों  ने बताया कि अदालत ने उनके पक्ष में आदेश दिया था, लेकिन फिल्म पूरी होने तक दो साल बीत जाने के बावजूद उस आदेश को लागू नहीं किया गया था।
फिल्म में शामिल सफाईकर्मियों ने बताया कि अदालत ने उनके पक्ष में आदेश दिया था, लेकिन फिल्म पूरी होने तक दो साल बीत जाने के बावजूद उस आदेश को लागू नहीं किया गया था।

‘स्वच्छ भारत’ की चमक के पीछे छिपा जातिगत श्रम

फिल्म ‘स्वच्छ भारत’ अभियान और सफाई के काम के बीच मौजूद विरोधाभास को सामने लाता है। स्वच्छता को सामान्यतः एक तटस्थ सार्वजनिक हित के रूप में देखा जाता है, लेकिन आफिया और रिजवान का कहना है कि सफाई का श्रम अपने आप में तटस्थ नहीं है। भारत में यह काम लंबे समय से जाति से जुड़ा रहा है।

दलित और हाशिये के समुदायों के लोगों को पीढ़ियों से ऐसे कामों की ओर धकेला गया जिन्हें समाज के दूसरे हिस्से ‘गंदा’ या ‘अपवित्र’ मानते रहे हैं। काम के साथ जुड़ा सामाजिक कलंक श्रमिक की जातिगत पहचान से भी जुड़ा रहता है।

कोविड के दौरान यह विरोधाभास और अधिक स्पष्ट हो गया। सफाईकर्मियों ने अस्पतालों में सिर्फ सफाई नहीं की। उन्होंने शवों को संभाला, मरीजों की देखभाल की और बच्चों तथा माताओं से जुड़े कई ऐसे काम किए जिनमें संक्रमण और स्वास्थ्य जोखिम बहुत अधिक था।

फिर भी जिन लोगों का श्रम अस्पतालों को सुरक्षित और कार्यशील बनाए रखने के लिए जरूरी था, उन्हीं लोगों की सामाजिक और रोजगार संबंधी असुरक्षा बनी रही।

आफिया और रिजवान के अनुसार, ‘Sanitised Republic’ नाम इसी विरोधाभास की ओर संकेत करता है। अस्पताल, शहर और राष्ट्र बाहर से साफ-सुथरे दिखाई दे सकते हैं, ‘स्वच्छ भारत’ की छवि बनाई जा सकती है, लेकिन उस स्वच्छता के पीछे काम करने वाला जाति-आधारित श्रम और उसे करने वाले लोग उस चमकदार तस्वीर से बाहर रह जाते हैं।

फिल्म इसी अदृश्य श्रम और उन नागरिकों को केंद्र में लाती है जिनकी जाति, रोजगार और अधिकार इस गणतंत्र की कहानी का हिस्सा हैं, लेकिन जिन्हें अक्सर उस कहानी में दिखाई नहीं देता।

क्या छिन रहा है ‘देखे जाने का अधिकार’ ?

जब दोनों से पूछा गया कि बार बार स्क्रीनिंग की अनुमति नहीं मिलने को 'राईट तो बी सीन' से जोड़ा जा सकता है, उनका कहना है कि फिल्म को महोत्सव में दिखाने के लिए आवश्यक सेंसर छूट नहीं मिली। फिल्म का वजूद है। श्रमिकों की गवाही है। दिल्ली के अस्पतालों में कोविड के दौरान क्या हुआ, इसके अनुभव मौजूद हैं। लेकिन राज्य-नियंत्रित माध्यमों की वजह से इन अनुभवों को सार्वजनिक रूप से देखने का अवसर नहीं मिल पा रहा।

उनके अनुसार, ठेका श्रम व्यवस्था कई मामलों में बंधुआ मजदूरी के एक बदले हुए रूप जैसी दिखाई देती है। उनका तर्क है कि जब श्रमिकों को महामारी के दौरान अपने निर्धारित काम से आगे जाकर जिम्मेदारियां निभानी पड़ीं, तब भी उन्हें स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला।

राज्य उन घटनाओं को इतिहास से मिटा नहीं सकता जो घट चुकी हैं। लेकिन वह यह जरूर नियंत्रित कर सकता है कि उन घटनाओं को कितने लोग और किस माध्यम से देख पाएंगे।

आफिया और रिजवान के लिए ‘देखे जाने का अधिकार’ इसी व्यापक अनुभव का नाम है, वह अधिकार जो इन श्रमिकों को महामारी के दौरान जोखिम उठाते हुए भी नहीं मिला, रोजगार खोने के बाद भी नहीं मिला और संघर्ष करते समय भी सीमित रहा।

केरल इंटरनेशनल डॉक्यूमेंट्री एंड शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल (IDSFFK) 25 से 30 सितंबर तक केरल की राजधानी त्रिवेंद्रम में आयोजित किया जाएगा
केरल इंटरनेशनल डॉक्यूमेंट्री एंड शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल (IDSFFK) 25 से 30 सितंबर तक केरल की राजधानी त्रिवेंद्रम में आयोजित किया जाएगा

फिल्मकारों का कहना है कि यदि यह फिल्म भारत में कभी प्रदर्शित नहीं हो पाती, तो उनका व्यक्तिगत नुकसान उन सफाईकर्मियों के नुकसान के सामने बहुत छोटा होगा जिनकी आवाजें फिल्म में दर्ज हैं।

कांतिलाल, सरफराज, सुनीता, सेवक राम और अन्य श्रमिकों की आवाजें इस फिल्म के केंद्र में हैं। फिल्मकारों की इच्छा है कि इन लोगों की कहानी और उनका संघर्ष देश-दुनिया तक पहुंचे। इन श्रमिकों ने दिल्ली की सड़कों पर एक साल से अधिक समय तक आंदोलन किया और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया।

आफिया और रिजवान के अनुसार यदि फिल्म कभी दर्शकों तक नहीं पहुंचती तो सबसे बड़ी चिंता यह होगी कि इन लोगों की उम्मीद और संघर्ष भी एक हद तक सार्वजनिक स्मृति से बाहर रह जाएंगे।

सेवक राम फिल्म में ‘शिक्षित बनो, संगठित हो और संघर्ष करो’ की भावना की बात करते हैं। फिल्मकारों के लिए यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि उन श्रमिकों की वास्तविक यात्रा है। उनका कहना है कि राज्य पहले ही उन्हें स्थायी कर्मचारी का दर्जा देने से इनकार कर चुका है। ऐसे में यदि उनकी कहानी भी पर्दे तक नहीं पहुंचती, तो इससे अधिक दुखद स्थिति उनके लिए कुछ नहीं हो सकती।

लगभग 19 मिनट 30 सेकंड लंबी यह फिल्म तीन चरणों में शूट की गई है। पहला चरण कोविड महामारी का है, दूसरा श्रमिकों के धरने और विरोध का और तीसरा उनके कानूनी संघर्ष तथा बाद की परिस्थितियों का।

फिल्म पूरी होने तक भी कई सफाई कर्मी स्थायी रोजगार से बाहर थे और कानूनी लड़ाई का खर्च उठाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। कुछ लोग नौकरी गंवाने के करीब तीन साल बाद तक बेरोजगारी और आर्थिक संकट से जूझ रहे थे।

फिल्मकार कांतिलाल की स्थिति का उदाहरण देते हैं। उनके पैर में फ्रैक्चर हुआ था। जब फिल्मकार उनके घर पहुंचे तो परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कठिन थी। घर तक पहुंचने के लिए संकरी सीढ़ियां थीं और पैर में चोट के बावजूद उनकी रोजमर्रा की जिंदगी आसान नहीं थी। उनकी पत्नी अकेले परिवार चलाने की कोशिश कर रही थीं। स्वास्थ्य संकट के साथ आर्थिक अनिश्चितता भी लगातार बनी हुई थी।

फिल्मकारों के अनुसार, कांतिलाल अकेले नहीं हैं। कई अन्य श्रमिक भी गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। इसके बावजूद उन्होंने संघर्ष छोड़ा नहीं। वे लगातार अदालत की हर सुनवाई में पहुंचे और अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहे। उनका संघर्ष फिल्म पूरी होने के बाद भी समाप्त नहीं हुआ है।

‘यह कहानी हमारी नहीं, उन लोगों के बारे में है जिनकी आवाज दर्ज हुई है’

फिल्मकार आफिया खालिद स्वतंत्र फिल्मकार और शोधार्थी हैं। उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मास मीडिया में बीए ऑनर्स, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में एमए और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज से एमफिल किया है। उन्होंने टीआईएसएस में ही पीएचडी की है। उनका डॉक्टोरल शोध कारावास के परिवारों पर पड़ने वाले प्रभाव, खासकर महिलाओं और बच्चों के जीवन, रोजमर्रा के सामाजिक संबंधों और बहिष्करण की स्थितियों पर केंद्रित रहा है। यही अकादमिक पृष्ठभूमि उन्हें जाति, श्रम, सामाजिक बहिष्करण और हाशिये के समुदायों के रोजमर्रा के जीवन पर डॉक्यूमेंट्री बनाने की ओर ले गई।

रिजवान रहमान स्वतंत्र पत्रकार, शोधकर्ता और डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार हैं। उनका काम भारत में आदिवासी और स्वदेशी समुदायों, मानवाधिकार और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहा है। वे ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस, रिपोर्टिंग, लंबे विश्लेषण और दृश्य कथाओं के माध्यम से काम करते हैं। उन्होंने संस्कृति, मीडिया और शासन तथा समाजशास्त्र में मास्टर डिग्री हासिल की है और द हिंदू, द वायर, आर्टिकल 14, द इलेक्ट्रॉनिक इंतिफादा सहित विभिन्न प्रकाशनों के लिए लिखा है। वर्तमान में वे स्वदेशी समुदायों पर आधारित डॉक्यूमेंट्री परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं।

‘Sanitised Republic: Cast(e) & Contracts’ उन श्रमिकों की कहानी है जिनका श्रम महामारी के दौरान अपरिहार्य था, लेकिन जिनकी सामाजिक पहचान, रोजगार की असुरक्षा और अधिकारों का सवाल महामारी के बाद भी कायम रहा। फिल्मकारों के लिए सवाल यही है कि जिस गणतंत्र को साफ रखने में इन लोगों का श्रम लगा, उस गणतंत्र की सार्वजनिक कहानी में उन्हें देखने और उनकी बात सुनने की जगह कितनी है।

फिल्म इससे पहले दुर्गापुर और रितु रंगम जैसे फिल्म महोत्सवों में भी स्क्रीनिंग की प्रक्रिया से गुजर चुकी है, लेकिन वहां भी अनुमति संबंधी अड़चनें सामने आईं।
सीवर में 593 कर्मियों ने गवांई जान, सरकार ने 261 मौतें छुपाईं: झूठे आंकड़ों और अनदेखी का विरोध करने सडकों पर आए सफाईकर्मी
फिल्म इससे पहले दुर्गापुर और रितु रंगम जैसे फिल्म महोत्सवों में भी स्क्रीनिंग की प्रक्रिया से गुजर चुकी है, लेकिन वहां भी अनुमति संबंधी अड़चनें सामने आईं।
सरकार कहती है मैला प्रथा नहीं, 4 राज्यों की महिलाओं ने खोली पोल- "हम आज भी हाथों से मैला साफ करती हैं" | SKA ने लांच किया India@80 अभियान
फिल्म इससे पहले दुर्गापुर और रितु रंगम जैसे फिल्म महोत्सवों में भी स्क्रीनिंग की प्रक्रिया से गुजर चुकी है, लेकिन वहां भी अनुमति संबंधी अड़चनें सामने आईं।
67 साल पहले समाप्त हुई थी वतन प्रथा,जानिए क्या थी वो व्यवस्था जिसने महारों को बनाया था वंशानुगत गुलाम
फिल्म इससे पहले दुर्गापुर और रितु रंगम जैसे फिल्म महोत्सवों में भी स्क्रीनिंग की प्रक्रिया से गुजर चुकी है, लेकिन वहां भी अनुमति संबंधी अड़चनें सामने आईं।
"कितनी भी मालायें पहन लो, तुम भं$% ही रहोगे": दिल्ली में दलित मंडल अध्यक्ष के साथ मारपीट, गालियां देने वाले मुंडका विधायक समेत अन्य के खिलाफ SC/ST एक्ट में FIR

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

द मूकनायक को सब्सक्राइब करें

'द मूकनायक' जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है। अगर आप भी चाहते हैं कि 'द मूकनायक' हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहें तो सब्सक्राइब करें।

यहां सब्सक्राइब करें
The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com