सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: गृहिणियां हैं 'नेशन बिल्डर', मासिक आय ₹30,000 | दुर्घटना दावों में मुआवजे का नया फॉर्मूला लागू

गृहिणी के 'घरेलू देखभाल के नुकसान' के तहत कम से कम ₹30,000/माह आय का आंकलन अनिवार्य।
इस फैसले के बाद गृहिणियों के काम को पहली बार 'राष्ट्र निर्माण' के रूप में मान्यता मिली है। अदालत ने माना कि गृहिणियों का योगदान भारत की जीडीपी का 15-17% है, लेकिन इसे आर्थिक रूप से मान्यता नहीं दी जाती।
इस फैसले के बाद गृहिणियों के काम को पहली बार 'राष्ट्र निर्माण' के रूप में मान्यता मिली है। अदालत ने माना कि गृहिणियों का योगदान भारत की जीडीपी का 15-17% है, लेकिन इसे आर्थिक रूप से मान्यता नहीं दी जाती।एआई निर्मित सांकेतिक चित्र
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नई दिल्ली- सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और युगांतरकारी फैसले में कहा है कि घर संभालने वाली महिलाओं (गृहिणियों) को अब 'होममेकर' (गृह स्वामिनी) नहीं, बल्कि 'नेशन बिल्डर' (राष्ट्र निर्माता) का दर्जा दिया जाएगा। अदालत ने कहा कि समाज और अर्थव्यवस्था में उनके योगदान को कम करके आंकना बंद किया जाना चाहिए और उनके निधन वाले मामलों में नया मुआवजा हेड ‘लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर’ जोड़ने का निर्देश दिया। इस हेड के तहत अब ₹30,000 प्रतिमाह नॉशनल इनकम के रूप में अतिरिक्त मुआवजा दिया जाएगा।

कोर्ट ने टाइम यूज सर्वे 2019 का हवाला देते हुए बताया कि 15-59 वर्ष की महिलाएं रोजाना सात घंटे से ज्यादा अनपेड घरेलू और देखभाल का काम करती हैं, जबकि पुरुष तीन घंटे से भी कम। कोर्ट के अनुसार, गृहिणियों का योगदान भारत की जीडीपी का 15-17% है, लेकिन इसे आर्थिक रूप से मान्यता नहीं दी जाती।

यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने एक ऐसे मामले की सुनवाई करते हुए दिया, जो साल 2001 से यानी लगभग 25 साल से लंबित था। अदालत ने इस लंबी देरी पर भी गहरी चिंता जताई और मोटर दुर्घटना दावों में तेजी से निपटारे के लिए कड़े दिशानिर्देश जारी किए।

यह मामला 25 नवंबर 2001 को सिरसा से फतेहाबाद जा रही एक महिला की सड़क दुर्घटना में मौत से जुड़ा है। मृतका एक गृहिणी थीं। उनके वारिसों (पति और बच्चों) ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) में याचिका दायर की थी। ट्रिब्यूनल ने 2003 में केवल 2,42,000 रुपये का मुआवजा दिया था। इसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर हुई, जहां यह मामला 20 साल तक लटका रहा।

हाई कोर्ट (पंजाब एंड हरियाणा) ने 2024 में आकर मुआवजा बढ़ाकर 8.43 लाख रुपये कर दिया। इससे असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाई कोर्ट में यह मामला इसलिए लंबित रहा क्योंकि वर्ष 2011 में हाई कोर्ट में लगी आग में इस केस की फाइल आंशिक रूप से जल गई थी। फाइलों के पुनर्निर्माण में ही 14 साल लग गए।

अदालत ने महसूस किया कि केवल 'लॉस ऑफ कंसोर्टियम' या पारंपरिक फॉर्मूले से गृहिणी के योगदान का सही मूल्यांकन नहीं होता। इसलिए, अदालत ने 'लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर' (घरेलू देखभाल की हानि) नाम का एक नया शीर्षक जोड़ा।

देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख़ टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि इस मामले में देरी को आग से जोड़कर समझा जा सकता है, लेकिन आमतौर पर मोटर दुर्घटना के मामलों में यह एक सामान्य समस्या है।

अदालत ने कहा, "लाभकारी कानून से जुड़े मामले, जहां किसी की मौत या चोट हुई हो, वे हाई कोर्ट में 4 साल से अधिक लंबित नहीं रहने चाहिए।" अदालत ने 100 से अधिक मामलों का डेटा पेश किया, जिसमें दिखा कि हाई कोर्ट में औसतन 8 साल और ट्रिब्यूनल में 6 साल की देरी हो रही है। "लंबी देरी के कारण ब्याज की राशि अक्सर मूल मुआवजे के बराबर हो जाती है, जो एक संस्थागत समस्या है।"

इस फैसले के बाद गृहिणियों के काम को पहली बार 'राष्ट्र निर्माण' के रूप में मान्यता मिली है। अदालत ने माना कि गृहिणियों का योगदान भारत की जीडीपी का 15-17% है, लेकिन इसे आर्थिक रूप से मान्यता नहीं दी जाती।
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गृहिणी की भूमिका पर कोर्ट ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों के योगदान को बेहद सशक्त शब्दों में परिभाषित किया और अर्थशास्त्री सर सेसिल पिगू के 1920 के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा:

"हम यह कहकर विडंबना ही करेंगे कि एक गृहिणी कमाने वाले सदस्यों पर निर्भर होती है, जबकि वास्तविकता यह है कि परिवार का कामकाज उसी पर निर्भर करता है। अगर एक आदमी अपनी नौकरानी या कुक से शादी कर लेता है, तो राष्ट्रीय आय (GDP) घट जाती है।" 

शीर्ष अदालत ने आगे कहा, " "एक मां बच्चे की पहली शिक्षक होती है। उसकी शिक्षा का कोई अंत नहीं होता। वह बच्चे को नैतिकता, व्यवहार और सामाजिक बंधन सिखाती है। वह घर के सभी सदस्यों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह होती है। एक गृहिणी उस कुम्हार की तरह है, जो मिट्टी (घर) को सही आकार, रूप और उपयोगिता देती है।"

अदालत ने 'हाउसवाइफ' शब्द के बजाय 'होममेकर' (गृह स्वामिनी) और अब 'नेशन बिल्डर' शब्द के इस्तेमाल पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि समय-उपयोग सर्वेक्षण (Time Use Survey) के अनुसार, भारत में महिलाएं अवैतनिक घरेलू कार्यों में पुरुषों की तुलना में 2.6 गुना अधिक समय बिताती हैं, जो जीडीपी का 15-17% है, लेकिन यह अवैतनिक और अमान्य है।

अदालत ने महसूस किया कि केवल 'लॉस ऑफ कंसोर्टियम' या पारंपरिक फॉर्मूले से गृहिणी के योगदान का सही मूल्यांकन नहीं होता। इसलिए, अदालत ने 'लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर' (घरेलू देखभाल की हानि) नाम का एक नया शीर्षक जोड़ा।

सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणी की सेवाओं का ऐसे किया आंकलन, नया सूत्र लागू

इस मामले में मृतका की कोई सुनिश्चित मासिक आय नहीं थी। वह एक गृहिणी थीं, जिनकी सेवाओं का कोई तय वेतन नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले यह माना कि एक गृहिणी के घरेलू देखभाल के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए कोर्ट ने 'लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर' (घरेलू देखभाल की हानि) नाम का एक नया शीर्षक बनाया और उसके तहत मृतका की मासिक आय ₹30,000 प्रति माह (न्यूनतम मानक) निर्धारित की।

इसके आधार पर उनकी वार्षिक आय ₹3,60,000 रुपये बनी। चूंकि मृतका की उम्र 35 वर्ष थी, इसलिए कोर्ट ने भविष्य की संभावनाओं (Future Prospects) के तहत इस आय में 40% की वृद्धि की, जो ₹1,44,000 रुपये बैठी। इस तरह कुल वार्षिक आय ₹5,04,000 रुपये हो गई।

अब कोर्ट ने उम्र के हिसाब से 16 के गुणक (Multiplier) का इस्तेमाल करते हुए कुल नुकसान ₹80,64,000 रुपये निकाला। इस राशि में से मृतका के व्यक्तिगत खर्च को हटाने के लिए 1/4 (यानी 25%) की कटौती की गई, जो ₹20,16,000 रुपये बनी। इस कटौती के बाद शुद्ध आय नुकसान ₹60,48,000 रुपये रहा।

इसके अलावा, कोर्ट ने परिवार के सदस्यों के दुख और साथ के नुकसान (लॉस ऑफ कंसोर्टियम) के लिए ₹48,400 प्रति व्यक्ति के हिसाब से पति और बच्चों सहित चार सदस्यों को कुल ₹1,93,600 रुपये देने का आदेश दिया। साथ ही, लॉस ऑफ एस्टेट (संपत्ति की हानि) के लिए ₹18,150 रुपये और अंतिम संस्कार खर्च के लिए ₹18,150 रुपये जोड़े गए।

इन सभी राशियों को जोड़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मृतका के परिवार को कुल ₹62,77,900 रुपये (लगभग 62.77 लाख रुपये) का मुआवजा देने का फैसला सुनाया।

गौरतलब है कि इससे पहले हाई कोर्ट ने इसी मामले में परिवार को मात्र ₹8.43 लाख रुपये का मुआवजा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस राशि को लगभग साढ़े सात गुना से भी अधिक बढ़ाकर 62.77 लाख रुपये कर दिया, जो गृहिणियों के योगदान को सही मायने में पहचानने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

महत्वपूर्ण निर्देश: 'लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर'

यह ₹30,000 की मासिक आय उन गृहिणियों के लिए 'स्टैंड-इन' (आधारभूत) आय होगी, जिनकी कोई सुनिश्चित आय नहीं है। यदि गृहिणी नौकरी करती थी, तो यह राशि उसके वेतन के अतिरिक्त दी जाएगी। यह राशि हर तीन साल में 10% बढ़ेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल, हाईकोर्ट और खुद को निर्देश दिया कि गृहिणी की मौत के मामलों में ₹30,000 प्रतिमाह (नॉशनल इनकम के रूप में) ‘लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर’ हेड के तहत जोड़ा जाए। यह तीन प्रमुख पहलुओं को कवर करेगा: घरेलू प्रबंधन, बच्चों को मातृत्व सहारा और पति/माता-पिता को सहयोग।

यह राशि हर तीन साल में 10% बढ़ाई जाएगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह प्रणय सेठी मामले में दिए गए लॉस ऑफ कंसोर्टियम के अलावा होगा।

न्यायालय ने पूरे देश के लिए निम्नलिखित दिशानिर्देश जारी किए हैं:

प्रक्रियात्मक देरी को कम करने के लिए अब याचिकाकर्ताओं को ये दस्तावेज अनिवार्य रूप से लगाने होंगे:

अब याचिकाकर्ताओं को ये दस्तावेज अनिवार्य रूप से लगाने होंगे:

  • उम्र: आधार कार्ड को छोड़कर, डीओबी का आधिकारिक प्रमाण (जैसे मैट्रिक सर्टिफिकेट)।

  • विकलांगता: किसी सरकारी डॉक्टर द्वारा प्रतिशतता और कार्यात्मक विकलांगता स्पष्ट करने वाला प्रमाण पत्र।

  • आय: यदि आईटीआर, सैलरी स्लिप या नियोक्ता का प्रमाण पत्र उपलब्ध है, तो उसे लगाना अनिवार्य होगा।

  • मेडिकल खर्च: अस्पताल के अधिकृत प्रमाण पत्र।

  • अटेंडेंट चार्ज: यदि दावा किया जाए तो नोटरीकृत एफिडेविट।

हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को निर्देश:

1. उन सभी मामलों को सूचीबद्ध किया जाए जो 4 साल से अधिक लंबित हैं।

2. सबसे पुराने मामले को सबसे पहले सूचीबद्ध किया जाए।

3. आवश्यकता अनुसार मोटर दुर्घटना मामलों की सुनवाई करने वाली पीठों (बेंच) की संख्या बढ़ाई जाए।

ट्रिब्यूनल के लिए निर्देश

1. MACT को समरी प्रोसीजर (त्वरित प्रक्रिया) का अधिक उपयोग करना चाहिए।

2. अगर यह प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती है, तो ट्रिब्यूनल को इसके कारणों को रिकॉर्ड में लिखना होगा।

3. लॉस ऑफ कंसोर्टियम, लॉस ऑफ एस्टेट और अंतिम संस्कार खर्च में हर तीन साल में 10% की स्वत: वृद्धि होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि बीमा कंपनी याचिकाकर्ताओं को 62.77 लाख रुपये का मुआवजा दे। हाई कोर्ट द्वारा निर्धारित ब्याज दरें (7.5%, यदि भुगतान देर से होता है तो 9% और 12%) जारी रहेंगी। सभी हाई कोर्ट्स के रजिस्ट्रार जनरल को इस फैसले की एक प्रति भेजी जाए ताकि मुख्य न्यायाधीश आवश्यक आदेश जारी कर सकें।

Summary

फैसले के प्रभाव दूरगामी होंगे- गृहिणियों के काम को पहली बार संवैधानिक रूप से 'राष्ट्र निर्माण' मान्यता मिली है। अब मुआवजा राशियां गृहिणियों के लिए काफी अधिक (लगभग 3-4 गुना) हो जाएंगी। न्यायालयों में '4 साल' के लंबित मामलों को प्राथमिकता पर सुनना अनिवार्य कर दिया गया है।

इस फैसले के बाद गृहिणियों के काम को पहली बार 'राष्ट्र निर्माण' के रूप में मान्यता मिली है। अदालत ने माना कि गृहिणियों का योगदान भारत की जीडीपी का 15-17% है, लेकिन इसे आर्थिक रूप से मान्यता नहीं दी जाती।
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