
बेंगलुरु- आईआईएम बेंगलुरु के प्रोफेसर अमर सप्रा और उनकी पत्नी अंशु सप्रा पर 25 वर्षीय कुकी आया के साथ लंबे समय तक यातना देने के मामले में गंभीर मोड़ आया है। माइको लेआउट पुलिस स्टेशन में 6 मई को दर्ज प्राथमिकी में अब अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के प्रावधान भी जोड़ दिए गए हैं। पहले केवल भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 115(2) और 127(2) के तहत मामला दर्ज किया गया था। अब यह केस सिविल राइट्स एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट (डीसीआरई) को ट्रांसफर कर दिया गया है, जिससे आरोपी दंपति के खिलाफ सख्त कार्रवाई की उम्मीद है।
गौरतलब है कि पीडिता ने मई 6 को माइको लेआउट पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखवाई जिसमें बताया कि IIM-B प्रोफेसर अमर सप्रा और उनकी पत्नी अंशु सप्रा उसे भूखा-प्यासा रखते थे, भरपेट भोजन नहीं देते थे और बीमारी में काम करने में असमर्थ होने पर उसके साथ अमानवीय प्रताड़ना करते थे। 4 मई को जुल्म की इन्तहा हो गयी जब उसे किडनी स्टोन का दर्द उठा लेकिन उसका दवा देने की बजाय दोनों ने उसे कमरे में भूखे प्यासे बंद कर दिया। किसी तरह उनके घर से निकलकर वह एक पड़ोसी प्रोफेसर के घर पहुंची जहाँ उसे खाना दिया गया और मणिपुर में उसकी मां से बात करवाई। मां ने कुकी स्टूडेंट्स आर्गेनाईजेशन के स्थानीय सदस्यों से मदद मांगी जिसके बाद समुदाय आगे आया और पीडिता की आपबीती उजागर हुई।
मणिपुर के चुराचांदपुर जिले की रहने वाली पीडिता नैना ( बदला हुआ नाम ) पिछले छह वर्षों से आईआईएम बेंगलुरु कैंपस के बैनरघट्टा रोड स्थित प्रोफेसर अमर सप्रा के आवास पर नानी-कम-हाउसकीपर के रूप में काम कर रही थीं। वर्ष 2019 में एक प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से प्रोफेसर के परिवार में बेबीसिटर के रूप में काम करने बेंगलुरु आई थी। वह अपने परिवार की सबसे बड़ी संतान और इकलौती कमाने वाली सदस्य हैं। नैना ने द मूकनायक को बताया कि, “नौकरी की शर्तों के बारे में बातचीत के समय मुझे बताया गया था कि मेरा काम केवल चाइल्ड केयर यानी आया का होगा। लेकिन जब मैं वहां पहुंची तो मुझे इसके अलावा बर्तन साफ करना, घर की सफाई दिन में दो बार करना आदि घरेलू काम भी करने पड़े। मेरा काम सुबह 6:30 बजे से रात 12 बजे तक चलता था, यानी 18 घंटे जो श्रम कानून के अनुसार निर्धारित समय से दोगुना है। अतिरिक्त 9 घंटे के काम का मुझे कभी भुगतान नहीं किया गया। यहां तक कि तय वेतन भी पूरा नहीं दिया जाता था।”
“मुझे उनके घर के बाहर एक छोटे कमरे में रहने दिया जाता था, जिसमें पीने का पानी तक नहीं था। पिछले पांच वर्षों से मेरी आवाजाही पूरी तरह प्रतिबंधित थी। मुझे कभी छुट्टी नहीं दी गई, यहां तक कि रविवार को भी नहीं। जब मैं बीमार पड़ती, जैसे तेज सिरदर्द या दस्त की शिकायत होती, तो सिर्फ 1-2 घंटे आराम करने दिया जाता और फिर काम पर लगा दिया जाता। कैंपस में डॉक्टर से दवा लेने पर भी पैसे मेरे वेतन से काटे जाते या मुझे खुद खरीदने पड़ते।”
नैना ने आरोप लगाया कि ज्यादातर यातना अंशु सप्रा द्वारा दी जाती थी। वे उनके बाल खींचतीं, थप्पड़ मारतीं और ‘पागल’, ‘इडियट’ जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित करतीं। कई बार काम पूरा होने तक उन्हें भूखा रखा जाता था। एक बार नियोक्ता दंपति के नाबालिग बेटे ने भी उन्हें शारीरिक रूप से मारा, लेकिन नियोक्ताओं ने उसे नहीं रोका।
नैना ने बताया कि वह एक साल से अधिक समय से अपने परिवार को नहीं देख पाई हैं। “पिछले साल जब मेरे पिता का निधन हुआ तब मैं घर गई थी। उसके बाद से मैंने परिवार को नहीं देखा।"
माइको लेआउट पुलिस ने प्रोफेसर अमर सप्रा और अंशु सप्रा को दो बार नोटिस जारी कर थाने में बयान दर्ज कराने के लिए बुलाया, लेकिन दोनों बार वे हाजिर नहीं हुए।
एसीपी नागराज ने ‘द मूकनायक’ को बताया कि एससी/एसटी अत्याचार प्रावधान अब शामिल कर लिए गए हैं और केस डीसीआरई (नागरिक अधिकार प्रवर्तन निदेशालय (DCRE) को ट्रांसफर हो चुका है। कर्नाटक में नागरिक अधिकार प्रवर्तन निदेशालय अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के खिलाफ अत्याचारों और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों को देखने वाला एक विशेष पुलिस विभाग है। त्वरित और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए पूरे राज्य में 33 समर्पित डीसीआरई पुलिस स्टेशन काम कर रहे हैं।
एसीपी नागराज ने बताया कि अब कोई नये जांच अधिकारी (आईओ) आरोपी दंपति से पूछताछ करेंगे। पीड़िता फिलहाल पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) का इलाज करा रही हैं और गंभीर मानसिक आघात से गुजर रही हैं।
शुरू में प्राथमिकी में एससी/एसटी प्रावधान नहीं जोड़े गए थे क्योंकि पीड़िता का ट्राइब सर्टिफिकेट उपलब्ध नहीं था। बाद में केएसओबी के प्रयासों के बाद चुराचांदपुर जिलाधिकारी कार्यालय से सर्टिफिकेट जारी करवा कर पुलिस को भिजवाया गया।
कुकी स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन बेंगलुरु (केएसओबी) लगातार पीड़िता के साथ खड़ी है और न्याय दिलाने के लिए प्रयासरत है। केएसओबी के अध्यक्ष सेलालमुओन हाओकिप ने ‘द मूकनायक’ से बातचीत करते हुए कहा, “सबसे चिंताजनक बात यह है कि आईआईएम बेंगलुरु जैसी प्रतिष्ठित संस्था, जो शब्दों में समावेशिता और सामाजिक न्याय की बात करती है, अपने फैकल्टी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। हमने डायरेक्टर को दो बार पत्र लिखकर तत्काल कार्रवाई और सस्पेंशन की मांग की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। यह अत्यंत निंदनीय और दुखद है।”
प्राथमिकी दर्ज होने और नोटिस जारी होने के बावजूद अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। आईआईएम बेंगलुरु ने प्रोफेसर अमर सप्रा के खिलाफ कोई आंतरिक कार्रवाई करने या आधिकारिक बयान जारी करने की जानकारी नहीं दी है।
‘द मूकनायक’ ने पहले आईआईएम बेंगलुरु के डायरेक्टर प्रो. यू. दिनेश कुमार, प्रो. अमर सप्रा और अंशु सप्रा से इस संबध में उनका पक्ष जानने की के लिए मेल भी किये लेकिन किसी से जवाब नहीं मिला।
एससी/एसटी अत्याचार अधिनियम के शामिल होने से मामले की गंभीरता बढ़ गई है। ‘द मूकनायक’ इस मामले पर लगातार नजर रखे हुए है और आगे की जांच, गिरफ्तारी तथा आईआईएम बेंगलुरु की कार्रवाई पर अपडेट देता रहेगा।
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