पत्नी व्यस्क लेकिन पति 20 साल का: साथ रहने के सवाल पर MP हाईकोर्ट का यह महत्वपूर्ण फैसला ज़रूर पढें

हाईकोर्ट ने कहा कि महिला को आजादी तो है, लेकिन वह इस आजादी का इस्तेमाल कानूनी तौर पर अमान्य शादी को मान्यता दिलाने के लिए नहीं कर सकती।
अदालत ने साफ कर दिया कि महिला को पुलिस हिरासत से मुक्त किया जा रहा है, लेकिन कानूनी तौर पर अमान्य विवाह होने के कारण उसे नाबालिग याचिकाकर्ता के सुपुर्द नहीं किया जा सकता।
अदालत ने साफ कर दिया कि महिला को पुलिस हिरासत से मुक्त किया जा रहा है, लेकिन कानूनी तौर पर अमान्य विवाह होने के कारण उसे नाबालिग याचिकाकर्ता के सुपुर्द नहीं किया जा सकता।एआई निर्मित सांकेतिक चित्र
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इंदौर- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वयस्क महिला को अपनी इच्छा से रहने की पूरी आजादी है और पुलिस उसे गैरकानूनी रूप से हिरासत में नहीं रख सकती, लेकिन अगर कोई पुरुष कानूनी विवाह योग्य आयु यानि 21 वर्ष से कम है तो वह महिला उसके साथ 'पत्नी' के रूप में नहीं रह सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे रिश्ते को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।

जस्टिस प्रणय वर्मा और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की युगलपीठ ने यह ऐतिहासिक आदेश ऋतेश कटारा नामक युवक की बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका संख्या- 19587/2026 के तहत दायर इस मामले में याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि कोर्ट के समक्ष पेश महिला (कोर्पस) उसकी कानूनी पत्नी है और पुलिस उसे अवैध रूप से हिरासत में लिए हुए है।

कोर्ट के 1 जून के आदेश पर पुलिस महिला को 5 जून को कोर्ट में लेकर पहुंची। महिला कांस्टेबल कविता भाटिया और खाचरौद थाना प्रभारी धन सिंह उसे लेकर आए। कोर्ट ने महिला से निजी तौर पर बातचीत की और उसकी वास्तविक इच्छा जानी। महिला ने साफ कहा कि वह याचिकाकर्ता ऋतेश कटारा के साथ ही जाना चाहती है।

कोर्ट ने कहा- 'याचिकाकर्ता की उम्र 20 साल, शादी कानूनी तौर पर मान्य नहीं'

महिला की इच्छा के बावजूद कोर्ट ने याचिकाकर्ता की उम्र पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि भारतीय कानून के तहत लड़कों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल है। कोर्ट ने अपने आदेश में साफ लिखा-

"याचिकाकर्ता स्वयं 20 वर्ष का है, इसलिए कोर्पस के साथ उसके कथित विवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती है।"

महिला को याचिकाकर्ता के साथ भेजने से मना करते हुए कोर्ट ने कहा- "हमने कोर्पस से उसकी इच्छा के बारे में पूछा और उसने कहा कि वह याचिकाकर्ता के साथ जाना चाहती है। लेकिन तथ्य यह है कि याचिकाकर्ता विवाह योग्य आयु का नहीं है, इसलिए कोर्पस को उसके साथ भेजने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि महिला वयस्क है और उसे अपनी मर्जी से जीने का पूरा हक है। कोर्ट ने कहा- "कोर्पस वयस्क है, उसे निश्चित रूप से अपनी इच्छा के अनुसार रहने का अधिकार है और पुलिस अधिकारियों द्वारा उसे गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं रखा जा सकता है।"

अदालत ने साफ कर दिया कि महिला को पुलिस हिरासत से मुक्त किया जा रहा है, लेकिन कानूनी तौर पर अमान्य विवाह होने के कारण उसे नाबालिग याचिकाकर्ता के सुपुर्द नहीं किया जा सकता।
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हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को संतुलित करते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि महिला को आजादी तो है, लेकिन वह इस आजादी का इस्तेमाल कानूनी तौर पर अमान्य शादी को मान्यता दिलाने के लिए नहीं कर सकती। कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है-

"यह निर्देश दिया जाता है कि कोर्पस अपनी इच्छा के अनुसार रहने के लिए स्वतंत्र होगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह याचिकाकर्ता के साथ पत्नी के रूप में रहे।"

पुलिस को निर्देश देते हुए कोर्ट ने कहा-

"कोर्पस को पुलिस अधिकारियों (महिला कांस्टेबल कविता भाटिया और थाना प्रभारी धन सिंह) द्वारा, जो उसे कोर्ट में लेकर आए हैं, उस स्थान पर एस्कॉर्ट किया जाएगा, जहां वह जाना चाहती है।"

उपरोक्त सभी टिप्पणियों और निर्देशों के साथ कोर्ट ने इस बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निपटारा कर दिया। कोर्ट ने साफ कर दिया कि महिला को पुलिस हिरासत से मुक्त किया जा रहा है, लेकिन कानूनी तौर पर अमान्य विवाह होने के कारण उसे नाबालिग (विवाह की दृष्टि से) याचिकाकर्ता के सुपुर्द नहीं किया जा सकता।

एक तरफ कोर्ट ने वयस्क महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आजादी की रक्षा की है। कोर्ट ने साफ कहा है कि कोई भी एजेंसी, चाहे वह पुलिस ही क्यों न हो, किसी वयस्क महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ हिरासत में नहीं रख सकती।

दूसरी तरफ कोर्ट ने बाल विवाह निषेध कानूनों को मजबूती दी है। कोर्ट ने कहा कि कानूनी तौर पर अमान्य विवाह को अदालत की मदद से वैध नहीं बनाया जा सकता, भले ही दोनों पक्ष शारीरिक रूप से कोर्ट में मौजूद हों और साथ रहने की इच्छा जताएं।

अदालत ने साफ कर दिया कि महिला को पुलिस हिरासत से मुक्त किया जा रहा है, लेकिन कानूनी तौर पर अमान्य विवाह होने के कारण उसे नाबालिग याचिकाकर्ता के सुपुर्द नहीं किया जा सकता।
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अदालत ने साफ कर दिया कि महिला को पुलिस हिरासत से मुक्त किया जा रहा है, लेकिन कानूनी तौर पर अमान्य विवाह होने के कारण उसे नाबालिग याचिकाकर्ता के सुपुर्द नहीं किया जा सकता।
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अदालत ने साफ कर दिया कि महिला को पुलिस हिरासत से मुक्त किया जा रहा है, लेकिन कानूनी तौर पर अमान्य विवाह होने के कारण उसे नाबालिग याचिकाकर्ता के सुपुर्द नहीं किया जा सकता।
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