
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे एक अंतरधार्मिक जोड़े को पुलिस सुरक्षा देने से इनकार कर दिया है। अदालत का कहना है कि जब कोई रिश्ता कानूनी विवाह के योग्य नहीं है, तो उसे लिव-इन के नाम पर अप्रत्यक्ष रूप से मान्यता नहीं दी जा सकती। इस मामले में पुरुष की उम्र विवाह के लिए तय 21 वर्ष से कम थी।
जस्टिस गरिमा प्रसाद की अदालत ने इस याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका एक 20 वर्षीय महिला और 19 वर्षीय पुरुष ने दायर की थी। इस जोड़े ने अपने परिजनों द्वारा रिश्ते में किए जा रहे हस्तक्षेप को रोकने और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अपने जीवन व स्वतंत्रता की रक्षा की गुहार लगाई थी।
अदालत ने अपने 4 मई के आदेश में स्पष्ट किया कि अगर कानून किसी व्यक्ति को 21 साल का होने तक शादी की इजाजत नहीं देता, तो कोर्ट भी इस तरह के रिश्ते को कानूनी समर्थन नहीं दे सकता। महज लिव-इन रिलेशनशिप का नाम देकर ऐसे रिश्ते को विवाह के समतुल्य मानकर न्यायिक सुरक्षा देना उचित नहीं है।
शादी के विकल्प के रूप में हो रहा था इस्तेमाल
जस्टिस प्रसाद ने पाया कि वर्तमान मामले में लिव-इन रिलेशनशिप को शादी के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा था। चूंकि कानूनी तौर पर यह जोड़ा अभी शादी के बंधन में नहीं बंध सकता, इसलिए इन्होंने यह रास्ता चुना। अदालत के मुताबिक, जो रिश्ता पर्सनल लॉ या धर्मनिरपेक्ष विवाह के तहत वैध नहीं है, उसे लिव-इन की शक्ल में न्यायिक मंजूरी नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि एक साथ रहने वाला यह लिव-इन रिश्ता व्यावहारिक रूप से विवाह के समान ही है। अगर शादी की कानूनी उम्र पूरी न होने की वजह से जानबूझकर ऐसा रिश्ता अपनाया जाता है, तो उसे सुरक्षा देने का मतलब एक अवैध विवाह-समान रिश्ते को अप्रत्यक्ष रूप से मंजूरी देना होगा।
अदालत ने एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जब कोई लड़की 18 वर्ष से कम आयु की होती है, तो विवाह या ऐसे किसी रिश्ते के लिए उसकी सहमति को कानून मान्यता नहीं देता। सहमति के दावों के बावजूद ऐसे रिश्तों में पॉक्सो (POCSO) एक्ट जैसे कड़े कानून लागू होते हैं।
इसी सिद्धांत को लागू करते हुए अदालत ने कहा कि वैधानिक ढांचे के तहत 21 वर्ष से कम उम्र के पुरुष को शादी के मामले में "बच्चा" माना गया है। ऐसे में केवल आपसी सहमति का हवाला देकर कानूनी प्रतिबंधों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कानूनी अधिकारियों और परिजनों के अधिकार बरकरार
हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि ऐसे रिश्तों में रहने वाले व्यक्तियों को हिंसा, अवैध हिरासत, दबाव या अपहरण जैसे गैरकानूनी कृत्यों से बचाव का पूरा अधिकार है। लेकिन बाल विवाह निषेध अधिनियम के तहत माता-पिता, अभिभावकों या बाल विवाह निषेध अधिकारियों को उनके कानूनी कदम उठाने से नहीं रोका जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कानून खुद माता-पिता और अभिभावकों पर बाल विवाह रोकने की जिम्मेदारी डालता है, तो कोर्ट ऐसा कोई आदेश पारित नहीं कर सकता जो उन्हें इस कर्तव्य को निभाने से रोके।
इस मामले में अदालत ने कुछ मुख्य सिद्धांत भी तय किए। कोर्ट ने कहा कि किसी ऐसे लिव-इन रिश्ते को सुरक्षा देकर वैधता नहीं दी जा सकती, जो असल में एक अवैध शादी के विकल्प के रूप में काम कर रहा हो।
साथ ही यह भी तय किया गया कि भले ही इस रिश्ते को कानूनी मान्यता न मिले, लेकिन संबंधित व्यक्तियों को किसी भी तरह के नुकसान से सुरक्षा पाने का अधिकार हमेशा रहेगा। इसके अलावा, बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 और अन्य लागू कानूनों के तहत माता-पिता या वैधानिक अधिकारियों को उनके कानूनी दायित्व निभाने से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता, बशर्ते उनका हर कदम कानून के दायरे में हो।
याचिका हुई खारिज
इन सभी तथ्यों को देखते हुए अदालत ने याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने पाया कि जोड़े द्वारा लगाए गए धमकियों के आरोप काफी अस्पष्ट थे। इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत या पुलिस में की गई पूर्व शिकायत भी मौजूद नहीं थी।
याचिका खारिज करने के साथ ही अदालत ने जोड़े को यह छूट दी है कि यदि उन्हें किसी विशेष गैरकानूनी कृत्य का सामना करना पड़ता है, तो वे स्वतंत्र रूप से संबंधित अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं।
इस मामले में जोड़े का कहना था कि वे विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी नहीं कर पा रहे थे क्योंकि पुरुष साथी की उम्र 21 साल नहीं हुई थी। उनका आरोप था कि महिला के पिता उन्हें धमका रहे हैं और रिश्ता खत्म करने का दबाव बना रहे हैं, जिसके चलते उन्होंने पुलिस सुरक्षा की मांग की थी।
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