
जबलपुर- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दूसरे राज्यों से विवाह के बाद मध्य प्रदेश में स्थायी रूप से बसने वाली महिलाओं को आरक्षण का लाभ मिल सकता है, बशर्ते उनकी जाति दोनों राज्यों में आरक्षित श्रेणी में अधिसूचित हो और उनके पास मध्य प्रदेश के सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी जाति प्रमाणपत्र हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी अन्य राज्य द्वारा जारी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर मध्य प्रदेश में सरकारी नौकरी में आरक्षण का लाभ नहीं लिया जा सकता।
जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने सुनिता पाठोडे, ललिता हरिणखेड़े और पूजा साहू द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिकाकर्ताओं ने जिला शिक्षा अधिकारी, बालाघाट द्वारा उनके ओबीसी प्रमाणपत्रों को अमान्य मानते हुए मध्य शिक्षक (मिडिल टीचर) पद पर उनकी उम्मीदवारी खारिज किए जाने को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे मूल रूप से महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की निवासी हैं तथा विवाह के बाद मध्य प्रदेश में बस गई हैं। उनकी जातियां कुनबी, पवार और तेली उनके मूल राज्यों के साथ-साथ मध्य प्रदेश में भी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की सूची में शामिल हैं। इसलिए उन्हें ओबीसी उम्मीदवार के रूप में नियुक्ति का लाभ मिलना चाहिए।
हालांकि राज्य सरकार ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं के पास मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जारी कोई जाति प्रमाणपत्र नहीं है। उनके प्रमाणपत्र महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के अधिकारियों द्वारा जारी किए गए हैं, जिन्हें मध्य प्रदेश में आरक्षण लाभ के लिए मान्य नहीं माना जा सकता।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा, "यह स्थापित कानून है कि किसी व्यक्ति की जातीय स्थिति (Caste Status) स्थान विशेष से जुड़ी होती है। राष्ट्रपति द्वारा जारी जाति संबंधी अधिसूचनाएं क्षेत्र-विशिष्ट होती हैं।" अदालत ने आगे कहा कि सामान्य तौर पर एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने वाले प्रवासी व्यक्ति अपने मूल राज्य के आरक्षण लाभ को नए राज्य में दावा नहीं कर सकते।
हालांकि न्यायालय ने महिलाओं के विवाह के बाद दूसरे राज्य में बसने की स्थिति को अलग माना। अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, "यदि किसी महिला की जाति दोनों राज्यों में आरक्षण के लिए अधिसूचित है और वह विवाह के बाद मध्य प्रदेश में स्थायी रूप से बस गई है, तो उसे आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।"
लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में संबंधित महिला को मध्य प्रदेश के सक्षम प्राधिकारी से नया जाति प्रमाणपत्र प्राप्त करना होगा। न्यायालय ने कहा, "महाराष्ट्र या उत्तर प्रदेश द्वारा जारी जाति प्रमाणपत्र पर भरोसा नहीं किया जा सकता। ऐसी महिला उम्मीदवारों को मध्य प्रदेश में जाति प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन करना होगा।"
हाईकोर्ट ने कहा कि जाति प्रमाणपत्र जारी करने वाले प्राधिकारी केंद्र और राज्य सरकार की अधिसूचनाओं तथा तथ्यात्मक जांच के आधार पर निर्णय लेते हैं। इसलिए अदालत स्वयं यह जांच नहीं करेगी कि किसी व्यक्ति की जाति दूसरे राज्य और मध्य प्रदेश दोनों में ओबीसी श्रेणी में आती है या नहीं। यह कार्य विशेषज्ञ प्राधिकारियों का है।
न्यायालय ने कहा, "यदि याचिकाकर्ताओं को मध्य प्रदेश में सक्षम प्राधिकारी द्वारा जाति प्रमाणपत्र जारी किया गया होता, तो उसका उपयोग आरक्षण लाभ प्राप्त करने के लिए किया जा सकता था। लेकिन महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश द्वारा जारी प्रमाणपत्रों के आधार पर मध्य प्रदेश की सेवाओं में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता।"
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया और जिला शिक्षा अधिकारी के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
यह फैसला उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है जो विवाह के बाद दूसरे राज्यों से मध्य प्रदेश में आकर बसती हैं और राज्य की सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ प्राप्त करना चाहती हैं।
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