
मुंबई- बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि कर्मचारियों द्वारा ऑफिस आने-जाने के लिए इस्तेमाल किया गया शेयर ऑटो-रिक्शा 'कार्यस्थल' (Workplace) नहीं माना जा सकता, जब तक कि वह परिवहन नियोक्ता (Employer) द्वारा उपलब्ध न कराया गया हो । अदालत ने यह फैसला सेक्सुअल हरासमेंट ऑफ वीमेन एट वर्कप्लेस (प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल) एक्ट, 2013 (POSH Act) के तहत एक बैंक कर्मचारी को दोषी ठहराने वाले इंटरनल कंप्लेंट कमेटी (ICC) के आदेश को पलटते हुए दिया।
दरअसल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) में 14 साल से कार्यरत याचिकाकर्ता सिद्धेश प्रदीप साठपुते रोजाना नवी मुंबई से बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) स्थित अपने बैंक के ऑफिस जाने के लिए शेयर ऑटो का इस्तेमाल करते थे। 24 मार्च 2023 को साठपुते नवी मुंबई से लोकल ट्रेन पकड़कर कुरला स्टेशन पहुंचे। वहां से BKC स्थित बैंक जाने के लिए उन्होंने शेयर ऑटोरिक्शा लिया। ऑटो में एक महिला यात्री भी सवार थीं।
यात्री के अनुसार, खराब सड़क और भीड़भाड़ के कारण हाथ लगने की घटना हुई, जिसे महिला ने छेड़छाड़ बताकर विरोध जताया। महिला ने उन पर पेपर स्प्रे छोड़ा, पुलिस में शिकायत की और अपनी कंपनी के ICC के साथ-साथ SBI की आंतरिक समिति में भी शिकायत दर्ज कराई।
SBI की ICC ने 29 अगस्त 2023 को सिद्धेश को दोषी ठहराते हुए कार्रवाई की सिफारिश की थी। कर्मचारी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
महिला किसी अन्य कंपनी में शेफ के पद पर कार्यरत थी, उसने पहले अपनी कंपनी की ICC में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद यह शिकायत SBI की ICC को भेज दी गई। SBI की ICC ने जांच के बाद 29 अगस्त 2023 को सतपुते को यौन उत्पीड़न का दोषी पाया और उनके खिलाफ सेवा नियमों के तहत कार्रवाई की सिफारिश की।
सतपुते ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनकी ओर से अधिवक्ता आनंद पांडे ने तर्क दिया कि ICC के पास इस शिकायत की सुनवाई का कोई अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) नहीं था, क्योंकि यह घटना 'कार्यस्थल' पर नहीं हुई थी । उन्होंने कहा कि यह एक सार्वजनिक शेयर ऑटो था, न कि नियोक्ता द्वारा उपलब्ध कराया गया परिवहन।
जस्टिस सुमन श्याम और जस्टिस फिरदोश पी. पूनीवाला की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता के तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि POSH एक्ट की धारा 2(o)(v) के तहत 'कार्यस्थल' की परिभाषा में 'नियोक्ता द्वारा उपलब्ध कराया गया परिवहन' शामिल है। चूंकि यह ऑटो किसी भी नियोक्ता द्वारा उपलब्ध नहीं कराया गया था, इसलिए इसे कार्यस्थल नहीं माना जा सकता।
पीठ ने कहा, "हालांकि याचिकाकर्ता अपने ऑफिस जा रहा था, लेकिन यह परिवहन न तो उसके नियोक्ता द्वारा और न ही शिकायतकर्ता के नियोक्ता द्वारा उपलब्ध कराया गया था। ऐसी परिस्थितियों में, यह परिवहन 'कार्यस्थल' की परिभाषा में नहीं आता है"।
कोर्ट ने साफ किया कि ICC को पहले यह तय करना होगा कि कथित घटना 'कार्यस्थल' पर हुई है या नहीं। यदि नहीं, तो उसके पास आगे की जांच करने का अधिकार नहीं है।
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने इस मामले के गुण-दोष (Merits) पर कोई टिप्पणी नहीं की है कि क्या वास्तव में याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता के साथ यौन उत्पीड़न किया था या नहीं। यह पहलू उचित कानूनी कार्यवाही में विचारणीय होगा।
इस फैसले के साथ बॉम्बे हाईकोर्ट ने SBI की ICC के 29 अगस्त 2023 के आदेश को पूरी तरह से खारिज कर दिया ।
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