‘टोकरे कोली’ ST प्रमाणपत्र अमान्य, लेकिन 30 साल की सेवा का दिया लाभ; सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के रिटायर्ड नगर निगम कर्मी को अनुच्छेद 142 के तहत क्यों दी राहत?

अदालत ने कहा कि वह पाटील के “टोकरे कोली” अनुसूचित जनजाति के दावे को अमान्य ठहराने वाले निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाती। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न तो पाटील और न ही उनके परिवार का कोई सदस्य भविष्य में अमान्य किए गए जाति प्रमाणपत्र के आधार पर किसी लाभ का दावा कर सकेगा।
अदालत ने आदेश दिया कि पाटील द्वारा 21 अक्टूबर 1994 से 30 जून 2025 तक की गई सेवा को केवल उनके सेवानिवृत्ति और पेंशन संबंधी लाभों की गणना और भुगतान के सीमित उद्देश्य के लिए सुरक्षित माना जाए। ये लाभ लागू सेवा नियमों के अनुसार दिए जाएंगे।
अदालत ने आदेश दिया कि पाटील द्वारा 21 अक्टूबर 1994 से 30 जून 2025 तक की गई सेवा को केवल उनके सेवानिवृत्ति और पेंशन संबंधी लाभों की गणना और भुगतान के सीमित उद्देश्य के लिए सुरक्षित माना जाए। ये लाभ लागू सेवा नियमों के अनुसार दिए जाएंगे।एआई इमेज
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नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के एक सेवानिवृत्त नगर निगम कर्मचारी के “टोकरे कोली” अनुसूचित जनजाति (एसटी) के दावे को अमान्य ठहराने वाले महाराष्ट्र अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जांच समिति और बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। हालांकि, अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्ति का इस्तेमाल करते हुए कर्मचारी को उसकी सेवानिवृत्ति और पेंशन संबंधी लाभ देने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इन लाभों की सुरक्षा को “टोकरे कोली” अनुसूचित जनजाति के दावे की मान्यता नहीं माना जाएगा और भविष्य में वह या उसके परिवार का कोई सदस्य अमान्य जाति प्रमाणपत्र के आधार पर किसी लाभ का दावा नहीं कर सकेगा।

यह फैसला जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने 3 सितंबर को सुनाया। मामला शिरीष पंढारीनाथ पाटील बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य, सिविल अपील संख्या, एसएलपी (सिविल) संख्या 12938/2020 से संबंधित है।

1984 में मिला था टोकरे कोली एसटी प्रमाणपत्र

मामले के अनुसार, शिरीष पंढारीनाथ पाटील को वर्ष 1984 में “टोकरे कोली” अनुसूचित जनजाति का प्रमाणपत्र जारी किया गया था। इसी प्रमाणपत्र के आधार पर उन्हें 21 अक्टूबर 1994 को बृहन्मुंबई महानगरपालिका में कनिष्ठ अभियंता (सिविल) के पद पर नियुक्ति मिली। वर्ष 1999 में उन्हें पदोन्नति भी मिली।

मूल जाति प्रमाणपत्र खो जाने के बाद पाटील ने 21 अक्टूबर 2000 को भुसावल संभाग के उप-विभागीय मजिस्ट्रेट से नया जाति प्रमाणपत्र प्राप्त किया। इस प्रमाणपत्र में उन्हें “टोकरे कोली” अनुसूचित जनजाति का बताया गया था।

वर्ष 2008 में उनके नियोक्ता ने जाति दावे को सत्यापन के लिए भेजा। इसके बाद पुलिस सतर्कता प्रकोष्ठ ने 16 सितंबर 2008 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

रिपोर्ट में पाटील के परिवार के कई पुराने दस्तावेजों का उल्लेख किया गया था। इन दस्तावेजों में उनके पितृ पक्ष के पूर्वजों की जाति “कोली”, “हिंदू कोली” और “हिंदू सूर्यवंशी कोली” दर्ज होने की बात सामने आई।

इसके बाद 10 जुलाई 2009 को उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। पाटील ने इसके जवाब और विभिन्न अभ्यावेदन प्रस्तुत किए।

अदालत ने आदेश दिया कि पाटील द्वारा 21 अक्टूबर 1994 से 30 जून 2025 तक की गई सेवा को केवल उनके सेवानिवृत्ति और पेंशन संबंधी लाभों की गणना और भुगतान के सीमित उद्देश्य के लिए सुरक्षित माना जाए। ये लाभ लागू सेवा नियमों के अनुसार दिए जाएंगे।
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कई बार सुनवाई और समिति के पुनर्गठन के बाद मामला आगे बढ़ा

फैसले के अनुसार, जाति जांच समिति के समक्ष मामले की कई बार सुनवाई हुई और समिति का कई बार पुनर्गठन भी हुआ। अंततः मामला 2 जनवरी 2020 को सूचीबद्ध किया गया।

उस दिन पाटील स्वयं उपस्थित नहीं हुए। उन्होंने लिखित अभ्यावेदन दिया और अपने अधिवक्ता तथा परिवार के बुजुर्ग सदस्यों की अनुपलब्धता का हवाला देते हुए स्थगन की मांग की। समिति ने उनकी स्थगन याचिका स्वीकार नहीं की और मामला आदेश के लिए रख दिया।

इसके बाद 27 जुलाई 2020 को अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जांच समिति ने पाटील के 21 अक्टूबर 2000 के जाति प्रमाणपत्र को अमान्य कर दिया तथा उसे रद्द और जब्त करने का आदेश दिया।

पाटील ने समिति के आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका तर्क था कि स्थगन की मांग अस्वीकार करके समिति ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया। उन्होंने यह भी कहा कि समिति ने उनके द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों पर उचित विचार नहीं किया।

इन दस्तावेजों में परिवार की कृषि भूमि का 7/12 उतारा, जिसमें भूमि को “आदिवासी भूमि” के रूप में दर्ज किए जाने की बात कही गई थी, और उनके चचेरे भाई विनोद जी. सोनवणे को दिया गया जाति वैधता प्रमाणपत्र शामिल था।

पाटील की ओर से यह भी कहा गया कि पुराने पारिवारिक रिकॉर्ड में “कोली” और “सूर्यवंशी कोली” दर्ज होना उनके “टोकरे कोली” अनुसूचित जनजाति के दावे को अमान्य करने का आधार नहीं हो सकता।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने समिति के आदेश को रखा बरकरार

15 सितंबर 2020 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने पाटील की याचिका खारिज कर दी और जाति जांच समिति के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट ने माना कि लंबी अवधि तक चली कार्यवाही के दौरान पाटील को पर्याप्त अवसर मिला था। इसलिए 2 जनवरी 2020 को स्थगन आवेदन खारिज करने से उन्हें ऐसा कोई नुकसान नहीं हुआ जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना जाए।

जाति दावे के गुण-दोष पर हाईकोर्ट ने पाटील के दादा और पिता से संबंधित पूर्व-संवैधानिक रिकॉर्ड को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना, जिनमें उनकी जाति “कोली” दर्ज थी। हाईकोर्ट ने “टोकरे कोली” अनुसूचित जनजाति के दावे को स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट ने जांच समिति के इस निष्कर्ष को भी स्वीकार किया कि पाटील के चचेरे भाई विनोद जी. सोनवणे को दिया गया जाति वैधता प्रमाणपत्र गलत प्रस्तुतीकरण के आधार पर प्राप्त किया गया था।

इसके बाद पाटील ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनीं और जांच समिति के 27 जुलाई 2020 के आदेश तथा बॉम्बे हाईकोर्ट के 15 सितंबर 2020 के फैसले का अध्ययन किया।

पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि उसे जांच समिति के निष्कर्ष में कोई त्रुटि नहीं मिली और हाईकोर्ट ने भी उस निष्कर्ष को सही तरीके से बरकरार रखा।

अदालत ने कहा कि वह पाटील के “टोकरे कोली” अनुसूचित जनजाति के दावे को अमान्य ठहराने वाले निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाती। मामले की सुनवाई के दौरान पाटील की ओर से एक वैकल्पिक मांग रखी गई। चूंकि वह सेवानिवृत्त हो चुके थे, इसलिए उनके सेवानिवृत्ति और पेंशन संबंधी लाभों को सुरक्षित रखने का अनुरोध किया गया।

पाटील ने 18 अगस्त के अपने हलफनामे में बताया कि वह 30 जून 2025 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके कोई बच्चे नहीं हैं और उनके परिवार के किसी सदस्य ने विवादित जाति प्रमाणपत्र के आधार पर कोई लाभ नहीं लिया है।

उनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट के 1 अप्रैल 2024 के Surekha Baljorsingh Thakur v. Caste Scrutiny Committee & Anr. मामले के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें जाति प्रमाणपत्र रद्द होने के बावजूद संबंधित व्यक्ति को सेवानिवृत्ति के बाद के लाभ दिए गए थे।

तीन दशक से अधिक सेवा को देखते हुए अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पाटील ने 21 अक्टूबर 1994 से 30 जून 2025 तक, यानी तीन दशक से अधिक समय तक नगर निगम में सेवा की। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि सुप्रीम कोर्ट के 18 नवंबर 2021 के अंतरिम आदेश के कारण वह अपील लंबित रहने के दौरान सेवा में बने रहे और अंततः अधिवर्षिता की आयु पूरी करने के बाद सेवानिवृत्त हुए।

अदालत ने कहा कि सामान्य तौर पर जाति या जनजाति के दावे के सत्यापन के बाद उसके अमान्य होने के कानूनी परिणाम होते हैं। हालांकि, असाधारण परिस्थितियों में, जब मामले की परिस्थितियां इसकी मांग करती हैं, सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत “पूर्ण न्याय” करने की शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है।

फैसले में Chairman and Managing Director, Food Corporation of India & Ors. v. Jagdish Balaram Bahira & Ors. (2017) का भी उल्लेख किया गया। अदालत ने कहा कि उस मामले में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने माना था कि अमान्य जाति या जनजाति प्रमाणपत्र के आधार पर प्राप्त नियुक्ति सामान्यतः जारी नहीं रह सकती, लेकिन उपयुक्त मामले में पूर्ण न्याय के लिए अनुच्छेद 142 के तहत राहत दी जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने इसके बाद अन्य फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें जाति प्रमाणपत्र रद्द होने के बावजूद संबंधित व्यक्तियों को सेवानिवृत्ति के बाद के लाभों के संबंध में राहत दी गई थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल किया।

अदालत ने आदेश दिया कि पाटील द्वारा 21 अक्टूबर 1994 से 30 जून 2025 तक की गई सेवा को केवल उनके सेवानिवृत्ति और पेंशन संबंधी लाभों की गणना और भुगतान के सीमित उद्देश्य के लिए सुरक्षित माना जाए। ये लाभ लागू सेवा नियमों के अनुसार दिए जाएंगे।

अदालत ने संबंधित लाभों को फैसले की तारीख से छह महीने के भीतर संसाधित कर जारी करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया। अदालत ने कहा कि सेवानिवृत्ति और पेंशन लाभों के लिए दी गई यह सुरक्षा पाटील के “टोकरे कोली” अनुसूचित जनजाति से संबंधित दावे का सत्यापन या मान्यता नहीं है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि न तो पाटील और न ही उनके परिवार का कोई सदस्य भविष्य में अमान्य किए गए जाति प्रमाणपत्र के आधार पर किसी लाभ का दावा कर सकेगा।

इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने अपील को सीमित सीमा तक स्वीकार किया, जाति दावे को अमान्य ठहराने वाले जांच समिति और हाईकोर्ट के आदेश बरकरार रहे, लेकिन तीन दशक से अधिक की सेवा को देखते हुए पाटील के सेवानिवृत्ति और पेंशन संबंधी लाभों को अनुच्छेद 142 के तहत सुरक्षित कर दिया गया।

अदालत ने आदेश दिया कि पाटील द्वारा 21 अक्टूबर 1994 से 30 जून 2025 तक की गई सेवा को केवल उनके सेवानिवृत्ति और पेंशन संबंधी लाभों की गणना और भुगतान के सीमित उद्देश्य के लिए सुरक्षित माना जाए। ये लाभ लागू सेवा नियमों के अनुसार दिए जाएंगे।
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अदालत ने आदेश दिया कि पाटील द्वारा 21 अक्टूबर 1994 से 30 जून 2025 तक की गई सेवा को केवल उनके सेवानिवृत्ति और पेंशन संबंधी लाभों की गणना और भुगतान के सीमित उद्देश्य के लिए सुरक्षित माना जाए। ये लाभ लागू सेवा नियमों के अनुसार दिए जाएंगे।
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अदालत ने आदेश दिया कि पाटील द्वारा 21 अक्टूबर 1994 से 30 जून 2025 तक की गई सेवा को केवल उनके सेवानिवृत्ति और पेंशन संबंधी लाभों की गणना और भुगतान के सीमित उद्देश्य के लिए सुरक्षित माना जाए। ये लाभ लागू सेवा नियमों के अनुसार दिए जाएंगे।
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