
लखनऊ: उत्तर प्रदेश के चार राजकीय मेडिकल कॉलेजों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति विद्यार्थियों के लिए विशेष सीट व्यवस्था को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच छात्रों को बड़ी राहत मिली है। उत्तर प्रदेश सरकार के चिकित्सा शिक्षा विभाग ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए जारी शासनादेश में अंबेडकरनगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर के विशेष समेकित योजना (एससीपी) के तहत स्थापित राजकीय मेडिकल कॉलेजों में पहले से चली आ रही सीट व्यवस्था को जारी रखने का निर्णय लिया है। सरकार ने यह निर्णय इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित विशेष अपील का उल्लेख करते हुए लिया है। शासनादेश में स्पष्ट किया गया है कि मामला न्यायालय में विचाराधीन होने के कारण इन चारों कॉलेजों में राज्य कोटे की सीटों का वर्गवार विभाजन पूर्व की भांति रखा जाएगा।
इस निर्णय को लेकर आंदोलन कर रहे विद्यार्थियों ने इसे अपनी लड़ाई की बड़ी जीत बताया है। अरुण सोनकर, जो इस मुद्दे पर छात्रों की ओर से लगातार आवाज उठा रहे हैं, ने द मूकनायक से बातचीत में कहा कि यह केवल आंदोलन की सफलता नहीं, बल्कि SC/ST विद्यार्थियों के अधिकार, सम्मान और प्रतिनिधित्व की जीत है। उन्होंने छात्रों और आंदोलन से जुड़े लोगों को बधाई देते हुए इसे संघर्ष, एकता और दृढ़ संकल्प का परिणाम बताया। हालांकि, सोनकर और अन्य विद्यार्थियों का कहना है कि मौजूदा शासनादेश से तत्काल राहत जरूर मिली है, लेकिन भविष्य में इस व्यवस्था में फिर बदलाव न हो, इसके लिए स्थायी कानूनी संरक्षण यानी कानून बनाना जरूरी है।
सरकार के नए शासनादेश में चारों मेडिकल कॉलेजों के लिए राज्य कोटे की 85 सीटों का वही वर्गवार विभाजन दर्ज किया गया है। प्रत्येक कॉलेज में 85 राज्य कोटे की सीटों में 62 सीटें अनुसूचित जाति, 5 अनुसूचित जनजाति, 11 अन्य पिछड़ा वर्ग और 7 अनारक्षित रखी गई हैं। इस तरह राज्य कोटे में SC/ST विद्यार्थियों के लिए कुल 67 सीटें बनी रहती हैं।
यह वही व्यवस्था है जिसे छात्र पिछले कई सप्ताह से बचाने की मांग कर रहे थे। चारों कॉलेजों में 100-100 एमबीबीएस सीटों की कुल संरचना में 15 सीटें अखिल भारतीय कोटे के तहत जाती हैं, जबकि 85 सीटें राज्य कोटे में रहती हैं। पुराने आवंटन में 15 अखिल भारतीय कोटे की सीटों में 2 SC, 1 ST, 4 OBC और 8 अनारक्षित सीटें थीं। इसके साथ राज्य कोटे की 62 SC और 5 ST सीटें जोड़ने पर प्रत्येक कॉलेज में कुल 64 SC और 6 ST, यानी 70 SC/ST सीटों की व्यवस्था बनती है।
यही 70 प्रतिशत व्यवस्था इस पूरे विवाद का केंद्र रही है। विद्यार्थियों का कहना है कि इन चार मेडिकल कॉलेजों की स्थापना सामान्य मेडिकल कॉलेजों के रूप में नहीं, बल्कि विशेष समेकित योजना यानी SCSP/SCP से जुड़े उद्देश्य और निधियों के तहत की गई थी। इसलिए उनका तर्क है कि इन संस्थानों में सामान्य राज्य आरक्षण व्यवस्था लागू करने से उनके मूल उद्देश्य पर असर पड़ेगा।
चिकित्सा शिक्षा विभाग के 2026-27 के शासनादेश में सामान्य राजकीय मेडिकल कॉलेजों के लिए राज्य कोटे में SC के लिए 21 प्रतिशत, ST के लिए 2 प्रतिशत और OBC के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान बताया गया है। लेकिन उसी शासनादेश में इन चार मेडिकल कॉलेजों को सामान्य राजकीय मेडिकल कॉलेजों से अलग रखते हुए विशेष समेकित योजना के तहत स्थापित संस्थानों के रूप में स्पष्ट रूप से अलग से उल्लेख किया गया है।
शासनादेश में कहा गया है कि साबरा अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 25 अगस्त 2025 के आदेश को चुनौती देते हुए Special Appeal No. 295/2025, उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य बनाम साबरा अहमद, दाखिल की गई है और मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है। इसी न्यायिक स्थिति को देखते हुए सरकार ने इन चारों मेडिकल कॉलेजों में पूर्व की तरह राज्य कोटे की सीटों का वर्गवार विभाजन जारी रखने का निर्णय लिया है।
इसका अर्थ यह है कि 2026-27 के लिए सरकार ने इन चारों कॉलेजों पर सामान्य 21 प्रतिशत SC और 2 प्रतिशत ST वाली व्यवस्था लागू नहीं की है। इसके बजाय पुराने 62 SC और 5 ST वाले राज्य कोटे को बनाए रखा गया है।
आंदोलनकारी छात्रों की मुख्य चिंता यही थी कि यदि चारों कॉलेजों को सामान्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों की तरह माना गया और उत्तर प्रदेश का सामान्य आरक्षण ढांचा लागू हुआ, तो SC/ST विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध सीटों में बड़ी कमी हो सकती है।
छात्रों ने इस संभावित कमी को करीब 180 से 200 एमबीबीएस सीटों के स्तर पर बताया था। अब सरकार के नए शासनादेश में मौजूदा सीट विभाजन को जारी रखने से कम से कम 2026-27 के लिए छात्रों की यह तत्काल आशंका टल गई है।
इस मुद्दे को लेकर विद्यार्थियों ने लखनऊ के ईको गार्डन में शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया था। अंबेडकरनगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर के मेडिकल कॉलेजों से जुड़े SC/ST विद्यार्थियों ने सरकार से मौजूदा व्यवस्था बनाए रखने की मांग की थी। छात्रों ने अधिकारियों और सरकार को ज्ञापन देकर कहा था कि चारों संस्थानों में वर्तमान सीट व्यवस्था को अंतिम न्यायिक निर्णय तक बदला नहीं जाना चाहिए।
विद्यार्थियों की मांग केवल सीटों तक सीमित नहीं रही। उनका कहना था कि यदि सरकार और प्रशासन विशेष घटक योजना के तहत स्थापित इन संस्थानों की मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखते हैं तो उसे भविष्य के लिए भी कानूनी सुरक्षा दी जानी चाहिए।
आंदोलन के दौरान छात्रों ने यह सवाल भी उठाया था कि यदि इन संस्थानों की स्थापना विशेष उद्देश्य और लक्षित निधियों के आधार पर हुई थी, तो भविष्य में किसी प्रशासनिक आदेश के माध्यम से उनकी एडमिशन स्ट्रक्चर में बदलाव नहीं किया जा सके।
अरुण सोनकर ने इस फैसले को लेकर छात्रों को बधाई देते हुए कहा कि संघर्ष और एकजुटता ने यह साबित किया है कि अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर आवाज उठाई जाए तो बदलाव संभव है। उन्होंने इसे SC/ST विद्यार्थियों के अधिकार और प्रतिनिधित्व की जीत बताया।
लेकिन आंदोलनकारी छात्र इस राहत को अंतिम समाधान नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि आज सरकार ने न्यायिक मामला लंबित होने के कारण पुरानी व्यवस्था बनाए रखी है, लेकिन भविष्य में अदालत का फैसला, नया शासनादेश या प्रशासनिक निर्णय इस व्यवस्था को फिर प्रभावित कर सकता है।
इसीलिए छात्रों की अब प्रमुख मांग है कि चारों मेडिकल कॉलेजों की विशेष सीट व्यवस्था को कानून के जरिए सुरक्षित किया जाए। उनका कहना है कि केवल शासनादेश के भरोसे यह व्यवस्था हमेशा सुरक्षित नहीं रह सकती।
सोनकर ने बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (BBAU) का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां आरक्षण व्यवस्था को वैधानिक आधार मिला हुआ है। छात्रों की मांग है कि अंबेडकरनगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर के लिए भी इसी तरह का मजबूत कानूनी संरक्षण तैयार किया जाए।
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