
यवतमाल- बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने यवतमाल जिले के परवा गांव में 2018 में हुए बहुचर्चित सरपंच-पति हत्याकांड मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फालके और न्यायमूर्ति निवेदिता मेहता की खंडपीठ ने यवतमाल की विशेष (अत्याचार प्रतिबंधक) अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए दसों दोषियों की अपीलें खारिज कर दी हैं। यह फैसला 4 अगस्त को सुनाया गया। गांव की राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में एक महिला के पति की सरे बाजार में, कई हमलावरों द्वारा मिलकर की गई हत्या और उसके बाद आठ साल तक चली कानूनी लड़ाई अब हाईकोर्ट के इस फैसले के साथ एक अहम मोड़ पर पहुंच गई है।
यवतमाल जिले के परवा गांव की निवासी नलिनी गावंडे अप्रैल 2015 में ग्राम पंचायत सदस्य चुनी गई थीं। जनवरी 2016 में तत्कालीन सरपंच रमा चिमूरकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित होने के बाद नलिनी गावंडे सरपंच चुनी गईं। सरपंच पद सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित था, और दलित बौद्ध समुदाय से आने वालीं नलिनी सरपंच बन गईं, जिसका गांव के एक गुट ने विरोध किया। आरोपियों में प्रमुख मुन्ना ठाकुर ने इस चुनाव पर खुलेआम आपत्ति जताई और तभी से दोनों गुटों के बीच लगातार टकराव शुरू हो गया।
दिसंबर 2017 में आरोपियों ने नलिनी के पति महेश गावंडे को जाति को लेकर गाली-गलौज की थी, जबकि जनवरी 2018 में गांव में हैंडपंप बांटने को लेकर एक बार फिर विवाद भड़का। 27 जनवरी 2018 को आरोपी मुन्ना ठाकुर ने फोन पर सीधी धमकी दी कि "उसके पति को मार दिया जाएगा।" अगले ही दिन, 28 जनवरी को आरोपियों ने नलिनी के घर पर हमला कर घर का सामान तोड़-फोड़ दिया और प्रफुल्ल शाबंरकर को भी पीटा। इस लगातार परेशानी से तंग आकर नलिनी गावंडे परिवार सहित यवतमाल शहर में रहने चली गई थीं।
27 मार्च 2018 को दोपहर करीब एक बजे नलिनी अपने पति महेश, बेटे मयूर और भतीजे समयक के साथ घर की मरम्मत के काम के सिलसिले में परवा गांव लौटीं। दोपहर करीब एक बजे महेश गावंडे घर की मरम्मत करने वाले शेख इमरान और शेख इसराइल के साथ खर्रा खाने घर से निकले। आंगनवाड़ी के पास ताश खेल रहे प्रशांत शाबंरकर, नितिन लोखंडे, राजू कवळे और प्रकाश भगत से महेश बातचीत कर ही रहे थे कि सभी आरोपी गैरकानूनी जमावड़ा बनाकर घातक हथियारों के साथ वहां पहुंचे और महेश गावंडे पर हमला कर दिया।
शोर सुनकर बेटे मयूर और भतीजे समयक ने दौड़कर नलिनी को घटना की जानकारी दी, जिसके बाद नलिनी खुद घटनास्थल की ओर दौड़ीं और आरोपियों को अपने पति पर हथियारों से वार करते हुए अपनी आंखों से देखा। उन्होंने मदद के लिए चीख-पुकार मचाई, जिस पर लोग जमा हो गए और आरोपी घटनास्थल से फरार हो गए। पुलिस मौके पर पहुंची और महेश को यवतमाल जिला अस्पताल पहुंचाया गया जहां पहुंचने तक उसकी मौत हो चुकी थी। उसी शाम नलिनी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार महेश गावंडे के शरीर पर कुल सत्रह घाव पाए गए, जिनमें बाईं आंख के पास, गाल पर, जबड़े पर, माथे पर, छाती पर और पेट पर छुरा घोंपने तथा धारदार हथियार से काटने के निशान शामिल थे। गला रेते जाने का घाव भी पाया गया। मेडिकल अधिकारियों ने इन घावों को चाकू, चॉपर, तलवार और दरांती जैसे नुकीले व धारदार हथियारों से किए जाने का निष्कर्ष दर्ज किया और मौत का कारण कई बार छुरा घोंपने के साथ गला रेते जाने का घाव बताया।
जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों से तलवार, दरांती और अन्य हथियार बरामद किए। इन हथियारों की चेन ऑफ कस्टडी पुलिस ने विभिन्न पंचनामों के जरिए साबित की। घटनास्थल से एकत्र की गई मिट्टी और शव के नाखूनों से मिली मिट्टी के नमूने आपस में मेल खाते पाए गए, जो फॉरेंसिक जांच से स्पष्ट हुआ और प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही को मजबूती देने वाला साबित हुआ। जांच में कुल अठारह गवाहों से पूछताछ की गई, जिनमें नलिनी गावंडे, उनका बेटा मयूर, तथा शारदा नारायणे और प्रशांत शाबंरकर प्रमुख प्रत्यक्षदर्शी गवाह थे।
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल किया और यवतमाल की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-2 की विशेष (अत्याचार प्रतिबंधक) अदालत में विशेष केस नंबर 18/2018 के तहत सुनवाई हुई।
20 जनवरी 2020 को सत्र न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या), 149 (गैरकानूनी जमावड़े के साझा उद्देश्य से किया गया अपराध), 120-बी (साजिश रचना), 143, 147, 148 और 201 के तहत आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
सत्र न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ सुनील देवताळे, हनुमान पेंडोर, शुभम टेकाम, राज ठाकुर, मुन्ना ठाकुर, विनोद चापरिया, सुमित उर्फ पांड्या उर्फ सुमेध मेश्राम, प्रवीण भगत, भीमराव अवथारे और स्वप्नील कुंभेकार-- कुल दस दोषियों ने पांच अलग-अलग आपराधिक अपीलें दाखिल की थीं। बचाव पक्ष के वकीलों ने दलील दी कि प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयानों में विसंगतियां हैं, गवाह फरियादी के रिश्तेदार होने के कारण उनकी गवाही को पूरी तरह भरोसेमंद नहीं माना जा सकता, और आरोपियों का अपराध संदेह से परे साबित नहीं हुआ।
लेकिन हाईकोर्ट ने यह दलील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शी नलिनी गावंडे ग्रामीण पृष्ठभूमि की महिला हैं, और जब कई हमलावर घातक हथियारों के साथ हमला कर रहे हों, ऐसे में कुछ ही मिनटों में घटी घटना का बिल्कुल सटीक और फोटोग्राफिक विवरण उनसे अपेक्षित नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम हकम सिंह फैसले का हवाला देते हुए खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ग्रामीण गवाहों की गवाही का मूल्यांकन करते समय छोटी-मोटी विसंगतियों को ज्यादा तवज्जो देना उचित नहीं है।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट के बालू सुदाम खल्दे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2023) फैसले में साक्ष्य मूल्यांकन के तय किए गए तेरह सिद्धांतों का भी खंडपीठ ने इस फैसले में विस्तार से उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि नलिनी गावंडे, मयूर गावंडे, शारदा नारायणे और प्रशांत शाबंरकर की गवाहियां एक-दूसरे की पुष्टि करने वाली, सुसंगत और भरोसेमंद हैं, और छोटी-मोटी विसंगतियां होने के बावजूद वे केस के मूल तथ्यों को प्रभावित नहीं करतीं।
फैसले में दर्ज किया गया कि सरपंच पद सामान्य श्रेणी का था और नलिनी अनुसूचित जाति से थीं। आरोपी पक्ष के लोग उनके सरपंच चुने जाने का विरोध कर रहे थे। इस पृष्ठभूमि को मामले में पैदा हुई राजनीतिक रंजिश की शुरुआत के तौर पर देखा।
फैसले में भारतीय दंड संहिता की धारा 141 (गैरकानूनी जमावड़ा), 146 (दंगा), 148 (घातक हथियारों के साथ दंगा) और 149 (साझा उद्देश्य से किया गया अपराध) के प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण किया गया। सुप्रीम कोर्ट के हाल के जैनुल बनाम बिहार राज्य (2025) फैसले का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि किसी जमावड़े का साझा उद्देश्य उसकी बनावट, सदस्यों के पास मौजूद हथियारों और घटना से पहले व घटना के दौरान उनके व्यवहार से तय होता है, और एक बार साझा उद्देश्य साबित हो जाने पर यह साबित करना जरूरी नहीं कि हर सदस्य ने खुद अपराध में सीधे हिस्सा लिया।
इन सिद्धांतों के आधार पर अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपी मुन्ना ठाकुर और विनोद चापरिया सहित सभी आरोपी गैरकानूनी जमावड़े के सदस्य थे और राजनीतिक रंजिश के चलते साझा उद्देश्य से उन्होंने महेश गावंडे की हत्या की। पीड़ित पक्ष और आरोपियों के बीच पुरानी राजनीतिक दुश्मनी थी, यह मानते हुए भी अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल पूर्व-वैमनस्य होने से सबूतों पर आधारित दोषसिद्धी अमान्य नहीं हो जाती।
खंडपीठ ने अपने 179 पन्नों के फैसले के अंत में कहा कि मौखिक साक्ष्य, चिकित्सकीय साक्ष्य, वैज्ञानिक (फॉरेंसिक) साक्ष्य और अन्य साबित तथ्यों पर समग्र रूप से विचार करने पर यह संदेह से परे साबित होता है कि आरोपी गैरकानूनी जमावड़े के सदस्य थे और साझा उद्देश्य से राजनीतिक रंजिश में उन्होंने महेश गावंडे की हत्या की। इसलिए सत्र न्यायालय के दोषसिद्धी और उम्रकैद की सजा के फैसले को बरकरार रखते हुए सभी पांच आपराधिक अपीलें खारिज कर दी गईं और अपीलों का निपटारा कर दिया गया।
इस तरह परवा गांव का यह मामला 2016 में एक दलित महिला के सामान्य श्रेणी की सरपंच सीट पर चुने जाने के बाद शुरू हुए विवाद से लेकर 2018 में उसके पति महेश गवांडे की हत्या और अब हाईकोर्ट द्वारा दोषियों की उम्रकैद बरकरार रखने तक पहुंचता है। अदालत के फैसले में जाति, पंचायत की राजनीति, पुराने विवाद, कथित धमकियां, हत्या, प्रत्यक्षदर्शी गवाही और फोरेंसिक साक्ष्य , इन सभी कड़ियों को विस्तार से परखा गया है। हालांकि अदालत ने अंतिम रूप से हत्या को “जातीय हत्या” नहीं कहा, लेकिन फैसले के रिकॉर्ड में जाति से जुड़े विवाद और नलिनी केअनुसूचित जाति होने का उल्लेख मामले की पृष्ठभूमि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
द मूकनायक के साथ बातचीत में अंबेडकर सेंटर फॉर जस्टिस एंड पीस (एसीजेपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नागसेन सोनारे ने कहा कि "संगठन शुरू से ही इस मामले में शामिल रहा - FIR दर्ज करने से लेकर चार्जशीट दाखिल करने, ट्रायल के दौरान पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने, उन्हें पुलिस सुरक्षा, आर्थिक मदद और मृतक महेश गवांडे की बेटी को नौकरी दिलाने में मदद करने तक सक्रियता दिखाई। नवंबर 2022 में जिनेवा में UN मानवाधिकार उच्चायुक्त के सामने भी यह मामला उठाया गया और संयुक्त राष्ट्र से अपील की गई कि वह भारत को जातिगत अत्याचार रोकने के लिए तुरंत कदम उठाने का निर्देश दें। महाराष्ट्र सेक्रेटरी के नेतृत्व में हमारी ACJP टीम ने शुरू से ही इस मामले पर नज़र रखी और वकील प्रदीप राठोड ने पीड़ित की तरफ़ से केस लड़ा और न्याय दिलाने में बहुत अच्छा काम किया। स्वर्गीय महेश गावंडे को न्याय दिलाने के लिए विनोद तटके और ACJP महाराष्ट्र की टीम को बधाई।"
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