“एक भी छात्र की जान नहीं जानी चाहिए”: बॉम्बे हाईकोर्ट ने आदिवासी छात्रावास आंदोलन पर सरकार को चेताया, 31 को फिर सुनवाई

पुणे के मांजरी में 17 दिनों से चल रही आदिवासी छात्रों की भूख हड़ताल महाराष्ट्र सरकार द्वारा मांगें स्वीकार किए जाने के बाद 29 अगस्त को स्थगित कर दी गई है।
आंदोलन में भूख हड़ताल पर बैठे 20 साल के छात्र राहुल पवारा की सातवे दिन तबीयत बिगड़ी तो उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
आदिवासी कल्याण मंत्री उससे मिलने पहुंचे, तो राहुल ने उनसे बेबाकी से सवाल किए और उनके सामने ही इस्तीफे की मांग कर दी।
आंदोलन में भूख हड़ताल पर बैठे 20 साल के छात्र राहुल पवारा की सातवे दिन तबीयत बिगड़ी तो उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। आदिवासी कल्याण मंत्री उससे मिलने पहुंचे, तो राहुल ने उनसे बेबाकी से सवाल किए और उनके सामने ही इस्तीफे की मांग कर दी।
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मुंबई/पुणे। बॉम्बे हाईकोर्ट ने शनिवार को महाराष्ट्र सरकार को पुणे जिले के मांजरी स्थित सरकारी आदिवासी छात्रावास में भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों को तत्काल चिकित्सा सहायता, जरूरत पड़ने पर अस्पताल में भर्ती और डॉक्टरों की सलाह पर चिकित्सा निगरानी में भोजन उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। अशोक कावडू मेश्राम बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य मामले में एक्टिंग चीफ जस्टिस रविंद्र वी. घुगे और जस्टिस गौतम ए. अंखड़ की खंडपीठ ने दोपहर को मामले को तत्काल सुनवाई के लिए लिया। पीठ ने साफ कहा कि छात्रों की जान बचाना सर्वोच्च प्राथमिकता है।

पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, “जो छात्र उपवास कर रहे हैं उनका ख्याल रखो। जरूरत हो तो इलाज दो। अगर डॉक्टर कहें कि चिकित्सा निरीक्षण में उन्हें भोजन दिया जाए तो वह भी करो। हम नहीं चाहते कि एक भी छात्र की जान जाए।” आदेश में कोर्ट ने लिखा कि राज्य यह सुनिश्चित करे कि सभी प्रभावित छात्रों को समय पर पर्याप्त चिकित्सा सहायता मिले और डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कर इलाज के साथ-साथ चिकित्सा सलाह के तहत भोजन भी दिया जाए।

याचिकाकर्ता अशोक कावडू मेश्राम पुणे जिले के मांजरी के स्थानीय निवासी हैं, जहां सरकारी आदिवासी छात्रावास के छात्र पिछले 15 दिनों से भूख हड़ताल पर थे। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि स्थिति बेहद गंभीर है और छात्रों की जान खतरे में है। उन्होंने चेतावनी दी कि शिकायतें अनसुनी रही तो विरोध पूरे महाराष्ट्र में फैल सकता है। वकील ने सरकारी आदिवासी आवासीय संस्थानों की व्यवस्थागत विफलता रेखांकित करते हुए हालिया घटनाओं का हवाला दिया: अमरावती के आश्रम स्कूल में छात्र मृत्यु और गंभीर फूड पॉइजनिंग, ठाणे के शहापुर तालुका में 22 नाबालिग छात्रों को प्रभावित करने वाला भोजन संदूषण, तथा आवासीय छात्रावास में सांप काटने से हुई मौतें।

एडवोकेट जनरल मिलिंद साठे ने अदालत को बताया कि सरकार ने तुरंत कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उसी दिन आदिवासी विकास मंत्री, विभागीय सचिवों और छात्र प्रतिनिधियों के साथ उच्चस्तरीय बैठक बुलाई है। साठे ने आश्वासन दिया कि बैठक के मिनट्स सोमवार 31 अगस्त को कोर्ट में पेश किए जाएंगे। मामला अगली सुनवाई के लिए 31 अगस्त को रखा गया।

छात्रों का आंदोलन खराब बुनियादी ढांचे, सुरक्षा खतरों और सरकारी आदिवासी छात्रावासों-आश्रम स्कूलों से जुड़ी लंबित शिकायतों को लेकर चल रहा था। इस आंदोलन को लेकर राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर छात्रों की समस्याओं का समाधान करने की मांग की थी, जिसके बाद सरकार हरकत में आई।

शनिवार शाम को आदिवासी विकास मंत्री आशोक उइके ने घोषणा की कि सरकार ने छात्रों की प्रमुख मांगें मान ली हैं और उन्हें लिखित आश्वासन दिया गया। इसके बाद पुणे, नागपुर और नासिक में चल रही भूख हड़ताल समाप्त कर दी गई। हाईकोर्ट ने छात्रों की जान को सर्वोपरि रखते हुए सरकार को स्वास्थ्य सुरक्षा के तात्कालिक कदम उठाने का जो आदेश दिया, वही इस पूरे प्रकरण का केंद्र रहा।

महाराष्ट्र के पुणे जिले के मांजरी इलाके में आदिवासी छात्र अपनी विभिन्न मांगों को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे थे, जो अब सरकार के आश्वासन के बाद स्थगित की गई है।

आदिवासी स्टूडेंट्स की ये परेशानियां

पुणे के मांजरी स्थित सरकारी आदिवासी छात्रावास समेत नागपुर और नासिक में छात्र इसलिए भूख हड़ताल पर बैठे थे क्योंकि राज्य के आश्रम स्कूलों और आदिवासी छात्रावासों में खराब बुनियादी ढांचा, असुरक्षित परिसर, भोजन-स्वच्छता और चिकित्सा व्यवस्था की कमी लंबे समय से अनसुनी रही; गढ़चिरौली के आवासीय स्कूल में सांप काटने से तीन आदिवासी छात्राओं की मौत के बाद गुस्सा फूटा, साथ ही अमरावती में फूड पॉइजनिंग से हुई मौत और ठाणे के शहापुर में दर्जनों बच्चों के बीमार पड़ने जैसी घटनाओं ने सुरक्षा का संकट और गहरा दिया।

छात्रों की मुख्य मांगें थीं: छात्रावास प्रवेश पर लगाई गई उम्र सीमा वाली सरकारी परिपत्रों को रद्द करना, खाली पदों पर नियुक्ति, महंगाई से जुड़ी भत्ते-सुविधाएं, छात्राओं के लिए सुरक्षित केंद्रीय छात्रावास, दुर्घटनाओं पर मुआवजा और बीमा, जाति वैधता प्रमाणपत्रों का समय पर निपटारा तथा सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जनजाति आरक्षण का सही क्रियान्वयन। यानी मुद्दा सिर्फ एक हड़ताल नहीं, बल्कि आदिवासी छात्रों की जान, शिक्षा और सम्मान की बुनियादी सुरक्षा का था।

आंदोलन में भूख हड़ताल पर बैठे 20 साल के छात्र राहुल पवारा की सातवे दिन तबीयत बिगड़ी तो उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
आदिवासी कल्याण मंत्री उससे मिलने पहुंचे, तो राहुल ने उनसे बेबाकी से सवाल किए और उनके सामने ही इस्तीफे की मांग कर दी।
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