
नई दिल्ली- अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाणपत्र रद्द होने के बाद महाराष्ट्र की एक बैचलर ऑफ फार्मेसी (बी.फार्मा) की छात्रा की 6वें और 8वें सेमेस्टर की मार्कशीट और डिग्री रोक दिए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण राहत दी है। कोर्ट ने विश्वविद्यालय को तीन सप्ताह के भीतर उसके दोनों सेमेस्टर के परिणाम घोषित करने और यदि वह पास है तो डिग्री प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया है। हालांकि, अदालत ने साफ कर दिया कि रद्द हो चुके ST प्रमाणपत्र के आधार पर छात्रा भविष्य में न तो उच्च शिक्षा में ST का लाभ ले सकेगी और न ही सरकारी नौकरी में इसका दावा कर सकेगी।
यह आदेश जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने 3 अगस्त को सिंथिया जुलियस चार्ली की ओर से दायर अपीलों पर सुनाया। मामला बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के 27 जून 2022 और 7 फरवरी 2025 के आदेशों से जुड़ा था।
क्या था पूरा मामला?
सिंथिया ने शैक्षणिक वर्ष 2014-15 में महाराष्ट्र के एक कॉलेज में चार वर्षीय बी.फार्मा पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया था। कॉलेज संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय से संबद्ध था। छात्रा को प्रवेश अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणी में दिया गया था और उसके जाति प्रमाणपत्र में उसके 'गोंड' अनुसूचित जनजाति से होने का दावा था।
प्रवेश के समय छात्रा ने ST श्रेणी में दाखिला लिया, लेकिन कॉलेज की ओर से उसे बताया गया कि वह Open Category में प्रवेश के लिए भी पात्र है। इसके बाद उसने ओपन श्रेणी के विद्यार्थियों के अनुरूप फीस जमा की। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, छात्रा ने 2018 में बी.फार्मा की पढ़ाई पूरी कर ली।
लेकिन इसी दौरान उसके ST जाति प्रमाणपत्र को लेकर मामला सामने आया।
31 मई 2017 को जाति जांच समिति ने छात्रा के जाति प्रमाणपत्र को खारिज कर दिया। समिति के अनुसार, छात्रा अपने ST होने के दावे के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज या सामग्री प्रस्तुत नहीं कर सकी।
छात्रा ने इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ में चुनौती दी। लेकिन हाईकोर्ट ने 27 जून 2022 को उसकी याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने माना था कि जाति जांच समिति के आदेश से स्पष्ट है कि छात्रा यह साबित करने के लिए आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकी कि वह 'गोंड’ अनुसूचित जनजाति से संबंधित है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि छात्रा को वैध जाति प्रमाणपत्र पेश करने का अवसर दिया गया था, लेकिन वह ऐसा प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं कर सकी।
हाईकोर्ट ने तकनीकी शिक्षा निदेशालय के नियमों का हवाला देते हुए यह भी माना था कि उसकी ST श्रेणी में हुई प्रवेश प्रक्रिया को Open Category में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।
छात्रा का कहना था कि उसने B.Pharm की पढ़ाई पूरी कर ली थी, लेकिन उसके ST प्रमाणपत्र के रद्द होने के आधार पर विश्वविद्यालय और कॉलेज ने उसके शैक्षणिक दस्तावेज रोक लिए।
इन दस्तावेजों में खास तौर पर छठे और आठवें सेमेस्टर की मार्कशीट तथा डिग्री प्रमाणपत्र शामिल थे। मामले में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम 6 अक्टूबर 2022 को सामने आया। कॉलेज के प्रिंसिपल ने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार को एक अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी किया।
इस NOC में कहा गया कि छात्रा ने 2014-15 से 2018-19 के बीच कॉलेज में पढ़ाई की थी, उसने कॉलेज की सभी आवश्यक फीस और बकाया राशि का भुगतान कर दिया था और उसे Open Category में प्रवेश दिया गया था। प्रिंसिपल ने विश्वविद्यालय से उसके रोके गए मार्कशीट और अन्य शैक्षणिक दस्तावेज जारी करने का अनुरोध किया।
इसके बाद छात्रा ने विश्वविद्यालय को कानूनी नोटिस भेजकर छठे और आठवें सेमेस्टर की मार्कशीट तथा डिग्री प्रमाणपत्र सहित अपने दस्तावेज वापस करने की मांग की।
इसके बाद छात्रा ने 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ में एक और याचिका दायर की। इसे 7 फरवरी 2025 को खारिज कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि छात्रा पहले ही इसी मामले से संबंधित याचिका दायर कर चुकी थी, जिसे 27 जून 2022 को खारिज किया जा चुका था और उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी गई थी। इसलिए वह आदेश अंतिम रूप ले चुका था।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि 6 अक्टूबर 2022 का Principal का NOC अपने आप में नया cause of action पैदा नहीं कर सकता, क्योंकि Principal वह व्यक्ति नहीं था जिसने छात्रा को प्रवेश दिया था।
हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि केवल इसलिए कि छात्रा ने ST श्रेणी में प्रवेश लिया था और बाद में Open Category के अनुरूप फीस का भुगतान किया, उसे राहत का अधिकार नहीं मिल जाता।
इन्हीं दोनों हाईकोर्ट आदेशों के खिलाफ छात्रा सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए पहले अपील दाखिल करने में हुई देरी को माफ किया और पीठ ने छात्रा, विश्वविद्यालय और राज्य सरकार की ओर से पेश वकीलों को सुना तथा रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का परीक्षण किया। सुनवाई के दौरान छात्रा की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि वह मुआवजे की मांग पर जोर नहीं दे रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को रिकॉर्ड पर लिया। इसके बाद पीठ ने दोनों अपीलों को स्वीकार करते हुए अपने पहले के दो फैसलों के अनुरूप मामले का निपटारा किया। कोर्ट ने अजय दत्तात्रेय बंदेवाड बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य और मृदुला बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य में दिए गए अपने पूर्व फैसले का उल्लेख किया किया।
सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय को स्पष्ट निर्देश दिया कि वह छात्रा द्वारा दिए गए छठे और आठवें सेमेस्टर की परीक्षाओं के परिणाम घोषित करे।
कोर्ट ने कहा कि यदि छात्रा इन परीक्षाओं में उत्तीर्ण पाई जाती है तो विश्वविद्यालय उसे डिग्री प्रमाणपत्र जारी करे और विश्वविद्यालय के पास मौजूद उसके सभी मूल शैक्षणिक दस्तावेज उसे वापस करे। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया के लिए तीन सप्ताह की समयसीमा तय की है। यह अवधि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रमाणित प्रति विश्वविद्यालय को प्राप्त होने की तारीख से शुरू होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने छात्रा को शैक्षणिक दस्तावेज जारी करने का निर्देश देते हुए उसके ST दर्जे को मान्यता नहीं दी।
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि छात्रा का ST प्रमाणपत्र सक्षम प्राधिकारी द्वारा पहले ही रद्द किया जा चुका है और उसे भविष्य में इस प्रमाणपत्र के आधार पर किसी प्रकार का लाभ लेने की अनुमति नहीं होगी।
आदेश में कहा गया: “अपीलकर्ता भविष्य की पढ़ाई या सार्वजनिक रोजगार में किसी भी स्थिति में उस प्रमाणपत्र पर कोई निर्भरता नहीं रखेगी, जिसमें उसे अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणी से संबंधित बताया गया है, क्योंकि सक्षम प्राधिकारी द्वारा वह प्रमाणपत्र कानून की दृष्टि से अमान्य घोषित किया जा चुका है।” यानी सुप्रीम कोर्ट ने छात्रा को उसकी पढ़ाई के शैक्षणिक दस्तावेज और योग्य होने पर डिग्री प्राप्त करने की स्वीकृति दी लेकिन उसके रद्द हो चुके ST प्रमाणपत्र को वैध नहीं माना है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में एक और स्पष्ट शर्त लगाई।
कोर्ट ने कहा: “अपीलकर्ता इस आधार पर नया प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए कोई कदम भी नहीं उठाएगी कि वह अनुसूचित जनजाति श्रेणी के व्यक्तियों से संबंधित है।”
इसका अर्थ है कि छात्रा भविष्य में अपने पुराने रद्द किए गए प्रमाणपत्र के आधार पर नया ST प्रमाणपत्र हासिल करने की कोशिश नहीं कर सकती।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट का आदेश दो अलग-अलग पहलुओं को स्पष्ट करता है: एक ओर छात्रा को उसकी पूरी की गई B.Pharm पढ़ाई से जुड़े परीक्षा परिणाम और शैक्षणिक दस्तावेज मिलने चाहिए, वहीं दूसरी ओर रद्द हो चुके ST प्रमाणपत्र के आधार पर उसे भविष्य में आरक्षण या ST श्रेणी से जुड़ा कोई दावा करने की अनुमति नहीं होगी।
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश छात्रा को ST दर्जा देने वाला आदेश नहीं है। अदालत ने उसके जाति प्रमाणपत्र को बहाल नहीं किया है और न ही यह घोषित किया है कि वह ‘Gond’ ST समुदाय से संबंधित है।
बल्कि कोर्ट ने एक सीमित लेकिन महत्वपूर्ण राहत दी है- छात्रा की B.Pharm पढ़ाई से संबंधित छठे और आठवें सेमेस्टर के परिणाम घोषित किए जाएं, पास होने पर डिग्री दी जाए और उसके मूल शैक्षणिक दस्तावेज लौटाए जाएं।
साथ ही कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि इस राहत का इस्तेमाल छात्रा भविष्य में ST आरक्षण या ST श्रेणी के प्रमाणपत्र के आधार पर शिक्षा अथवा सरकारी रोजगार में लाभ लेने के लिए न करे।
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