
बेंगलुरु: सार्वजनिक जीवन में किसी राजनेता द्वारा जाति के आधार पर किसी व्यक्ति को अपमानित करना महज व्यक्तिगत विवाद नहीं माना जा सकता। कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक मामले में कहा है कि जब जातिगत अपमान राजनीतिक शक्ति रखने वाले व्यक्ति की ओर से सार्वजनिक जगह पर किया जाता है, तो उससे होने वाली गरिमा की चोट और गंभीर हो जाती है। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र के सार्वजनिक मंच को जातिगत अपमान के अखाड़े में तब्दील नहीं किया जा सकता।
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने पूर्व कांग्रेस विधायक सिराजुद्दीन उर्फ सिराज शेख की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले से जुड़े आरोपों से राहत मांगी थी। मामला अनुसूचित जाति से आने वाले कांग्रेस विधायक भीमा नाइक और उनके रिश्तेदार मंजुनाथ एसएल के खिलाफ कथित जातिसूचक अपमान से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर आरोपों को देखते हुए मामले को खत्म करना उचित नहीं होगा।
घटना अगस्त 2023 की है। 12 अगस्त 2023 को एक जिला प्रभारी मंत्री के स्वागत के लिए लगाए गए फ्लेक्स बोर्ड पर सिराज शेख की तस्वीर नहीं होने को लेकर उनके और भीमा नाइक के बीच विवाद हुआ था।
इसके कुछ दिनों बाद 15 अगस्त को मंत्री के दौरे के दौरान भी विवाद हुआ। आरोप है कि इसी दौरान सिराज शेख ने भीमा नाइक और उनके भतीजे मंजुनाथ के खिलाफ उनकी जाति को लेकर अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। बाद में एक जूनियर कॉलेज परिसर में आयोजित राजनीतिक बैठक के दौरान भी कथित तौर पर दोनों को जातिसूचक गालियां दी गईं। शिकायतकर्ता मंजूनाथ एस.एल. ने 15 अगस्त 2023 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के आधार पर हगरीबोम्मनहल्ली पुलिस ने शुरू में IPC की कई धाराओं और SC/ST एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था।
जांच के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 504 और SC/ST Act की धारा 3(1)(r) के तहत चार्जशीट दाखिल की। इसके बाद मामला बेंगलुरु की LXXXI Additional City Civil and Sessions Court में Special Case No.2146/2023 के रूप में चला।
आरोपी ने CrPC की धारा 227 के तहत डिस्चार्ज की मांग की। उसका तर्क था कि SC/ST Act की धारा 3(1)(r) के लिए जरूरी कानूनी तत्व इस मामले में मौजूद नहीं हैं और शिकायतकर्ता स्वयं कथित मुख्य पीड़ित नहीं था। आरोपी की ओर से यह भी कहा गया कि जिस व्यक्ति के खिलाफ जातिसूचक अपमान किए जाने का आरोप है, वह कथित घटना के समय वहां मौजूद नहीं था। ट्रायल कोर्ट ने 3 अगस्त 2024 को डिस्चार्ज आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद आरोपी हाई कोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर विशेष जोर दिया कि जातिगत अपमान को केवल दो व्यक्तियों के बीच का व्यक्तिगत विवाद मानकर नहीं देखा जा सकता, खासकर तब जब ऐसा व्यवहार सार्वजनिक और राजनीतिक मंच पर किया गया हो।
कोर्ट ने इसे केवल किसी व्यक्ति का अपमान नहीं माना, बल्कि कहा कि ऐसा आचरण समान नागरिकता के संवैधानिक वादे पर हमला है और उन सामाजिक पदानुक्रमों को शब्दों के जरिए फिर से स्थापित करने का प्रयास है जिन्हें संविधान ने खत्म करने की कोशिश की है।
अदालत ने कहा कि संविधान ने अस्पृश्यता को समाप्त किया है और समानता, गरिमा तथा बंधुत्व का वादा किया है। इसके बावजूद जाति का जहर उन लोगों के आचरण में भी दिखाई देता है जो राजनीतिक सत्ता या प्रभाव की स्थिति में हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि जब ऐसा आचरण कानून में निर्धारित आवश्यक तत्वों को पूरा करता है तो उससे मजबूती से निपटा जाना चाहिए, क्योंकि गरिमा शक्तिशाली व्यक्ति की ओर से किसी वंचित व्यक्ति को दी जाने वाली रियायत नहीं है।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्वर्ण सिंह बनाम राज्य फैसले का भी उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST Act की पुरानी धारा 3(1)(x) की व्याख्या करते हुए “public place” और “place within public view” के बीच अंतर स्पष्ट किया था।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने इसी सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि अपराध के लिए यह जरूरी नहीं कि घटना सरकारी या सार्वजनिक स्वामित्व वाली जगह पर ही हुई हो। सवाल यह है कि कथित अपमान सार्वजनिक दृष्टि में हुआ या नहीं।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में कहा कि कोई निजी स्थान भी “public view” में हो सकता है, यदि वहां मौजूद लोगों के अलावा अन्य लोग भी उस कृत्य को देख या सुन सकते हों।
इस मामले में हाई कोर्ट ने पाया कि कथित घटनाएं राजनीतिक गतिविधियों और सार्वजनिक जमावड़े से जुड़े स्थानों पर हुई थीं और वहां अन्य लोग मौजूद थे।
अदालत ने माना कि SC/ST Act की धारा 3(1)(r) में केवल अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल पर्याप्त नहीं है। यह भी प्रथम दृष्टया सामने आना चाहिए कि अपमान जानबूझकर किया गया और SC/ST सदस्य को उसकी जाति के कारण अपमानित करने का इरादा था।
लेकिन डिस्चार्ज के चरण में इस इरादे का अंतिम निर्धारण नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा: “डिस्चार्ज के चरण पर, इरादे का विश्लेषण आम तौर पर उतनी बारीकी से नहीं किया जा सकता, जितनी पूरी तरह से ट्रायल होने के बाद उम्मीद की जाती है।” कोर्ट ने दो परिस्थितियों को महत्वपूर्ण माना: पहली, आरोपी को कथित पीड़ितों की अनुसूचित जाति से संबंधित होने की जानकारी होने का आरोप; और दूसरी, ऐसी जानकारी के बावजूद सार्वजनिक रूप से कथित अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किए जाने का आरोप।
इन दोनों परिस्थितियों को जांच के दौरान एकत्र सामग्री के साथ पढ़ते हुए कोर्ट ने माना कि आरोपी के खिलाफ ट्रायल चलाने के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री है।
आरोपी पर IPC की धारा 504 के तहत भी मामला है। यह धारा जानबूझकर अपमान करने और ऐसी स्थिति पैदा करने से संबंधित है जिससे सामने वाला व्यक्ति सार्वजनिक शांति भंग करने या कोई अन्य अपराध करने के लिए उकस सकता है।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Mohd Wajid v. State of Uttar Pradesh फैसले का उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि महज गाली देना हर मामले में धारा 504 के तहत अपराध नहीं बन जाता। यह देखना जरूरी है कि इस्तेमाल किए गए शब्दों और परिस्थितियों में ऐसा तत्व था या नहीं जिससे शांति भंग होने की संभावना पैदा हो।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में कथित गालियों में जाति के साथ-साथ परिवार की महिलाओं की गरिमा और चरित्र को लेकर भी कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों का आरोप है। इसलिए इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि धारा 504 के लिए प्रथम दृष्टया कोई सामग्री मौजूद नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे आरोपों का प्रभाव और उनका उद्देश्य ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर तय किया जाएगा।
आरोपी ने हाई कोर्ट से CrPC की धारा 482 के तहत आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। इस पर कोर्ट ने कहा कि इस अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए हाई कोर्ट खुद ट्रायल कोर्ट नहीं बन सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया: “Cr.P.C. की धारा 482 के तहत अधिकार का इस्तेमाल करते हुए, यह कोर्ट खुद को ट्रायल कोर्ट में नहीं बदल सकता, गवाहों की तुलना नहीं कर सकता, सबूतों की बारीकी से जांच-पड़ताल नहीं कर सकता, या उनके अंतिम सबूत-मूल्य पर कोई फैसला नहीं सुना सकता।” यानी हाई कोर्ट गवाहों के बयानों को आपस में तौलकर, सबूतों को एक-एक करके परखकर और उनकी अंतिम विश्वसनीयता तय करके इस चरण में मुकदमे को खत्म नहीं कर सकता।
अदालत ने कहा कि जहां बचाव पक्ष के तर्कों के लिए प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की विस्तृत जांच की आवश्यकता है, वहां उचित मंच ट्रायल है, न कि मुकदमे की शुरुआत से पहले ही उसे समाप्त कर देना।
आरोपी की ओर से सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के उन फैसलों का भी हवाला दिया गया जिनमें SC/ST Act के दुरुपयोग के खिलाफ सावधानी बरतने की बात कही गई है। हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे सिद्धांतों से कोई विवाद नहीं है, लेकिन किसी फैसले को उसके तथ्यात्मक संदर्भ से अलग करके हर मामले में डिस्चार्ज का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की: कोई फ़ैसला ऐसा मंत्र नहीं है जिसे बिना सोचे-समझे दोहराया जाए; यह उन तथ्यों से अलग नहीं हो सकता जिनकी वजह से वह फ़ैसला लिया गया था।
अंततः कर्नाटक हाई कोर्ट ने आरोपी सिराजुद्दीन उर्फ सिराज शेख की याचिका में कोई मेरिट नहीं पाया और उसे खारिज कर दिया।
अदालत ने ट्रायल कोर्ट के 3 अगस्त 2024 के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसके तहत आरोपी की CrPC की धारा 227 के तहत डिस्चार्ज अर्जी खारिज की गई थी। आरोपी को फिलहाल मुकदमे का सामना करना होगा। हाई कोर्ट ने यह फैसला नहीं दिया कि आरोपी ने वास्तव में अपराध किया है या नहीं। अदालत ने केवल यह तय किया है कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर इस स्तर पर उसे डिस्चार्ज या आपराधिक कार्यवाही से मुक्त करना उचित नहीं है।
कथित जातिसूचक शब्द वास्तव में कहे गए थे या नहीं, उनका संदर्भ क्या था, आरोपी की मंशा क्या थी, गवाहों की गवाही कितनी विश्वसनीय है और वीडियो रिकॉर्डिंग अभियोजन के आरोपों को किस हद तक साबित करती है, इन सभी सवालों का अंतिम फैसला ट्रायल में साक्ष्यों के आधार पर होगा।
इस फैसले में हाईकोर्ट ने जातिगत अपमान को संवैधानिक गरिमा और समानता के व्यापक संदर्भ में देखा है। खासकर राजनीतिक पद पर बैठे व्यक्ति के मामले में सार्वजनिक मंच से जातिसूचक भाषा के इस्तेमाल का असर केवल कथित पीड़ित तक सीमित नहीं रहता।
अदालत ने साफ किया कि संविधान द्वारा समानता और गरिमा की गारंटी दिए जाने के बावजूद सार्वजनिक जीवन में जातिगत अपमान को सामान्य राजनीतिक विवाद या व्यक्तिगत कटुता कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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