
लखनऊ: उत्तर प्रदेश के चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों - अंबेडकर नगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर में स्पेशल कंपोनेंट प्लान के अंतर्गत अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति विद्यार्थियों के लिए 70% विशेष सीट व्यवस्था को लेकर संकट NEET-UG 2026 काउन्सलिंग से ठीक पहले फिर गहरा गया है। इन चारों कॉलेजों में 100-100 MBBS सीटें हैं जिसमें कुल 70 सीटें SC/ST विद्यार्थियों के लिए, 15 OBC और 15 सामान्य वर्ग के लिए रखी जाती रही हैं।
इस व्यवस्था को 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एकल पीठ के फैसले ने चुनौती दी थी, जिसके बाद मामला न्यायिक प्रक्रिया में आगे बढ़ा और अब छात्रों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित रहते हुए यदि 2026 की काउन्सलिंग सामान्य उत्तर प्रदेश आरक्षण नियमों के आधार पर कर दी गई, तो SC/ST विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध सीटों में भारी कमी हो सकती है।
द मूकनायक ने कन्नौज मेडिकल कॉलेजों के फाइनल ईयर एमबीबीएस के छात्र अरुण सोनकर से बात की। सोनकर के अनुसार चारों कॉलेजों के SC/ST विद्यार्थी इस आशंका को लेकर परेशान हैं कि इस बार सीट मेट्रिक्स यूपी सरकार के आरक्षण नियमों के आधार पर जारी की जा सकती है। उनका कहना है कि सामान्य तौर पर काउन्सलिंग से करीब 10–15 दिन पहले सीट मेट्रिक्स सामने आ जाती है, लेकिन इस बार काउन्सलिंग शुरू होने की तारीख आने के बावजूद संबंधित चार कॉलेजों की आरक्षण व्यवस्था को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
छात्रों के मुताबिक 13 अगस्त काउन्सलिंग शुरू होने की स्थिति में, यदि नई सीट मेट्रिक्स जारी कर दी गई और उसमें उत्तर प्रदेश के सामान्य आरक्षण नियम लागू कर दिए गए, तो उनके पास अपनी स्थिति स्पष्ट कराने के लिए बहुत कम समय बचेगा। छात्रों ने 9 अगस्त को लखनऊ के ईको गार्डन में प्रदर्शन भी किया था और मांग की थी कि काउन्सलिंग से पहले सरकार चारों कॉलेजों की विशेष स्थिति स्पष्ट करे और सुप्रीम कोर्ट में लंबित विवाद के अंतिम निर्णय तक पुरानी सीट व्यवस्था को बरकरार रखा जाए।
अंबेडकर नगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर मेडिकल कॉलेजों की स्थापना के लिए Special Component Plan से फंड्स प्राप्त हुए थे और 70% सीटें SC/ST शेष OBC और सामान्य वर्ग की व्यवस्था की गई थी।
इन कॉलेजों की 100 MBBS सीटों की मूल व्यवस्था को समझना इस पूरे विवाद का सार है। श्रेणी वार आवंटन के अनुसार प्रत्येक 100 सीटों में 64 SC, 6 ST, 15 OBC और 15 अनारक्षित सीटें थीं। यानी SC और ST को मिलाकर कुल 70 सीटें। इन 100 सीटों में से 15% यानी 15 सीटें All India/Central Quota में जाती हैं। इन 15 सीटों का केंद्रीय आरक्षण इस तरह है: SC के लिए 2 सीटें, ST के लिए 1, OBC के लिए 4 और अनारक्षित के लिए 8 सीटें।
उत्तर प्रदेश शैक्षिक संस्था (अवरोध, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम, 2006 उत्तर प्रदेश के शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए आरक्षण का प्रावधान करता है। इसके तहत एससी के लिए 21%, एसटी के लिए 2%, और ओबीसी के लिए 27% आरक्षण तय किया गया है। 25 अगस्त 2025 के अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी वैधानिक फ्रेमवर्क को आधार बनाया था।
यानी यदि चारों कॉलेजों की विशेष 70% व्यवस्था हटाकर सामान्य UP आरक्षण नियम लागू किया जाता है, तो SC/ST के लिए उपलब्ध सीटों का अनुपात मौजूदा 70% से बहुत नीचे आ जाएगा। स्टूडेंट्स कहते हैं चारों कॉलेजों में कुल 400 MBBS सीटें हैं और मौजूदा विशेष व्यवस्था में इनमें 280 SC/ST सीट्स बनती हैं। यदि सामान्य आरक्षण व्यवस्था लागू होती है तो यह संख्या काफी घटेगी, लेकिन वास्तविक श्रेणी वार बदलाव 2026 सीट मेट्रिक्स से ही निश्चित होगा।
उत्तर प्रदेश में विशेष घटक योजना (Special Component Plan - SCP) के तहत बनाए गए जालौन, सहारनपुर, अंबेडकर नगर और कन्नौज- इन चारों राजकीय मेडिकल कॉलेजों में अनुसूचित जाति (SC) के छात्रों के लिए मिलने वाले 70% विशेष आरक्षण को हाईकोर्ट द्वारा समाप्त किए जाने के बाद से यह मामला राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा और विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बना हुआ है।
इन मेडिकल कॉलेजों का निर्माण मुख्य रूप से विशेष घटक योजना और टीएसपी (अनुसूचित जाति/जनजाति फंड) के वित्तीय सहयोग से हुआ था, जिसके तहत यहाँ एससी/एसटी वर्ग के विद्यार्थियों के वास्ते प्रवेश में 70% का विशेष प्रावधान रखा गया था। इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल आरक्षण प्रतिशत नहीं बल्कि इन मेडिकल कॉलेजों की स्थापना का उद्देश्य और फंडिंग स्ट्रक्चर है।
ये चारों संस्थान 2006 और 2011 के बीच अलग-अलग समय पर स्थापित किए गए थे अंबेडकर नगर और जालौन मेडिकल कॉलेज क्रमशः 10 नवंबर, 2006 और 29 जनवरी, 2008 को स्थापित किए गए थे, जबकि कन्नौज मेडिकल कॉलेज 20 जनवरी, 2010 को और सहारनपुर कॉलेज 21 फरवरी, 2011 को अस्तित्व में आया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट में हुई कार्यवाही के दौरान राज्य सरकार ने खुद इन मेडिकल कॉलेजों की स्थापना के लिए SCP फंडिंग की जानकारी दी। SC/ST के लिए 70% आरक्षण की व्यवस्था का बचाव करते हुए सरकार ने इन संस्थानों की खास प्रकृति का हवाला दिया।
प्लानिंग कमीशन की गाइडलाइंस में SCP/TSP से जुड़ी व्यवस्थाओं के तहत स्थापित संस्थानों में SC/ST लाभार्थियों के लिए खास तौर पर खर्च और सुविधाओं का प्रावधान है जिसके तहत इन चारों कॉलेजों में 70% खर्च SCP/TSP फंड से और 30% खर्च जनरल प्लान से किया गया है।
इसलिए छात्रों का तर्क है कि अगर इन संस्थानों को किसी खास सामाजिक मकसद के लिए खास फंड से बनाया गया था, तो अब इनके एडमिशन स्ट्रक्चर को आम सरकारी मेडिकल कॉलेजों जैसा ही नहीं माना जाना चाहिए।
'द मूकनायक' से बात करते हुए अरुण सोनकर ने कहा कि ये चार कॉलेज आम सरकारी मेडिकल कॉलेजों की तरह नहीं बनाए गए थे। उन्होंने कहा, “ये कॉलेज एक खास मकसद के लिए, एक खास योजना के तहत बनाए गए थे। अगर आप अचानक इनके एडमिशन प्रोसेस को आम मेडिकल कॉलेजों जैसा बना देते हैं, तो असल में आप उस मकसद को ही खत्म कर रहे हैं।”
सोनकर ने कहा कि छात्रों की मांग अब सिर्फ़ 70% वाले इंतज़ाम को बचाने के लिए एक और सरकारी आदेश पाने तक सीमित नहीं है। वे चाहते हैं कि राज्य सरकार कानून बनाकर इसे कानूनी सुरक्षा दे। उनके मुताबिक, सरकारी आदेशों को बाद की सरकारें या प्रशासनिक फ़ैसले बदल सकते हैं। लेकिन, विधानसभा से पास हुआ कानून इन चार संस्थानों के खास दर्जे को ज़्यादा मज़बूत कानूनी सुरक्षा देगा।
मुख्यमंत्री को सौंपे गए छात्रों के ज्ञापन में भी उत्तर प्रदेश आरक्षण अधिनियम या दूसरे ज़रूरी कानूनी प्रावधानों में बदलाव की मांग की गई है, ताकि इन चार कॉलेजों के खास दर्जे को खास तौर पर सुरक्षित किया जा सके।
सोनकर ने लखनऊ की बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी (BBAU) का भी उदाहरण दिया, जहाँ आरक्षण को कानूनी सुरक्षा मिली हुई है। BBAU अपने सभी टीचिंग और रिसर्च प्रोग्राम में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण देती है। यह पॉलिसी यूनिवर्सिटी के एकेडमिक ऑर्डिनेंस के चैप्टर VII, क्लॉज़ 9 के तहत तय की गई है और हाशिए पर मौजूद समुदायों को आगे बढ़ाने के उसके शुरुआती कानूनी मकसद के अनुरूप है। जहाँ आम केंद्रीय यूनिवर्सिटीज़ 22.5 प्रतिशत कोटा (SC के लिए 15% और ST के लिए 7.5%) का पालन करती हैं, वहीं BBAU का कानूनी ढांचा सामाजिक न्याय के अपने खास मकसद को पूरा करने के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की इजाज़त देता है।
छात्र चारों मेडिकल कॉलेजों के लिए भी ऐसा ही कानूनी सिस्टम चाहते हैं ताकि उनका आरक्षण ढांचा हर साल प्रशासनिक मर्जी का मामला न बने।
इसलिए उनकी मांग है कि अंबेडकर नगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर मेडिकल कॉलेजों के खास एडमिशन ढांचे की सुरक्षा के लिए कोई कानून या खास कानूनी प्रावधान बनाया जाए।
छात्रों द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में राज्य सरकार से खास तौर पर कहा गया है कि वह उत्तर प्रदेश आरक्षण कानून या अन्य ज़रूरी कानूनी प्रावधानों में बदलाव करने पर विचार करे, ताकि इन चारों कॉलेजों का खास दर्जा और एडमिशन की व्यवस्था बनी रहे।
मौजूदा विवाद की जड़ें सबरा अहमद मामले से जुड़ी हैं, जो इन चार मेडिकल कॉलेजों के लिए NEET काउंसलिंग और सीट मैट्रिक्स से संबंधित था। 25 अगस्त, 2025 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विशेष आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की। उस समय, प्रत्येक कॉलेज की 85 स्टेट कोटा सीटों को इस प्रकार दिखाया गया था: 62 SC, 5 ST, 11 OBC और 7 अनारक्षित। चारों कॉलेजों को मिलाकर, यह कुल 340 स्टेट कोटा सीटें थीं, जिनमें 248 SC, 20 ST, 44 OBC और 28 अनारक्षित सीटें शामिल थीं।
इस चुनौती का आधार यह तर्क था कि इन कॉलेजों में आरक्षण उत्तर प्रदेश आरक्षण अधिनियम, 2006 के तहत निर्धारित सीमाओं से अधिक था। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने संस्थानों की विशेष प्रकृति, उनकी SCP फंडिंग और SC/ST के लिए 70% सीटों का प्रावधान करने वाले सरकारी आदेशों का हवाला देते हुए इस व्यवस्था का बचाव किया।
अंततः एकल न्यायाधीश ने माना कि SCP दिशानिर्देश स्वयं राज्य के आरक्षण कानून के विपरीत प्रवेश आरक्षण के लिए कानूनी आधार प्रदान नहीं कर सकते। अदालत ने SC के लिए 21%, ST के लिए 2% और OBC के लिए 27% के वैधानिक प्रतिशत का उल्लेख किया।
इसलिए, अदालत ने उन सरकारी आदेशों को रद्द कर दिया जिनमें वैधानिक ढांचे से परे आरक्षण का प्रावधान था और निर्देश दिया कि प्रवेश प्रक्रिया लागू कानून के अनुरूप होनी चाहिए। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है, जो इस बात पर विचार करेगा कि क्या स्पेशल कंपोनेंट प्लान (SCP) के तहत स्थापित कॉलेज आरक्षण पर 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा से बंधे हैं।
सोनकर ने 'द मूकनायक' को बताया कि राज्य सरकार ने अभी तक इस मामले में अपना हलफनामा दाखिल नहीं किया है, जिसके कारण सुनवाई में बार-बार देरी हो रही है। हालाँकि, छात्रों के लिए इस देरी का सीधा असर पड़ रहा है। उनका तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट को उस मूल कानूनी सवाल पर निर्णय लेना चाहिए, इससे पहले कि नई काउंसलिंग प्रक्रिया इन कॉलेजों में छात्रों के समूह की संरचना को बदल दे।
सोनकर कहते हैं कि छात्रों को खास तौर पर यह चिंता है कि अगर नई सीट मैट्रिक्स के तहत काउंसलिंग होती है, तो उस मैट्रिक्स के तहत एडमिशन पाने वाले छात्र खुद बाद में होने वाले कानूनी विवाद में प्रभावित पक्ष बन सकते हैं। उनका तर्क है कि एक बार एडमिशन पूरे हो जाने के बाद, सीट स्ट्रक्चर में फिर से बदलाव करने से उन छात्रों पर असर पड़ सकता है जिन्हें पहले ही एडमिशन मिल चुका है। इससे कानूनी और प्रशासनिक उलझनें और बढ़ सकती हैं।
इसलिए, विरोध कर रहे छात्रों की मांग सिर्फ़ आरक्षण का प्रतिशत बहाल करने या बनाए रखने की नहीं है। वे चाहते हैं कि एडमिशन का नया दौर शुरू होने और उससे जुड़े नए दावे सामने आने से पहले ही इस कानूनी मसले को सुलझा लिया जाए।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को दिए गए अपने ज्ञापन में छात्रों ने सरकार से अंबेडकर नगर, सहारनपुर, कन्नौज और जालौन में SC/ST छात्रों के लिए मौजूदा सीट व्यवस्था को बनाए रखने की मांग की है। उन्होंने SC/ST छात्रों के लिए लगभग 180–200 MBBS सीटों के नुकसान की आशंका भी जताई है और मांग की है कि ऐसी कटौती को रोका जाए।
उन्होंने खास तौर पर मांग की है कि NEET-UG काउंसलिंग में ऐसी सीट मैट्रिक्स ना लाई जाए जिससे मौजूदा SC/ST कोटा कम हो जाए, और जब तक सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक मौजूदा व्यवस्था को ही बनाए रखा जाए।
इसके अलावा, छात्रों ने इन चार कॉलेजों के विशेष दर्जे के लिए कानूनी सुरक्षा, ज़रूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट के सामने सही प्रतिनिधित्व, और SCP/TSP फंड से बने संस्थानों के लिए एक अलग नीति की मांग की है। छात्रों ने उत्तर प्रदेश के समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण सहित जन-प्रतिनिधियों और अधिकारियों के सामने अपनी मांगें रखी हैं। हालांकि छात्रों को भरोसा दिलाया गया है, लेकिन सोनकर का कहना है कि 70% वाली व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.
‘द मूकनायक’ जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है. अगर आप भी चाहते हैं कि ‘द मूकनायक’ हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहे तो सपोर्ट करें.
यहां सपोर्ट करें