केवल पांचवी तक पढ़े लेकिन ज्ञान के बल पर बने केरल कृषि विवि के 'प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस': आदिवासी किसान पद्मश्री चेरुवायल रामन का निधन

देसी बीजों के संरक्षण में बीता पूरा जीवन, 50 से अधिक दुर्लभ धान किस्मों को बचाया
रामन अपनी सीमित ज़मीन पर जैविक तरीकों और पारंपरिक बीज भंडारण तकनीकों का उपयोग करते थे। वे आदिवासी किसान परिवारों को बीज मुफ़्त देते थे, बस यह अपेक्षा रखते थे कि अगली फसल का एक हिस्सा बीज के रूप में लौटा दिया जाए।
रामन अपनी सीमित ज़मीन पर जैविक तरीकों और पारंपरिक बीज भंडारण तकनीकों का उपयोग करते थे। वे आदिवासी किसान परिवारों को बीज मुफ़्त देते थे, बस यह अपेक्षा रखते थे कि अगली फसल का एक हिस्सा बीज के रूप में लौटा दिया जाए।
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वायनाड - पद्मश्री से सम्मानित और 'नेल्लाचन' (धान के पिता) नाम से विख्यात कुरिचिया आदिवासी किसान चेरुवायल के. रामन का बुधवार को कोझिकोड के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में इलाज के दौरान निधन हो गया। वे 74 वर्ष के थे। रामन को लोग प्यार से 'रामेट्टन' पुकारते थे।

वायनाड जिले के मनंतवाडी के निकट कम्मना गाँव के निवासी रमन ने अपना पूरा जीवन केरल के उन देसी धान किस्मों को बचाने में लगा दिया, जो राज्य के कृषि परिदृश्य से तेज़ी से लुप्त हो रही थीं। उन्होंने कृषि विज्ञान या वनस्पति विज्ञान का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया था और केवल कक्षा 5 तक पढ़े थे, फिर भी वे पारंपरिक ज्ञान के जीवित भंडार बन गए। अपने तीन एकड़ के छोटे से खेत में उन्होंने 50 से अधिक दुर्लभ धान किस्मों को सहेजा।

1952 में कुरिचिया अनुसूचित जनजाति समुदाय में जन्मे रमन ने बचपन से ही खेतों में काम करना शुरू कर दिया था। बाद में उन्होंने परिवार के खेत की बागडोर संभाली और व्यवस्थित ढंग से पारंपरिक बीजों का संग्रह और खेती शुरू की। उस समय कई किसान इन बीजों को छोड़कर अधिक उपज देने वाली व्यावसायिक किस्मों या नकदी फसलों की ओर जा रहे थे।

रामन ने अपनी सीमित ज़मीन को छोटे-छोटे प्लॉटों में बाँटा, ताकि हर मौसम में हर किस्म की खेती हो सके। वे पूरी तरह जैविक तरीकों और पारंपरिक बीज भंडारण तकनीकों का उपयोग करते थे। वे दूसरे किसानों, खासकर आदिवासी परिवारों को बीज मुफ़्त देते थे, बस यह अपेक्षा रखते थे कि अगली फसल का एक हिस्सा बीज के रूप में लौटा दिया जाए।

उनका खेत पश्चिमी घाट की विभिन्न मिट्टियों, जल स्थितियों और जलवायु के अनुकूल किस्मों की एक जीवित जीन बैंक की तरह काम करता था। धान के अलावा उन्होंने पारंपरिक सब्ज़ियों, औषधीय पौधों, जड़ी-बूटियों, मसालों और वृक्षों का भी संरक्षण किया। छोटे किसानों की आम आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद वे दशकों तक इस कार्य में जुटे रहे और केरल की कृषि जैव-विविधता व विरासत के संरक्षक के रूप में पहचाने गए।

अपने जीवनकाल में रामन को कई सम्मान और उपलब्धियाँ हासिल हुईं।

2011: हैदराबाद में आयोजित अंतरराष्ट्रीय जैव-विविधता सम्मेलन में केरल के किसान समुदाय का प्रतिनिधित्व किया, जिसमें 11 देशों के प्रतिभागी शामिल थे।

2016: पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण (PPVFRA) द्वारा स्थापित 'राष्ट्रीय पादप जीनोम संरक्षक पुरस्कार' मिला।

जनवरी 2023: कृषि क्षेत्र में योगदान के लिए भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया।

2025 में केरल कृषि विश्वविद्यालय ने उन्हें 'प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस' नियुक्त किया।

2026: कृषि क्षेत्र में योगदान के लिए पहला 'ओमन चांडी स्मारक कृषि पुरस्कार' प्राप्त हुआ।

नेता प्रतिपक्ष पिनराई विजयन ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि रामन "केरल की पारंपरिक कृषि विरासत और जैव-विविधता संरक्षण के जीवित प्रतीक" थे। उन्होंने कहा कि रामन ने बिना किसी व्यक्तिगत लाभ की इच्छा के पारंपरिक धान की खेती को बचाने में अपना जीवन समर्पित किया, इस विरासत को युवा पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए अथक प्रयास किए और अंतरराष्ट्रीय पहचान भी हासिल की। विजयन ने कहा कि देश ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था, और उन्होंने रमन के परिवार व प्रियजनों के दुख में सहभागिता व्यक्त की।

मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन, कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा सहित अन्य नेताओं ने भी शोक व्यक्त किया और आदिवासी कृषि ज्ञान को जीवित रखने में रामन की भूमिका को रेखांकित किया।

रामन अपने पीछे पत्नी और बच्चों को छोड़ गए हैं। उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ चेरुवायल कुरिचिया समुदाय के श्मशान घाट पर किया गया।

रामन अपनी सीमित ज़मीन पर जैविक तरीकों और पारंपरिक बीज भंडारण तकनीकों का उपयोग करते थे। वे आदिवासी किसान परिवारों को बीज मुफ़्त देते थे, बस यह अपेक्षा रखते थे कि अगली फसल का एक हिस्सा बीज के रूप में लौटा दिया जाए।
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रामन अपनी सीमित ज़मीन पर जैविक तरीकों और पारंपरिक बीज भंडारण तकनीकों का उपयोग करते थे। वे आदिवासी किसान परिवारों को बीज मुफ़्त देते थे, बस यह अपेक्षा रखते थे कि अगली फसल का एक हिस्सा बीज के रूप में लौटा दिया जाए।
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रामन अपनी सीमित ज़मीन पर जैविक तरीकों और पारंपरिक बीज भंडारण तकनीकों का उपयोग करते थे। वे आदिवासी किसान परिवारों को बीज मुफ़्त देते थे, बस यह अपेक्षा रखते थे कि अगली फसल का एक हिस्सा बीज के रूप में लौटा दिया जाए।
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रामन अपनी सीमित ज़मीन पर जैविक तरीकों और पारंपरिक बीज भंडारण तकनीकों का उपयोग करते थे। वे आदिवासी किसान परिवारों को बीज मुफ़्त देते थे, बस यह अपेक्षा रखते थे कि अगली फसल का एक हिस्सा बीज के रूप में लौटा दिया जाए।
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