सूखते खेत, बिखरते परिवार: बदलती जलवायु ने पन्ना के आदिवासी परिवारों की आजीविका कैसे बदली | TM Ground Report

जहां कभी खेती और जंगल पर निर्भर आदिवासी परिवार अपनी आजीविका स्वयं चलाते थे, वहीं आज बदलते मानसनू , बढ़ते तापमान, भूजल संकट और खेती में बढ़ते जोखिम के बीच मजदूरी और पलायन की ओर बढ़ रहे हैं।
बदलती जलवायु लगातार सूखे की स्थिति, घटते जलस्रोत और खेती के बढ़ते संकट ने कई परिवारों को खेती से मजदूरी की ओर धकेल दिया है।
बदलती जलवायु लगातार सूखे की स्थिति, घटते जलस्रोत और खेती के बढ़ते संकट ने कई परिवारों को खेती से मजदूरी की ओर धकेल दिया है।प्रज्ञा शर्मा/द मूकनायक
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— ✍️प्रज्ञा शर्मा

"इस साल 25 बोरा गल्ला निकला है। हर साल पैदावार कम होती जा रही है।" पन्ना जिलेके रानीपुर गांव के किसान बसंत लाल आदिवासी अपनी लगभग ढाई एकड़ जमीन की बात करतेहुए यह कहते हैं। बातचीत के दौरान वेपिछलेबीस वर्षों में गांव में आए बदलाव को याद करतेहैं। "बीस साल पहले यहां आसपास तीन गुना ज्यादा जंगल था। तेंदू अचार और आंवला के पेड़ थे। ज्यादातर लोग जंगल और खेती पर निर्भर थे। तब गांव के सिर्फ तीन-चार प्रतिशत लोग ही पलायन करते थे। आज लगभग 65 प्रतिशत लोग मजदूरी के लिए बाहर जा रहे हैं।"

बसंत लाल एक और बदलाव की ओर इशारा करते हैं। "बारिश अच्छी हो रही है, लेकिन पानी का स्तर फिर भी लगभग पांच फीट नीचे चला गया है।" उनकी यह बात केवल उनके खेत की नहीं, बल्कि पन्ना के कई गांवों में सामने आ रहे उस बदलाव की ओर भी इशारा करती है, जहां खेती से जीवन चलाना लगातार कठिन होता जा रहा है और किसान धीरे-धीरे मजदूरी की ओर बढ़ रहेहैं।

पन्ना के रानीपुर और कल्याणपुर गांवों की यह कहानी केवल पानी की कमी या सूखे की नहीं है। यह पिछले दो दशकों में धीरे-धीरे बदलती एक ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक परिवेश की कहानी है। जहां कभी खेती और जंगल पर निर्भर आदिवासी परिवार अपनी आजीविका स्वयं चलाते थे, वहीं आज बदलते मानसनू , बढ़ते तापमान, भूजल संकट और खेती में बढ़ते जोखिम के बीच मजदूरी और पलायन की ओर बढ़ रहे हैं।

पलायन का बोझ केवल एक व्यक्ति नहीं, पूरे परिवार को उठाना पड़ता है

कल्याणपुर गांव की 27 वर्षीय संगीता आदिवासी की कहानी पन्ना के सूखाग्रस्त गांवों में रहने वाले अनेक परिवारों, खासकर आदिवासी परिवारों की बदलती जिंदगी की तस्वीर पेश करती है। बदलती जलवायु लगातार सूखे की स्थिति, घटते जलस्रोत और खेती के बढ़ते संकट ने ऐसे कई परिवारों को खेती से मजदूरी की ओर धकेल दिया है। इसका असर केवल आजीविका तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे परिवार की सामाजिक और पारिवारिक संरचना पर भी दिखाई देता है।

करीब आठ वर्ष पहलेसंगीता की शादी गांव के ही लखन आदिवासी सेहुई थी। शादी के शुरुवाती वर्षों में डेढ़ एकड़ जमीन से किसी तरह घर का गुजारा चल जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों मेंखेती से पर्याप्त आमदनी न होनेके कारण उनके पति गुजरात की एक फैक्ट्री में मजदूरी करने लगे। अब वे साल में केवल दो या तीन बार ही घर लौट पाते हैं। बातचीत के दौरान संगीता आठ महीनेकी गर्भवती थीं। उन्होंने बताया कि पिछले दो वर्षों सेवे भी अपनी डेढ़ साल की बेटी को साथ लेकर पति के साथ मजदूरी करने गुजरात जाती रही हैं। यह उनकी इच्छा नहीं, बल्कि मजबूरी है। घर में तीन छोटे बच्चे हैं। दो बड़ी बेटियां, एक लगभग छह वर्ष और दूसरी तीन वर्ष की गांव मेंअपनी दादी के साथ रहती हैं। संगीता कहती हैं कि छोटी बच्ची को साथ ले जाना पड़ता है, जबकि दोनों बड़ी बेटियों की जिम्मेदारी उनकी सास उठाती हैं।

संगीता की सास हरिनबाई बताती हैं कि उनके दोनों बेटे मजदूरी के लिए बाहर रहते हैं। बहु भी कई बार साथ चली जाती हैं। ऐसे में घर, बच्चों और खेत की जिम्मेदारी उन्हीं पर आ जाती है। वे कहती हैं, "रात में पानी भरने उठ जाते हैं। पियत को पानी नहीं रहत। खेत पीछे खाली पड़े हैं। अब तो बस देखने भर के रह गए हैं।" जब उनसे पूछा गया कि इतनी इतनी उम्र में घर का सारा काम, पानी भरना, खेती, बच्चों की देखभाल अकेले कैसे कर लेती हैं, तो उन्होंने छह साल की अपनी पोती की ओर इशारा करते हुए कहा, "यही मदद कर देती है।" उस क्षण लगा कि इस परिवार मेंबचपन भी जिम्मेदारियों के बोझ तले बड़ा हो रहा है। घर के भीतर नजर डालने पर भी यह संकट साफ दिखाई देता है। वहां केवल उतना ही सामान है, जितना रोजमर्रा की जरूरतों के लिए आवश्यक है। भविष्य के लिए कुछ बचा लेनेकी कोई गंुजाइश नहीं दिखती। घर के पीछेएक टूटा-फूटा शौचालय है, जिसकी छत नहीं हैऔर जिसके भीतर झाड़ियां उग आई हैं। यह दृश्य केवल आर्थिक अभाव का नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन में बनिुयादी सविुधाओं की स्थिति का भी प्रमाण है।

छोटे बच्चे माता-पिता के साथ अपना बचपन बिताने के बजाय त्योहारों पर उनके लौटने का इंतजार करते हुए बड़े होते हैं।
छोटे बच्चे माता-पिता के साथ अपना बचपन बिताने के बजाय त्योहारों पर उनके लौटने का इंतजार करते हुए बड़े होते हैं।प्रज्ञा शर्मा/द मूकनायक

संगीता का परिवार इस बात का उदाहरण है कि पलायन केवल रोजगार का प्रश्न नहीं है। इसका सबसे गहरा असर पीछे छूटे परिवार पर पड़ता है। छोटे बच्चे माता-पिता के साथ अपना बचपन बिताने के बजाय त्योहारों पर उनके लौटने का इंतजार करते हुए बड़े होते हैं। बुजुर्ग उस उम्र में परिवार का सहारा बन जाते हैं, जब उन्हें स्वयं सहारे की जरूरत होती है। महिलाएं गर्भावस्था जैसी परिस्थितियों में भी मजदरी करने के लिए मजबूर होती हैं। यह स्थिति केवल आजीविका का संकट नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि क्या जलवायु परिवर्तन और खेती का संकट गांवों की सामाजिक संरचना को धीरे-धीरे कमजोर कर रहा है? जब खेत सूखे रहते हैं, तो केवल फसलें नहीं घटतीं; परिवार भी बिखरने लगते हैं। संविधान का अनुछेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है। बच्चों का संरक्षित बचपन, महिलाओं का सम्मानजनक मातृत्व, बड़ों का सम्मान और परिवार के साथ रहने का अवसर ये सभी गरिमापूर्ण जीवन का हिस्सा हैं। जब जलवायुपरिवर्तनर्त , सूखा और खेती का संकट लोगों को मजबूरी में पलायन के लिए विवश करता है, तब केवल रोजगार ही नहीं छिनता, बल्कि समानता, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा जैसे संवैधानिक मूल्य भी प्रभावित होते हैं।

बढ़ती गर्मी और सूखे की घटनाओं ने बढ़ाया खतरा

पन्ना और पूरे मध्यप्रदेश में बदलते जलवायु पैटर्न की पुष्टि हाल के वैज्ञानिक अध्ययन भी करते हैं। वर्ष 2025 में Theoretical and Applied Climatology जर्नल में प्रकाशित शोध "Compound Dry and Hot Events over Madhya Pradesh: Spatiotemporal Characteristics and Associated Climate Risks" में शोधकर्ताओं सोमिल स्वर्णकार और विकास पूनिया ने 1958 से 2022 तक के मौसम संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया है। अध्ययन में मध्यप्रदेश में हीटवेव और सूखे की संयुक्त घटनाओं में वृद्धि तथा उनसे जुड़े जलवायु जोखिमों की ओर संकेत किया गया है।

 प्राकृतिक संसाधनों में आई  गिरावट आजीविका संकट को और गहरा कर रही है।  रोजगार की तलाश में गाँवों से पलायन भी तेजी से बढ़ा है।
प्राकृतिक संसाधनों में आई गिरावट आजीविका संकट को और गहरा कर रही है। रोजगार की तलाश में गाँवों से पलायन भी तेजी से बढ़ा है।प्रज्ञा शर्मा/द मूकनायक

जंगल कम हुए, तो आजीविका भी बदल गई

पर्यावरणविद् डॉ. इंद्रभान सिंह बुंदेला बताते हैं कि पन्ना क्षेत्र में पिछले लगभग बीस वर्षों में जंगलों और उनसे जुड़ी आजीविका में बड़ा बदलाव आया है।

उनके अनुसार पहले महुआ, चार, तेंदूपत्ता जैसे नॉन-टिंबर फॉरेस्ट प्रोडक्ट (NTFP) बड़ी मात्रा में उपलब्ध होते थे। गाँव के अधिकांश आदिवासी परिवार इन वन उपजों के संग्रहण पर भी निर्भर रहते थे। लेकिन पिछले दो दशकों में इनके संग्रहण में लगातार गिरावट आई है, जिसका सीधा असर ग्रामीणों की आय पर पड़ा है।

वे बताते हैं कि बढ़ते तापमान के साथ जंगलों में आग लगने की घटनाएँ भी बढ़ी हैं। इसका असर केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोगों की आजीविका पर भी पड़ा है।

डॉ. बुंदेला के अनुसार जल संकट का असर सिंचाई व्यवस्था पर भी दिखाई देता है। पिछले 10 से 15 वर्षों में पानी की कमी के कारण कई नहरें प्रभावी रूप से काम नहीं कर पा रही हैं। इससे खेती पर निर्भर परिवारों की मुश्किलें और बढ़ी हैं।

उनका कहना है कि जंगलों में कमी आने से भूजल पुनर्भरण (ग्राउंड वाटर रिचार्ज) की प्राकृतिक प्रक्रिया भी प्रभावित हुई है। पहले जंगलों की मिट्टी वर्ष के पानी को रोककर धीरे-धीरे जमीन के भीतर पहुँचाती थी। अब जंगल कम होने से बारिश का पानी तेजी से बह जाता है। इससे एक ओर भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, वहीं दूसरी ओर उपजाऊ मिट्टी का कटाव बढ़ने से मिट्टी की उर्वरता भी कम हो रही है।

डॉ. बुंदेला का मानना है कि प्राकृतिक संसाधनों में आई यह गिरावट आजीविका संकट को और गहरा कर रही है। यही कारण है कि रोजगार की तलाश में गाँवों से पलायन भी तेजी से बढ़ा है।

पिछले लगभग दस वर्षों में किसानों ने उड़द, तिल और सोयाबीन की खेती का क्षेत्र कम कर धान की खेती की ओर रुख किया है।
पिछले लगभग दस वर्षों में किसानों ने उड़द, तिल और सोयाबीन की खेती का क्षेत्र कम कर धान की खेती की ओर रुख किया है। प्रज्ञा शर्मा/द मूकनायक

सबसे अधिक असर खरीफ की फसलों पर

पन्ना कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. पी. एन. त्रिपाठी बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर खरीफ की फसलों पर देखने को मिल रहा है।

वे बताते हैं कि लगभग पाँच वर्ष पहले जिले में उड़द की खेती लगभग एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होती थी। वर्तमान में यह घटकर लगभग 45 हजार हेक्टेयर रह गई है।

डॉ. त्रिपाठी इसके पीछे बदलते मानसून को प्रमुख कारण मानते हैं। उनके अनुसार जिस समय उड़द की फसल पकने की अवस्था में होती है, उसी समय बारिश होने लगी है। इससे खेतों में नमी बढ़ जाती है, तापमान का प्रभाव बदलता है और दाने काले पड़ने लगते हैं। इसका सीधा असर फसल की गुणवत्ता पर पड़ता है। यही कारण है कि किसानों ने धीरे-धीरे उड़द का रकबा कम कर दिया है।

उनके अनुसार तिल और सोयाबीन की खेती भी प्रभावित हुई है। फसल पकने के समय बारिश होने से कटाई प्रभावित होती है, जबकि दूसरी ओर नमी के असंतुलन (Moisture Stress) के कारण कई बार पौधे भी ठीक से विकसित नहीं हो पाते।

इसी बदलाव के कारण पिछले लगभग दस वर्षों में किसानों ने उड़द, तिल और सोयाबीन की खेती का क्षेत्र कम कर धान की खेती की ओर रुख किया है। डॉ. त्रिपाठी बताते हैं कि लगभग पाँच वर्ष पहले जिले में धान का रकबा करीब 80 हजार हेक्टेयर था, जो बढ़कर वर्तमान में लगभग 1 लाख 25 हजार हेक्टेयर हो गया है।

हालाँकि धान की खेती बढ़ने के साथ नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। उनके अनुसार फसलों में रोग और कीटों का प्रकोप बढ़ा है। धान के दानों की गुणवत्ता प्रभावित हुई है तथा मिट्टी में कठोरता भी बढ़ रही है।

डॉ. त्रिपाठी बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण मिट्टी की नमी कम होती है और तापमान बढ़ने से पौधों का जीवन चक्र तेजी से पूरा होने लगता है। गेहूँ के लिए लगभग 15 से 20 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता है, लेकिन अचानक तापमान बढ़ने से वाष्पीकरण बढ़ जाता है। इससे पौधे अपेक्षाकृत जल्दी पक जाते हैं और उत्पादन प्रभावित होता है।

वे बताते हैं कि सामान्य परिस्थितियों में गेहूँ की फसल को चार से पाँच सिंचाई की आवश्यकता होती है, लेकिन पानी की कमी के कारण कई किसान केवल एक या दो बार ही सिंचाई कर पाते हैं। इसके कारण गेहूँ की उपज में लगभग 10 से 12 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की जा रही है।

जल संकट से निपटने के लिए सरकार के प्रयास

बढ़ते जल संकट से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा पन्ना जिले में विभिन्न योजनाएँ संचालित की जा रही हैं। इनमें जल जीवन मिशन के तहत नल-जल योजना, जल गंगा संवर्धन अभियान, खेत-तालाब निर्माण और भूजल पुनर्भरण (डगवेल रिचार्ज) जैसे कार्य शामिल हैं।

जिला पंचायत कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार जिले में एकल और सामूहिक (समूह) नल-जल योजनाओं के माध्यम से गाँवों तक पेयजल पहुँचाने का कार्य किया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार 153 गाँवों में स्वीकृत एकल योजनाओं में से 135 गाँवों में योजना संचालित है। सुनेहरा व रानीपुर ग्राम पंचायत में भी यह योजना संचालित की जा रही है।

उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार जिले में कुल 10,039 हैंडपंप स्थापित हैं। इनमें से 9,655 चालू हैं, जबकि 384 हैंडपंप बंद हैं। इनमें 78 हैंडपंप मरम्मत योग्य हैं, जबकि 84 हैंडपंप ऐसे हैं जिन्हें सुधारा नहीं जा सकता। वहीं 222 हैंडपंप भूजल स्तर नीचे चले जाने के कारण बंद हो चुके हैं।

अधिकारियों के अनुसार जिले में जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने के लिए मनरेगा के तहत डगवेल रिचार्ज और सोख्ता गड्ढों का निर्माण भी किया जा रहा है, ताकि वर्षा जल को जमीन के भीतर पहुँचाकर भूजल स्तर को बेहतर बनाया जा सके।

कार्यालय से मिली जानकारी में बताया गया कि वर्ष 2025-26 में जल गंगा संवर्धन योजना के तहत खेत-तालाब निर्माण और भूजल पुनर्भरण के कार्य को प्राथमिकता दी गई है।

योजना के तहत 2,155 खेत-तालाब बनाने का लक्ष्य रखा गया था। बैठक तक 1,271 खेत-तालाबों का निर्माण पूरा हो चुका था, जबकि 884 पर कार्य जारी था।

इसी प्रकार डगवेल रिचार्ज के तहत 1,820 संरचनाओं का लक्ष्य रखा गया। इनमें से 1,181 का निर्माण पूरा हो चुका है, जबकि 639 पर कार्य प्रगति पर है। साथ ही लगभग छह फीट गहरे रिचार्ज गड्ढों के माध्यम से वर्षा जल को जमीन के भीतर पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है, क्योंकि जिले में लगातार भूजल स्तर नीचे जाने की चुनौती बनी हुई है।

गाँव में वर्षा जल को जमीन में पहुँचाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं हुए। दोनों सरकारी कुओं के पास जल पुनर्भरण (वाटर रिचार्ज) के लिए डगवेल या अन्य संरचनाएँ नहीं बनाई गई हैं।
गाँव में वर्षा जल को जमीन में पहुँचाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं हुए। दोनों सरकारी कुओं के पास जल पुनर्भरण (वाटर रिचार्ज) के लिए डगवेल या अन्य संरचनाएँ नहीं बनाई गई हैं।प्रज्ञा शर्मा/द मूकनायक

सरकारी दावों के बीच गाँवों की तस्वीर अलग नजर आई

जिला पंचायत से मिले आंकड़ों में जल संरक्षण, खेत-तालाब, डगवेल रिचार्ज और नल-जल योजनाओं के माध्यम से जल संकट से निपटने के प्रयासों का दावा किया जा रहा है। हालाँकि पन्ना जिले के कल्याणपुर और रानीपुर गाँवों की पड़ताल के दौरान ग्रामीणों ने अलग तस्वीर सामने रखी।

कल्याणपुर गाँव के 50 वर्षीय किसान माधव सिंह बताते हैं कि उनका परिवार पिछले तीन पीढ़ियों से खेती करता आ रहा है। खेती ही उनके परिवार की आजीविका का मुख्य आधार है। उनके पास करीब दो एकड़ कृषि भूमि है, जहाँ हर साल गेहूँ, चना और सरसों की खेती होती है। लेकिन पिछले दशकों में खेती लगातार कठिन होती गई है।

वे बताते हैं, "पहले इसी जमीन से कहीं ज्यादा उत्पादन होता था। इस बार पूरे दो एकड़ खेत से केवल 30 बोरे गेहूँ निकला। हर साल पैदावार कम होती जा रही है।"

माधव सिंह अपने खेत में बने लगभग 30 फीट गहरे निजी कुएँ की ओर इशारा करते हुए बताते हैं कि करीब 20 वर्ष पहले इसमें 20 से 22 फीट तक पानी भरा रहता था। उस समय सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो जाता था। लेकिन अब उसी कुएँ में केवल 8 से 10 फीट तक ही पानी बचता है। गर्मियों में कई बार पानी इससे भी नीचे चला जाता है, जिससे सिंचाई करना मुश्किल हो जाता है।

उनका कहना है कि बदलते मौसम का असर खेती पर साफ दिखाई देता है। पहले जैसी ठंड अब नहीं पड़ती, जबकि गर्मी का मौसम लंबा और अधिक तीखा हो गया है। बढ़ते तापमान के कारण मिट्टी की नमी जल्दी खत्म हो जाती है, जिससे फसलों की बढ़वार प्रभावित होती है। पानी की कमी और मौसम में आए बदलाव का असर गेहूँ सहित अन्य फसलों के उत्पादन पर भी दिखाई दे रहा है।

जब उनसे पूछा गया कि क्या गाँव में सरकार की जल संरक्षण योजनाओं, जैसे डगवेल रिचार्ज या खेत-तालाब योजना के तहत कोई कार्य हुआ है, तो उन्होंने बताया कि गाँव में अब तक ऐसी कोई संरचना दिखाई नहीं देती। उनके अनुसार न तो उनके खेत में और न ही आसपास के क्षेत्र में जल संरक्षण के लिए कोई सरकारी निर्माण हुआ है।

गाँव के पूर्व सरपंच रामसजीवन यादव भी भूजल संकट की पुष्टि करते हैं। उनके अनुसार गाँव में पेयजल के लिए कुल पाँच हैंडपंप और दो सरकारी कुएँ हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भूजल स्तर लगातार गिरने के कारण गर्मी शुरू होते ही दोनों सरकारी कुएँ लगभग सूखने की स्थिति में पहुँच जाते हैं।

वे बताते हैं कि करीब दस वर्ष पहले स्थिति ऐसी नहीं थी। गर्मियों में भी कुओं में पर्याप्त पानी रहता था और ग्रामीणों को पानी के लिए ज्यादा परेशानी नहीं होती थी। वर्तमान में गाँव के पाँच हैंडपंपों में से केवल दो ही नियमित रूप से पानी दे रहे हैं, जबकि बाकी तीन हैंडपंपों से पानी नहीं निकलता। इससे गर्मी के मौसम में ग्रामीणों की निर्भरता सीमित जल स्रोतों पर बढ़ गई है।

रामसजीवन यादव का कहना है कि गाँव में वर्षा जल को जमीन में पहुँचाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं हुए। उनके अनुसार दोनों सरकारी कुओं के पास जल पुनर्भरण (वाटर रिचार्ज) के लिए डगवेल या अन्य संरचनाएँ नहीं बनाई गई हैं। उनका मानना है कि यदि समय रहते ऐसी संरचनाएँ बनाई जातीं, तो भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद मिल सकती थी।

इसी गाँव के किसान छन्नू आदिवासी भी बदलते मौसम को अपनी खेती में महसूस कर रहे हैं। वे बताते हैं कि पिछले लगभग 20 वर्षों में क्षेत्र के अधिकांश कुओं का जल स्तर लगातार नीचे गया है।

पहले जिन कुओं में पूरे साल पर्याप्त पानी रहता था, उनमें अब गर्मी शुरू होते ही पानी कम होने लगता है। इसका सीधा असर खेती और किसानों की आजीविका पर पड़ रहा है।

छन्नू आदिवासी कहते हैं, "अब मौसम पहले जैसा नहीं रहा। गर्मी जल्दी शुरू हो जाती है और पहले से ज्यादा महसूस होती है। आसपास जंगल और हरियाली भी कम हुई है। इसका असर मौसम पर भी दिखता है और खेती पर भी।"

उनके अनुसार समय से पहले बढ़ने वाली गर्मी का सबसे अधिक असर गेहूँ की फसल पर पड़ता है। दाने पूरी तरह नहीं भर पाते, जिससे उत्पादन घट जाता है और किसानों की आय प्रभावित होती है।

 गाँव के लोगों का मानना है कि यदि वर्षा के पानी को गाँव में ही रोका जाए, तो आने वाले वर्षों में जल संकट को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
गाँव के लोगों का मानना है कि यदि वर्षा के पानी को गाँव में ही रोका जाए, तो आने वाले वर्षों में जल संकट को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।प्रज्ञा शर्मा/द मूकनायक

जब गाँव ने खुद संभाली जल संरक्षण की जिम्मेदारी

सरकारी योजनाओं से इतर गाँधीग्राम और कल्याणपुर के ग्रामीणों ने जल संकट से निपटने के लिए सामुदायिक स्तर पर पहल भी शुरू की है।

गाँधीग्राम के 25 वर्षीय अरविंद आदिवासी बताते हैं कि लगातार बढ़ते जल संकट को देखते हुए गाँव के लोगों ने सामूहिक रूप से सूख चुके पोखरों की गहरीकरण करने का निर्णय लिया। मार्च और अप्रैल के दौरान दो पोखरों का गहरीकरण किया गया, ताकि बारिश के पानी का अधिक से अधिक संचयन हो सके। इनमें एक पोखर कल्याणपुर के पास तथा दूसरा गाँधीग्राम के पास स्थित है।

अरविंद के अनुसार एक पोखर के गहरीकरण का कार्य लगभग दस दिनों तक चला। इस श्रमदान में गाँव के करीब 70 से 80 आदिवासी परिवारों ने भाग लिया। महिलाएँ और पुरुष दोनों रोजाना काम में शामिल हुए। उनका कहना है कि गाँव के लोगों का मानना है कि यदि वर्षा के पानी को गाँव में ही रोका जाए, तो आने वाले वर्षों में जल संकट को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान अपनाने की जरूरत: विशेषज्ञ

पर्यावरणविद् डॉ. इंद्रभान सिंह बुंदेला का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से पैदा हो रहे संकट का समाधान केवल नई योजनाओं से नहीं, बल्कि स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और समुदाय की भागीदारी से संभव है।

वे बताते हैं कि कल्याणपुर और कृष्ण कल्याणपुर जैसे क्षेत्रों में वर्षा जल को रोकने के लिए चेक डैम और कंटूर ट्रेंच (छोटी खाइयाँ) जैसी संरचनाएँ बनाई जानी चाहिए, ताकि वर्षा का पानी बहने के बजाय जमीन में समा सके और भूजल का पुनर्भरण हो।

उनके अनुसार मिट्टी की नमी बनाए रखने के लिए सूखी पत्तियों से मल्चिंग तथा जैविक खाद का उपयोग बढ़ाने की आवश्यकता है। इससे मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के साथ-साथ पानी को अधिक समय तक रोकने में भी मदद मिलती है।

डॉ. बुंदेला का कहना है कि जल संकट और भूजल स्तर में गिरावट को रोकने के लिए स्थानीय वनीकरण (Native Afforestation) पर विशेष ध्यान देना होगा। उनके अनुसार बाहरी प्रजातियों के बजाय क्षेत्र की मूल प्रजातियों, जैसे नीम, पीपल और बरगद, को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कम समय में घना वन विकसित करने के लिए मियावाकी पद्धति का भी उपयोग किया जा सकता है।

बदलती जलवायु लगातार सूखे की स्थिति, घटते जलस्रोत और खेती के बढ़ते संकट ने कई परिवारों को खेती से मजदूरी की ओर धकेल दिया है।
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