
उदयपुर- राजस्थान सरकार ने पिछले दस वर्षों में प्रदेश के करीब 6785 माध्यमिक विद्यालयों को विभिन्न संकायों में क्रमोन्नत कर तो दिया, लेकिन बिना विभागीय पद सृजित किए यह क्रमोन्नति अधूरी रह गई। इनमें से लगभग 3500 बालिका उच्च प्राथमिक विद्यालयों को उच्च माध्यमिक यानी सीनियर सेकेंडरी में क्रमोन्नत किया गया, लेकिन व्याख्याताओं व वरिष्ठ अध्यापकों के पद नहीं होने से ये विद्यालय शिक्षा के ‘बाड़े’ बनकर रह गए हैं।
हर साल विद्यार्थियों को व्याख्याताओं का इंतजार रहता है। कभी-कभार पदस्थापन होता भी है, लेकिन एक-दो वर्ष में ही नियुक्ति पाकर शिक्षक स्थानांतरण करवा कर चले जाते हैं। ऐसे में अधिकतर स्कूल फिर से खाली हो जाते हैं। खासतौर पर टीएसपी परिक्षेत्र बांसवाड़ा में यह समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है।
राज्य सरकार पर नियमानुसार उपचारात्मक शिक्षण व्यवस्था यानि रेमेडियल क्लासेज सुनिश्चित करना अनिवार्य है, लेकिन सरकार रिक्त पदों की बचत करना चाहती है। नतीजतन, वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। वर्ष 2022 में सेवानिवृत्त शिक्षकों से उपचारात्मक शिक्षण करवाया गया था, लेकिन चार साल बाद भी उनका आधा मानदेय बकाया है। विगत चार वर्षों से कालांश आधारित उपचारात्मक शिक्षण व्यवस्था भी लागू नहीं की गई है।
रिक्त पदों के चलते ग्रामीणों, अभिभावकों और जनप्रतिनिधियों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है। स्थानीय युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा, वहीं स्कूलों में पद सृजित नहीं होने से पदस्थापन संभव नहीं हो पा रहा। जहां पद सृजित हैं, वहां पदस्थापन के अभाव में वे खाली पड़े हैं।
राजस्थान शिक्षा विभाग में व्याख्याताओं के पदस्थापन सीधी भर्ती, पदोन्नति (DPC) और ट्रांसफर के माध्यम से होते हैं। इसके लिए राज्य स्तर पर काउंसलिंग आयोजित की जाती है। लेकिन शिक्षक संघ सियाराम के अनुसार, टीएसपी परिक्षेत्र बांसवाड़ा के स्कूलों के रिक्त पदों को काउंसलिंग में प्रदर्शित ही नहीं किया जाता, जो भेदभावपूर्ण और अन्यायोचित है।
राजस्थान शिक्षक संघ (सियाराम) के प्रदेश प्रशासनिक अध्यक्ष सियाराम शर्मा ने मांग की है कि टीएसपी परिक्षेत्र के सभी स्कूलों के रिक्त पदों को प्रदर्शित किया जाए। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र ही सभी विद्यालयों में गेस्ट फैकल्टी की व्यवस्था नहीं की गई, या रिक्त पदों के लिए स्थानीय बेरोजगार युवाओं हेतु टीएसपी परिक्षेत्र के लिए अलग विज्ञप्ति जारी नहीं की गई,तो काकरी डूंगरी जैसा आंदोलन वागड़ अंचल में फिर से जोर पकड़ सकता है।
संघ के जिलाध्यक्ष नवीन जोशी और जिला मंत्री महिपाल भुता के अनुसार, रिक्त पदों के चलते आए दिन तालाबंदी और विद्यार्थियों की हड़ताल होती रहती है। स्थिति यह है कि कई क्रमोन्नत विद्यालयों में पिछले पांच वर्षों से सीनियर सेकेंडरी में एक भी प्रथम श्रेणी यानी व्याख्याता और द्वितीय श्रेणी के वरिष्ठ अध्यापक नहीं लगाए गए हैं।
प्रदेश मंत्री नानूराम डामोर ने बताया कि 11वीं और 12वीं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का भविष्य अब थर्ड ग्रेड शिक्षकों के भरोसे छोड़ दिया गया है। उनसे जबरन 54 कालांश लेने का दबाव बनाया जाता है, जबकि पीटीआई, पुस्तकालय अध्यक्ष, पंचायत सहायक और प्रबोधक जैसे अन्य कर्मचारियों से व्याख्याता का काम लिया जा रहा है और उन्हें थर्ड ग्रेड का मानदेय दिया जा रहा है।
शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि शिक्षकों की कमी पूरी करने के लिए डीपीसी पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। यथास्थान पदोन्नति देकर सरकार वाहवाही तो लूट रही है, लेकिन एक साल से लंबित प्रधानाचार्य, उप-प्रधानाचार्य एवं व्याख्याताओं के पदस्थापन नहीं हुए हैं। डीपीसी होने के बावजूद काउंसलिंग प्रक्रिया शुरू न होने और पदोन्नति सूची जारी न होने से पदस्थापन ठप हैं। जब तक सूची जारी कर काउंसलिंग नहीं होती और शिक्षकों को पोस्टिंग नहीं मिलती, तब तक क्रमोन्नयन का कोई अर्थ नहीं रह जाता। पदोन्नति का लाभ शिक्षकों और विद्यार्थियों दोनों को नहीं मिल पा रहा है।
स्कूलों को प्रमोट करने के आदेश तो जारी कर दिए गए, लेकिन उनमें नए पदों (व्याख्याता व वरिष्ठ अध्यापक) का सृजन ही नहीं किया गया।
वित्त विभाग से नए पदों के लिए बजट और वित्तीय स्वीकृति मिलने में अत्यधिक विलंब हो रहा है।
जहां पद हैं, वहां काउंसलिंग प्रक्रिया में उन्हें शामिल नहीं किया जा रहा।
सरकार ने बिना किसी पूर्व योजना और पद सृजन के, केवल राजनीतिक लाभ के लिए दस साल में 6785 स्कूलों को क्रमोन्नत किया, जिनमें 3500 बालिका स्कूल शामिल हैं। यह ग्रामीण बालिकाओं के भविष्य से सीधा खिलवाड़ है।
संघ का स्पष्ट कहना है कि जब स्कूलों में व्याख्याता और वरिष्ठ अध्यापक ही नहीं होंगे, तो उच्च माध्यमिक शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा? शिक्षा विभाग को तुरंत डीपीसी की सूची जारी करनी चाहिए, नए पदों का सृजन कर शिक्षकों की नियुक्ति करनी चाहिए, अन्यथा संगठन उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होगा।
ज्ञापन देने वालों में प्रदेश सभाध्यक्ष ललित आर पाटीदार, अशोक शर्मा, जिलाध्यक्ष नवीन जोशी, जिला मंत्री महिपाल भूता, प्रदेश मंत्री नानूराम डामोर एवं प्रदेश प्रशासनिक अध्यक्ष सियाराम शर्मा प्रमुख रूप से शामिल रहे।
काकरी डूंगरी आंदोलन सितंबर 2020 में राजस्थान के डूंगरपुर में रीट (REET) 2018 भर्ती के 1,167 अनारक्षित पदों को अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों से भरने की मांग को लेकर हुआ एक हिंसक आदिवासी आंदोलन था। काकरी डूंगरी की पहाड़ी पर 18 दिनों के धरने के बाद, यह आंदोलन उग्र हो गया और 24-28 सितंबर 2020 के बीच नेशनल हाईवे-8 पर जाम व तोड़फोड़ हुई।
यह प्रदर्शन एनएच-8 पर आगजनी और तोड़फोड़ में बदल गया, जिसमें पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं। जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर मुकदमे दर्ज किए, तो आंदोलन उग्र हो गया। प्रदर्शनकारियों ने वाहनों को आग लगा दी, पुलिस पर पथराव किया, और होटल/पेट्रोल पंपों को नुकसान पहुंचाया। इस हिंसा में 2 लोगों की मौत हुई और पुलिस अधिकारी घायल हुए। आंदोलन के दौरान हुए दंगे, हाईवे जाम, और पुलिस पर पथराव के आरोप में सैकड़ों अज्ञात युवाओं के खिलाफ 60 से अधिक मुकदमे दर्ज किए गए थे।
पुलिस ने इस दौरान बड़ी संख्या में युवाओं को गिरफ्तार किया था। आरोप लगे थे कि इसमें कई निर्दोष छात्रों पर भी फर्जी मुकदमे दर्ज किए गए, जिससे उनके भविष्य और सरकारी नौकरियों पर खतरा मंडराने लगा।
2022 में गहलोत सरकार के समय, बीटीपी (BTP) विधायकों और स्थानीय नेताओं ने मुख्यमंत्री से मिलकर इन मुकदमों को वापस लेने की मांग की थी। सरकार ने इन मामलों पर पुनर्विचार करने और निर्दोषों के खिलाफ मामलों को जांचने का आश्वासन दिया था।
2024 में वर्तमान सरकार के मंत्रियों ने काकरी डूंगरी की फाइलों को फिर से खोलने और दंगे के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही थी, जबकि पहले की सरकार में बड़ी संख्या में मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया भी चली थी।
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