धर्म बदलने से क्या आरक्षण बचेगा? तमिलनाडु के GO को मद्रास हाईकोर्ट ने क्यों बताया असंवैधानिक?

जस्टिस स्वामीनाथन ने कहा, “कुरान की आयत और पैगंबर मुहम्मद के विदाई भाषण दोनों मानवता की समानता की बात करते हैं। इस्लाम में सामाजिक पदानुक्रम नहीं है।”
यह फैसला सामाजिक न्याय, आरक्षण नीति और धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा, “एक जन्मजात समुदाय में जन्म लेकर ही कोई रौथर, मरक्कयार या दक्कनी मुस्लिम होता है। धर्मांतरण से किसी को ‘लब्बई’ या अन्य अधिसूचित मुस्लिम समुदाय में नहीं बदला जा सकता।” एआई निर्मित चित्र
Published on

मदुरै- मद्रास हाईकोर्ट के मदुरै बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ कहा है कि हिंदू से इस्लाम में धर्मांतरण करने के बाद व्यक्ति को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम (बीसी मुस्लिम) का सामुदायिक प्रमाण-पत्र जारी नहीं किया जा सकता। अदालत ने तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के जीओ (गवर्नमेंट आर्डर) को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत समीर अहमद की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिन्होंने 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपना लिया था। इसके लिए 2016 में एक सरकारी नोटिफिकेशन जारी किया गया था। समीर ने इस्लामिक रीति-रिवाजों के अनुसार शादी भी की और इस शादी से उनके दो बच्चे भी हुए।

याचिकाकर्ता समीर अहमद का मूल नाम परमसिवम है जिनका जन्म 12 अप्रैल 1993 को हिंदू दंपति नारायणन और गोमथियम्मल के यहां हुआ था। 2015 में उन्होंने इस्लाम अपनाया, नाम बदलकर समीर अहमद रखा और 2016 में गजट नोटिफिकेशन भी कराया। उन्होंने तूतुकुडी जिले के कयथार तहसीलदार से ‘मुस्लिम लब्बई’ समुदाय का प्रमाण-पत्र मांगा ताकि बीसी मुस्लिम आरक्षण का लाभ मिल सके। तहसीलदार ने आवेदन खारिज कर दिया। इसके खिलाफ दायर याचिका (WP(MD) No. 7127 of 2022) पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस पी.बी. बालाजी की खंडपीठ ने याचिका खारिज कर दी।

राज्य ने तर्क दिया कि यह सरकारी आदेश (GO) मनमाने ढंग से जारी नहीं किया गया था। यह तर्क दिया गया कि तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग आयोग ने 6 फरवरी, 2024 के पत्र के ज़रिए सरकार से सिफ़ारिश की थी कि पिछड़ा वर्ग के उन लोगों को कम्युनिटी सर्टिफ़िकेट दिया जाए जो पहचान किए गए 7 समूहों में से किसी एक में धर्म परिवर्तन करते हैं।

यह तर्क दिया गया कि यह सरकारी आदेश विस्तृत विचार-विमर्श के बाद पारित किया गया था। यह बात रखी गई कि यह आदेश इसलिए पारित किया गया था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जो लोग पहले से आरक्षण का लाभ उठा रहे थे, वे इस्लाम में धर्म परिवर्तन के कारण इसे न खो दें। इस प्रकार राज्य ने तर्क दिया कि ऐसे लोगों को आरक्षण देने से सामाजिक संतुलन पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

कोर्ट ने कहा, “परमसिवम पुत्र नारायणन का समीर अहमद बन जाना संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकार का प्रयोग माना जा सकता था, लेकिन धर्मांतरण के बाद आरक्षण का लाभ जारी रखने की मांग एक नया बहस का विषय बन जाती है।” अदालत ने 1952 के ऐतिहासिक जी. माइकल बनाम एस. वेंकटेश्वरन मामले का हवाला देते हुए कहा, “जब कोई हिंदू इस्लाम में परिवर्तित होता है, तो वह सिर्फ एक मुसलमान बन जाता है। उसकी मुस्लिम समाज में जगह उसके पहले की जाति से तय नहीं होती।” इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में मंजूरी दी है।

कोर्ट ने जीओ (एमएस) नंबर 31 को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यह “असंवैधानिक और इस्लामी सिद्धांतों के विरुद्ध” है। जस्टिस स्वामीनाथन ने कहा, “कुरान की आयत और पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) के विदाई भाषण दोनों मानवता की समानता की बात करते हैं। इस्लाम में सामाजिक पदानुक्रम नहीं है।”

कोर्ट ने आगे कहा, “एक जन्मजात समुदाय में जन्म लेकर ही कोई रौथर, मरक्कयार या दक्कनी मुस्लिम होता है। धर्मांतरण से किसी को ‘लब्बई’ या अन्य अधिसूचित मुस्लिम समुदाय में नहीं बदला जा सकता।” अदालत ने कहा कि जीओ न्यायिक फैसलों को पलटने की कोशिश है, जो शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन है।

धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। सरकार ने सभी मुस्लिमों को बीसी में शामिल नहीं किया है, जो सही भी है। लेकिन धर्मांतरण के बाद पुराना आरक्षण बनाए रखना गलत।
मद्रास हाईकोर्ट

आरक्षण नीति पर सवाल

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु सरकार ने केवल 7 मुस्लिम समुदायों (अंसार, दक्कनी मुस्लिम, दुबेकुला, लब्बई, मापिल्ला, शेख, सैयद) को ही बीसी मुस्लिम के रूप में मान्यता दी है। इनमें से कोई भी जन्म के आधार पर ही प्राप्त होता है। एससी या बीसी से इस्लाम अपनाने वाले को इनमें से किसी एक ‘स्लॉट’ में डालने का प्रावधान असंवैधानिक है।

कोर्ट ने टिप्पणी की, “धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। सरकार ने सभी मुस्लिमों को बीसी में शामिल नहीं किया है, जो सही भी है। लेकिन धर्मांतरण के बाद पुराना आरक्षण बनाए रखना गलत है।"

सरकार और जमात की भूमिका पर अदालत ने कहा कि जमात द्वारा जारी प्रमाण-पत्र केवल धर्म परिवर्तन की पुष्टि करता है, न कि किसी विशिष्ट मुस्लिम ‘जाति/समुदाय’ में शामिल होने का। तहसीलदार का मूल आदेश सही था, जिसमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता ने “धर्म बदला है, जाति नहीं।”

इस फैसले से तमिलनाडु में धर्मांतरण के बाद आरक्षण लाभ बनाए रखने की कोशिशों पर ब्रेक लग गया है। कोर्ट ने साफ किया कि “इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति केवल मुसलमान है, बस।” याचिका खारिज होने के साथ ही जुड़े आवेदन भी बंद कर दिए गए।

यह फैसला सामाजिक न्याय, आरक्षण नीति और धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अधिवक्ता महेश्वरन आर. ने याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी की, जबकि अतिरिक्त महाधिवक्ता पी.वी. बालासुब्रमण्यम ने सरकार की ओर से दलीलें दीं।

{Citation:2026 LiveLaw (Mad) 279}

यह फैसला सामाजिक न्याय, आरक्षण नीति और धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
धर्मांतरण करने वाले दलितों के SC दर्जे पर बड़ा अपडेट, बालकृष्णन आयोग ने तैयार की रिपोर्ट
यह फैसला सामाजिक न्याय, आरक्षण नीति और धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
धर्म बदलने से खत्म नहीं होता जातिगत भेदभाव: YSR कांग्रेस ने उठाई दलित ईसाइयों को SC का दर्जा देने की मांग
यह फैसला सामाजिक न्याय, आरक्षण नीति और धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मुस्लिम समुदाय की बिगड़ती स्थिति पर व्यापक दस्तावेज तैयार करेगा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

द मूकनायक की मदद करें

‘द मूकनायक’ जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है. अगर आप भी चाहते हैं कि ‘द मूकनायक’ हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहे तो सपोर्ट करें.

यहां सपोर्ट करें
The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com