
मदुरै- मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने अपने हालिया फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि एक विवाहित हिंदू महिला का अपने पति के जीवित रहते अपना मंगलसूत्र उतारना मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) का सबसे गंभीर रूप है। अदालत ने एक सेवानिवृत्त सेना अधिकारी को तलाक देने वाले निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखते हुए पत्नी की अपील खारिज कर दी, क्योंकि दंपत्ति पिछले 30 वर्षों से अलग-अलग रह रहे थे और पत्नी ने खुद अदालत में स्वीकार किया कि उसने अपना मंगलसूत्र उतार दिया है।
अदालत ने कहा, "यह सर्वविदित तथ्य है कि कोई भी हिंदू विवाहित महिला अपने पति के जीवित रहते हुए कभी भी मंगलसूत्र नहीं उतारती है। मंगलसूत्र एक पवित्र प्रतीक है, जो वैवाहिक जीवन की निरंतरता को दर्शाता है और इसे केवल पति की मृत्यु के बाद ही उतारा जाता है। पत्नी द्वारा मंगलसूत्र उतारना मानसिक क्रूरता का उच्चतम स्तर है, क्योंकि इससे पति को गहरी मानसिक वेदना होती है।"
जस्टिस पी. वदामलाई की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस समय की जब वह एक पति की ओर से दायर अपील पर सुनवाई कर रहे थे, जिसने अपनी पत्नी द्वारा उत्पीड़न और झूठे आरोपों का हवाला देते हुए तलाक की मांग की थी। यह जोड़ा 30 अगस्त 1977 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह के बंधन में बंधा था, लेकिन शुरुआत से ही उनके रिश्ते में कटुता और अविश्वास बना रहा।
पति भारतीय सेना में कार्यरत थे, उन्होंने अदालत को बताया कि उसकी पत्नी उस पर अन्य महिलाओं के साथ अवैध संबंध रखने का झूठा आरोप लगाती थी और 1989 में उसने उसके वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखकर उसकी छवि धूमिल करने का प्रयास किया, जिससे उसके करियर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। जबकि पत्नी ने अपने बचाव में पति पर ही मारपीट करने, घर में आग लगाने और उसका अंगूठा काटने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन अदालत ने इस मामले में सबसे अहम मोड़ पत्नी की अपनी ही गवाही को बताया। अदालत के सामने पत्नी ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि उसने न सिर्फ सेना अधिकारियों को शिकायत लिखी, बल्कि यह भी कबूला कि उसने अपना मंगलसूत्र (ताली) उतार दिया है और वह सोने के आभूषण नहीं पहनती है। इस स्वीकारोक्ति को अदालत ने बेहद गंभीरता से लिया।
अदालत ने कहा कि पति द्वारा 1991 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी दंपति साथ रहे, लेकिन पत्नी का आरोप लगाने का सिलसिला जारी रहा, जिसके कारण आपसी झगड़े बढ़ते गए और पति के खिलाफ आपराधिक मामले भी दर्ज हुए, जिसमें उसे सात साल की सजा भी हुई थी। अदालत ने यह भी नोट किया कि दोनों पिछले 30 सालों से अलग-अलग रह रहे हैं। पत्नी 1996 से अलग रह रही है और उसने पुनर्मिलन के लिए कोई कदम नहीं उठाया, न ही वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए कोई याचिका दायर की।
पत्नी की ओर से यह दलील दी गई कि सेना अधिकारियों को लिखी गई 1989 की शिकायत और पुरानी घटनाओं को पति ने साथ रहकर माफ (Condonation) कर दिया था, लेकिन न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद भी पत्नी ने पति पर अवैध संबंधों के आरोप जारी रखे, जिससे यह साबित होता है कि क्रूरता का सिलसिला लगातार जारी था। जस्टिस वदामलाई ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जीवनसाथी द्वारा अपने साथी के वरिष्ठ अधिकारियों के सामने उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना और लंबे समय तक अलग रहना, मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।
अदालत ने विशेष रूप से सेना अधिकारी होने के संदर्भ में पत्नी के पत्र को गंभीर ठहराया, क्योंकि सेना में कार्यरत व्यक्ति के लिए उसके चरित्र पर लगा दाग उसके करियर और सम्मान दोनों को नुकसान पहुंचाता है। हालांकि पति ने पत्नी पर ईसाई धर्म अपनाने का भी आरोप लगाया था, लेकिन अदालत ने मंगलसूत्र उतारने के मुद्दे को ही तलाक का आधार मानने के लिए पर्याप्त बताया। फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि हालांकि 'विवाह का अपरिवर्तनीय रूप से टूटना' (Irretrievable Breakdown of Marriage) हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक का एक अलग कारण नहीं है, लेकिन अदालतें 30 साल के लंबे अलगाव को 'क्रूरता' साबित करने के लिए एक मजबूत साक्ष्य के रूप में देख सकती हैं।
नतीजतन मद्रास हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें तेनकासी की प्रिंसिपल सब कोर्ट ने 2017 में और फिर एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट ने 2019 में पति के पक्ष में तलाक के आदेश दिए थे। पत्नी की अपील खारिज करते हुए कोर्ट ने साफ कर दिया कि अब इस विवादित रिश्ते को बचाने की कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि यह विवाह लगभग 50 वर्षों से कलह और कटुता का प्रतीक बन चुका है।
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