
नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में पति और उसके परिवार के खिलाफ POCSO अधिनियम के तहत झूठे और फर्जी मामले दर्ज कराने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि बच्चों का इस्तेमाल माता-पिता के बीच रंजिश निपटाने के लिए एक "हथियार" के रूप में किया जा रहा है।
अदालत ने कहा कि हाल के वर्षों में यह चलन बढ़ा है जहां पत्नियां अपनी नाबालिग बेटी के खिलाफ पति (जो बच्ची के पिता भी होते हैं) पर यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाकर उन्हें परेशान कर रही हैं या फिर तलाक या अन्य विवादों में बेहतर समझौता पाने का दबाव बना रही हैं। कोर्ट ने साफ कहा, "इस तरह के मामलों के केंद्र में एक बच्चा होता है, जिसे अक्सर उसकी मां उसकी इच्छा के विरुद्ध पिता और पैतृक परिवार के खिलाफ झूठी शिकायतें करने के लिए इस्तेमाल करती है।"
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी मेरठ के एक मामले में पिता और चाचा पर नाबालिग बेटी के साथ बलात्कार के आरोपों को खारिज करते हुए की। यह मामला इश्वर चंद और उनके परिवार के खिलाफ उनकी पत्नी द्वारा दायर शिकायत से जुड़ा है। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि:
पति (इश्वर चंद ) शराबी है और उसने 14 साल की बेटी के साथ बलात्कार किया
बेटी ने विरोध किया तो सास और ननद ने उसे पीटा
देवर (नंबर 4) ने भी कई बार बलात्कार किया
ननद ने हथौड़े के हैंडल को बेटी के गुप्तांगों में डाल दिया
सुप्रीम कोर्ट ने कई आधारों पर इन आरोपों को खारिज किया:
1. कोई तारीख नहीं: अदालत ने कहा, "शिकायत में कोई तारीख नहीं बताई गई कि आरोपी घटनाएं कब हुईं। बलात्कार का आरोप एक सामान्य बयान है।"
2. मेडिकल सबूत नहीं: कोर्ट ने कहा, "हैमर रॉड डालने की क्रिया बहुत गंभीर है, लेकिन अभियोजन पक्ष ने कोई मेडिकल रिपोर्ट पेश नहीं की। कोई चोट का रिकॉर्ड नहीं है।"
3. बयानों में एकरूपता: अदालत ने कहा, "शिकायतकर्ता और पीड़िता के बयान लगभग शब्दशः एक जैसे हैं। यह संभावना दर्शाता है कि पीड़िता को सिखाया-पढ़ाया गया है।"
4. लंबा इंतजार: कोर्ट ने कहा, "पीड़िता 06.05.2024 को आरोपियों का घर छोड़कर गई, लेकिन शिकायत लगभग चार महीने बाद 10.09.2024 को दर्ज कराई गई। कोर्ट ने कहा, "इस दौरान शिकायतकर्ता और उसके परिवार के पास पीड़िता के मन को रंगने और प्रभावित करने का पर्याप्त समय और अवसर था, खासकर जब पीड़िता अपनी कोमल और प्रभावशाली उम्र की वजह से ऐसी सिखाई-पढ़ाई के प्रति संवेदनशील थी।"
कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच पहले से ही दस से अधिक आपराधिक और दीवानी मामले लंबित हैं और ऐसे में नौवें या दसवें मामले के तौर पर POCSO के तहत ऐसे गंभीर आरोप लगाना "प्रतिशोध का एक स्पष्ट प्रयास" प्रतीत होता है। सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में झूठे और फर्जी मामले दर्ज कराने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जताई:
"पक्षकार वैवाहिक या व्यावसायिक संबंधों में झूठे और फर्जी दावे दर्ज करा रहे हैं ताकि व्यक्तिगत रंजिश निपटा सकें... कानून की प्रक्रिया का इस्तेमाल हथियार के रूप में किया जा रहा है, खासकर तब जब पक्ष 'आर्म-ट्विस्टिंग' तरीके से अनुकूल परिणाम या अधिक वित्तीय समझौता पाना चाहते हैं।"
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में "POCSO अधिनियम के तहत शिकायत" को "प्रतिशोध लेने या नागरिक विवादों से बचने के लिए" इस्तेमाल किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों से भी अपील की:
"वकीलों का बहुत बड़ा सामाजिक दायित्व है... वे अपने मुवक्किलों को पारिवारिक विवादों में फर्जी आपराधिक मामले दर्ज कराने की सलाह देने के बजाय उन्हें रोकें। एक शिकायत के कारण कई मामले नहीं होने चाहिए।"
कोर्ट ने कहा कि इस तरह के झूठे मामलों से "अदालतों पर बोझ बढ़ता है और वास्तविक मामलों को समय पर निपटाने में मुश्किल होती है।"
कोर्ट ने कहा, "बलात्कार और नाबालिगों के यौन शोषण के वास्तविक मामलों में अदालतों को कठोरतम कार्रवाई करनी चाहिए और दोषियों को सजा दिलानी चाहिए, लेकिन साथ ही अदालतों को झूठे मामलों को शुरुआत में ही खारिज करना चाहिए ताकि निर्दोष लोगों के अधिकारों और स्वतंत्रता का हनन न हो।" जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भूयान की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 15 सितंबर 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें हाईकोर्ट ने अपराधियों के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने से इनकार किया था। साथ ही, कोर्ट ने विशेष जज (POCSO अधिनियम)/अपर सत्र न्यायाधीश, मेरठ के समक्ष लंबित कंप्लेंट केस नंबर 05/2025, उसके संज्ञान आदेश और समन आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया।
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