कोमा में पति, माँ बनने की चाहत: क्या कानून IVF की अनुमति देगा? दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- 'प्रक्रिया नहीं, महिला का अधिकार बड़ा!

दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश -पति की नई सहमति के बिना भी निकाल सकते हैं स्पर्म
अदालत ने कहा कि दुर्घटना से पहले, पति और पत्नी दोनों ने स्वेच्छा से IVF प्रक्रिया के लिए सहमति दी थी और इसका उपचार भी शुरू हो चुका था। इसलिए, यह मानना उचित होगा कि पति ने पहले ही IVF कराने की सहमति दे दी थी।
अदालत ने कहा कि दुर्घटना से पहले, पति और पत्नी दोनों ने स्वेच्छा से IVF प्रक्रिया के लिए सहमति दी थी और इसका उपचार भी शुरू हो चुका था। इसलिए, यह मानना उचित होगा कि पति ने पहले ही IVF कराने की सहमति दे दी थी।एआई निर्मित सांकेतिक चित्र
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नई दिल्ली - दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसले में यह स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति पहले से IVF (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) प्रक्रिया के लिए सहमति दे चुका है, और बाद में किसी दुर्घटना के कारण वह कोमा या पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) में चला जाता है, तो उसकी नई लिखित सहमति के अभाव में भी, उसकी पत्नी के अनुरोध पर उसके शुक्राणु (स्पर्म) निकालकर संरक्षित किए जा सकते हैं।

अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि प्रक्रिया (Section 22 of the ART Act) कानून की दासी (हैंडमेडेन) है, न कि मालिक। अगर किसी व्यक्ति का माता-पिता बनने का अधिकार (प्रजनन अधिकार) और गरिमा दांव पर लगी है, तो तकनीकी कानूनी बाधाओं को इस तरह से समझा जाना चाहिए जो इस अधिकार को आगे बढ़ाए, न कि उसका गला घोंटे।

यह याचिका एक भारतीय सैनिक की पत्नी ने दायर की थी। उनके पति, लांस नायक कुमार, भारतीय सेना में तैनात थे। 4 मार्च 2017 को दोनों का विवाह हुआ था।

दंपति संतान सुख प्राप्त करना चाहता था। इसके लिए जून 2023 में, उन्होंने IVF तकनीक के माध्यम से बच्चा पैदा करने का निर्णय लिया और इसकी प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी। दोनों ने इसके लिए सहमति दी थी।  2025 में जम्मू-कश्मीर के ऑपरेशनल एरिया डूडगंगा में गश्त के दौरान, लांस नायक कुमार काफी ऊंचाई से गिर गए। इस दुर्घटना में उन्हें गंभीर दिमागी चोट आई। कई सर्जरी के बाद भी वह अब ‘पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (कोमा) में हैं। उनमें निकट भविष्य में ठीक होने की संभावना बहुत कम है। वह खुद सांस नहीं ले सकते, बात नहीं कर सकते, न ही कोई निर्णय ले सकते हैं।

 सेना के अधिकारियों ने पहले IVF जारी रखने की अनुमति दी थी, लेकिन बाद में पति की वर्तमान स्थिति में लिखित सहमति (Written Consent) न होने के कारण प्रक्रिया रोक दी गई।

 पत्नी ने कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की कि सेना एक मेडिकल बोर्ड बनाए जो उनके पति से स्पर्म निकालकर संरक्षित (क्रायोप्रिजर्व) करने की संभावना जांचे, ताकि वह IVF प्रक्रिया पूरी कर सकें।

प्रजनन संबंधी स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि ART अधिनियम की धारा 22(1)(a) के अनुसार, बिना लिखित सहमति के क्लीनिक कोई प्रक्रिया नहीं कर सकता, लेकिन इस मामले के तथ्य बिल्कुल असाधारण हैं।

अदालत ने कहा कि दुर्घटना से पहले, पति और पत्नी दोनों ने स्वेच्छा से IVF प्रक्रिया के लिए सहमति दी थी और इसका उपचार भी शुरू हो चुका था। इसलिए, यह मानना उचित होगा कि पति ने पहले ही IVF कराने की सहमति दे दी थी।

कोर्ट ने कहा, "प्रक्रिया कानून की दासी है। एक प्रक्रियात्मक प्रावधान के कड़े पाठ का पालन न करना, जिससे कानून के मूल इरादे को नष्ट किया जा रहा हो, उचित नहीं है। प्रजनन संबंधी स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।"

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चा पैदा होगा या नहीं, यह भाग्य (Destiny) के अधीन है, लेकिन कोर्ट पति से शारीरिक रूप से असंभव चीज़ की मांग करके पत्नी के भाग्य में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

अदालत ने आर्मी हॉस्पिटल (R&R) दिल्ली छावनी के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट का हवाला दिया। रिपोर्ट में कहा गया:

पति से सर्जिकल तरीके से स्पर्म निकालना (Surgical Retrieval of Sperm) तकनीकी रूप से संभव है। हालांकि, व्यवहार्य (वायबल) स्पर्म निकलने की संभावना बहुत कम है।

इसके बावजूद, कोर्ट ने प्रक्रिया आगे बढ़ाने का आदेश दिया, क्योंकि यह ‘निष्पक्ष, उचित और न्यायसंगत’ होगा।

 अन्य मिसालों का हवाला

अदालत ने अपने फैसले में तीन अहम मिसालों का जिक्र किया:

  1. सिमी राजन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (केरल हाईकोर्ट, 9 मार्च 2026): इस मामले में भी पति ब्रेन डेड था और वेंटिलेटर पर था। केरल हाईकोर्ट ने पत्नी के अनुरोध पर पति के स्पर्म को निकालकर संरक्षित करने की अनुमति दे दी थी।

  2. गुरविंदर सिंह बनाम दिल्ली सरकार (दिल्ली हाईकोर्ट, 2024): कोर्ट ने कहा था कि भारतीय कानून में ‘पोस्टहुमस रिप्रोडक्शन’ (मृत्यु के बाद प्रजनन) पर कोई प्रतिबंध नहीं है, बशर्ते मृतक की सहमति साबित की जा सके।

  3. Y बनाम ए हेल्थकेयर NHS ट्रस्ट (इंग्लैंड, 2018): इस मामले में भी अदालत ने यह माना कि यदि कोई व्यक्ति पहले से बच्चा पैदा करने की इच्छा रखता था, तो उसके कोमा में जाने के बाद, उसके स्पर्म को उसकी पत्नी के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

Summary

अदालत के प्रमुख निर्देशों के मुताबिक पति की दुर्घटना से पहले IVF उपचार में शामिल होने की सहमति को ART अधिनियम की धारा 22 के तहत पर्याप्त अनुपालन (Sufficient Compliance) माना जाएगा।

यदि प्रक्रिया के किसी अन्य चरण के लिए पति की लिखित सहमति आवश्यक है, तो पत्नी की सहमति को उसकी ओर से वैध सहमति माना जाएगा।

अधिकारी केवल इस एक आधार पर (पति की वर्तमान लिखित सहमति न होने) पत्नी को IVF प्रक्रिया से वंचित नहीं कर सकते हैं। यह अनुमति अन्य सांविधिक नियमों और पति की चिकित्सीय स्थिति के अधीन होगी।

अदालत ने कहा कि दुर्घटना से पहले, पति और पत्नी दोनों ने स्वेच्छा से IVF प्रक्रिया के लिए सहमति दी थी और इसका उपचार भी शुरू हो चुका था। इसलिए, यह मानना उचित होगा कि पति ने पहले ही IVF कराने की सहमति दे दी थी।
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अदालत ने कहा कि दुर्घटना से पहले, पति और पत्नी दोनों ने स्वेच्छा से IVF प्रक्रिया के लिए सहमति दी थी और इसका उपचार भी शुरू हो चुका था। इसलिए, यह मानना उचित होगा कि पति ने पहले ही IVF कराने की सहमति दे दी थी।
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अदालत ने कहा कि दुर्घटना से पहले, पति और पत्नी दोनों ने स्वेच्छा से IVF प्रक्रिया के लिए सहमति दी थी और इसका उपचार भी शुरू हो चुका था। इसलिए, यह मानना उचित होगा कि पति ने पहले ही IVF कराने की सहमति दे दी थी।
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