आचार्य प्रशांत को जान की धमकी: जानिए हिन्दू धर्मं और डॉ अंबेडकर को लेकर आचार्य ने ऐसा क्या कहा कि जातिवादियों को बुरा लगा?

उन्होंने कहा कि धर्म के नाम पर जो प्रपंच चल रहा है, उसे अस्वीकार करना होगा। हिंदू धर्म में जातिगत भेदभाव इतना गहरा है कि सुधार की गुंजाइश नहीं दिखी, इसलिए अंबेडकर ने कहा कि हिंदू धर्म संरचनात्मक सुधार के लिए सक्षम नहीं है।
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आचार्य प्रशांत ने बताया कि अंबेडकर ने गहराई से समाज को समझा था। वे अलग चुनाव क्षेत्र, आरक्षण, शिक्षा और संगठन पर जोर देते थे। मृत्यु से दो महीने पहले उन्होंने धर्मांतरण किया ।ग्राफिक - आसिफ निसार
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नई दिल्ली- प्रसिद्ध दार्शनिक एवं लेखक आचार्य प्रशांत को हत्या की धमकी मिली है। यह धमकी उन्हें डॉ. भीमराव अंबेडकर के सम्मान में दिए गए वक्तव्य के बाद एक यूट्यूब अकाउंट के माध्यम से दी गई है। आपको बता दें, दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज के एससी/एसटी सेल ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की जयंती के अवसर पर प्रसिद्ध दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत को आमंत्रित किया था।

अम्बेडकर जयंती पर आयोजित इस कार्यक्रम में आचार्य प्रशांत ने छात्रों के साथ खुलकर संवाद किया। रामजस कॉलेज के छात्र शाहनवाज ने उनसे सवाल पूछा कि डॉक्टर अंबेडकर ने सामाजिक अन्याय के खिलाफ संवैधानिक उपायों का सहारा लिया, न कि किसी क्रांतिकारी आंदोलन का। क्या उनका यह विश्वास सही था कि कानूनी सुधारों से भारत में गहरी सामाजिक अन्याय को दूर किया जा सकता है और क्या यह पर्याप्त था?

आचार्य प्रशांत ने इस सवाल का विस्तृत जवाब देते हुए कहा कि डॉक्टर अंबेडकर का तरीका निश्चित रूप से सही था। उन्होंने पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में महात्मा गांधी और डॉक्टर अंबेडकर दोनों को दलित वर्ग के उत्थान के प्रमुख नाम बताया। गांधी जी वर्ण व्यवस्था के सुधार, नैतिक और आध्यात्मिक तरीके से कुरीतियों को हटाने की बात करते थे और अस्पृश्यता को हिंदू धर्म पर कलंक मानते थे। लेकिन आचार्य प्रशांत ने बताया कि डॉक्टर अंबेडकर ने इसे आसान नहीं माना। उन्होंने स्वयं दर्द झेला था, इसलिए उनका तरीका ज्यादा व्यवहारिक था। उन्होंने संस्थागत सुरक्षा, कानूनी और संवैधानिक उपायों पर जोर दिया।

आचार्य प्रशांत से संवाद करते स्टूडेंट्स
आचार्य प्रशांत से संवाद करते स्टूडेंट्स @AP_RashtraDharma_Hindi

आचार्य ने कहा कि अंबेडकर का तरीका गांधी जी के मुकाबले ज्यादा क्रांतिकारी था। जब उन्होंने देखा कि हिंदू धर्म में सुधार नहीं हो रहा तो उन्होंने धर्म त्यागने तक की बात की। सुधार की कोशिश उन्होंने बहुत की, लेकिन अंत में कहा कि अगर सुधर नहीं सकता तो शोषण सहने का कोई फायदा नहीं। आचार्य प्रशांत ने जोर देकर कहा कि अंबेडकर के संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों के फल आज भारत की बड़ी आबादी तक पहुंच रहे हैं। अगर उनका तरीका सही नहीं होता तो आज हम यहां बैठकर बात नहीं कर पाते। विशेषकर पिछड़े वर्गों, महिलाओं और लड़कियों की स्थिति में सुधार हुआ है। मानव विकास के सूचकांकों पर नजर डालें तो अंबेडकर के लिए संघर्ष करने वाले वर्ग आजादी के मुकाबले बहुत बेहतर हालत में हैं।

अगर डॉ. अंबेडकर के तरीके सही नहीं होते तो शायद आज हम लोग यहां बैठकर बात नहीं कर रहे होते।
आचार्य प्रशांत

फिर आचार्य ने दूसरे सवाल पर आते हुए कहा कि क्या यह पर्याप्त था? उन्होंने पूछा कि क्या भारत से जातिगत भेदभाव पूरी तरह मिट गया है? 150-200 साल से जातिगत कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष चल रहा है। महात्मा फुले जैसे नामों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज भी भारत में विचित्र स्थिति है। गांधी जी नैतिकता, सत्य, अहिंसा और प्रेम से इसे धोना चाहते थे, लेकिन भीतर की पुरानी मान्यताएं जड़ें जमाए बैठी रहीं। आचार्य प्रशांत ने बताया कि अंबेडकर ने गहराई से समाज को समझा था। वे अलग चुनाव क्षेत्र, आरक्षण, शिक्षा और संगठन पर जोर देते थे। मृत्यु से दो महीने पहले उन्होंने धर्मांतरण की बात भी की।

उन्होंने स्पष्ट किया कि कानूनी उपाय जरूरी तो हैं लेकिन पर्याप्त नहीं। कानून से लोग मजबूरी में मानेंगे, लेकिन दिल नहीं बदलेगा। प्रेम, समानता और भेदभाव का कांटा जड़ों में बना रहेगा। आचार्य ने कहा कि यह जड़ें धर्म के नाम पर हैं। शास्त्रों में लिखी मान्यताएं जातिगत भेदभाव को जायज ठहराती हैं। डॉक्टर अंबेडकर ने भी धर्म की अपरिहार्यता मानी थी और समता मूलक बौद्ध धर्म चुना, लेकिन उन्होंने कहा कि धर्म तो चाहिए। आचार्य प्रशांत ने जोर दिया कि धर्म मनुष्य की आंतरिक बेचैनी को संबोधित करने वाला टाइमलेस समाधान है, न कि रिचुअल्स या बिलीफ्स का बंडल। जातिगत भेदभाव धर्म के नाम पर बचा है, इसलिए हमें धर्म ग्रंथों से ही सवाल पूछने पड़ेंगे।

उन्होंने आगे कहा कि धर्म के नाम पर जो प्रपंच चल रहा है, उसे अस्वीकार करना होगा। हिंदू धर्म में जातिगत भेदभाव इतना गहरा है कि सुधार की गुंजाइश नहीं दिखी, इसलिए अंबेडकर ने कहा कि हिंदू धर्म संरचनात्मक सुधार के लिए सक्षम नहीं है। लेकिन आचार्य ने जोड़ा कि धर्म छोड़ना समाधान नहीं, बल्कि उसके केंद्र को साफ करना है। आज क्लाइमेट चेंज जैसी समस्याओं का आध्यात्मिक समाधान चाहिए, जो धर्म के केंद्र से ही आएगा। उन्होंने मनुष्य को दो हिस्सों में बांटा – एक पुराना जानवर (आदतें) और नई चेतना (प्रेम)। धर्म इंक्वायरी, जिज्ञासा और सवाल पूछने का नाम है। अंबेडकर धार्मिक व्यक्ति थे क्योंकि उन्होंने सवाल पूछे। जो पुरानी परंपराएं ढोते हैं वे अधार्मिक हैं।
आचार्य प्रशांत को डॉक्टर अंबेडकर के सम्मान में दिए गए अपने बयानों पर एक यूट्यूब अकाउंट के जरिए मौत की धमकी मिली है।
आचार्य प्रशांत को डॉक्टर अंबेडकर के सम्मान में दिए गए अपने बयानों पर एक यूट्यूब अकाउंट के जरिए मौत की धमकी मिली है।

आप किसी भी सूचकांक पर जो ह्यूमन डेवलपमेंट के इंडिकेटर्स होते हैं, देख लें तो आप यही पाओगे कि जिन वर्गों के लिए डॉ. अंबेडकर ने संघर्ष किया, वह आज आजादी की तुलना में बहुत बेहतर हालत में है।

जातिगत भेदभाव पर कही ये बात

आचार्य प्रशांत ने छात्रों से सवाल करते हुए कहा कि क्या भारत से जातिगत भेदभाव पूरी तरह मिट गया है? उन्होंने जोर देकर कहा कि अस्पृश्यता, छुआछूत और साथ में खाना-पीना न कर सकने जैसी कुरीतियों का विरोध तो बहुत लोगों ने किया है, जिसमें डॉ. अंबेडकर अग्रणी रहे और उनके साथ अन्य महापुरुष भी शामिल हैं। कोई भी समझदार व्यक्ति जातिगत कुरीतियों का समर्थन नहीं कर सकता, इसलिए विरोध तो सभी ने किया और करते भी रहेंगे, लेकिन विरोध के बावजूद आज हम कहां तक पहुंचे हैं, यह देखना जरूरी है।

आचार्य ने स्पष्ट किया कि कानूनी, संस्थागत और संवैधानिक उपाय निश्चित रूप से जरूरी हैं और उनके बिना प्रगति संभव नहीं थी, लेकिन जरूरी होना और पर्याप्त होना दो अलग बातें हैं। आजादी के 75 वर्ष और जाति विरोधी चेतना के 150-200 वर्ष बीत जाने के बावजूद भारत में आज भी विचित्र स्थिति बनी हुई है, जिससे साफ है कि जो कुछ हुआ वह पर्याप्त नहीं है। गांधी जी नैतिकता, करुणा, सत्य, अहिंसा और प्रेम से इसे धोना चाहते थे, लेकिन भीतर की गहरी जड़ें वाली पुरानी मान्यताएं बनी रहीं, इसलिए भीतरी सफाई नहीं हो पाई। डॉ. अंबेडकर ने समाज की गहराई समझते हुए संस्थागत सुरक्षा, आरक्षण, शिक्षा और अंत में धर्मांतरण तक की बात की, क्योंकि उन्हें लगता था कि स्थिति जल्दी बदलनी चाहिए, लेकिन हालत पूरी तरह नहीं बदली। अगर जातिगत भेदभाव सचमुच मिट गया होता तो आज ऐसी चर्चा की जरूरत ही नहीं पड़ती। आचार्य ने निष्कर्ष निकाला कि यह कीचड़ अभी भी नहीं धुला है और केवल कानूनी उपायों से दिल नहीं बदलता, इसलिए जड़ों तक सफाई की जरूरत बनी हुई है।

आचार्य प्रशांत ने अंत में कहा कि अतीत के वजन – शारीरिक और सामाजिक, से मुक्ति मिलनी चाहिए। जीवन अपनी होनी चाहिए, सवाल पूछने की आजादी होनी चाहिए। कार्यक्रम में उन्होंने जोर दिया कि काम अधूरा है, जड़ों तक सफाई जरूरी है।

इस संवाद के बाद आचार्य प्रशांत को डॉक्टर अंबेडकर के सम्मान में दिए गए अपने बयानों पर एक यूट्यूब अकाउंट के जरिए मौत की धमकी मिली है। प्राशांत अद्वैत फाउंडेशन ने इसकी जानकारी दी और कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। फाउंडेशन के प्रवक्ता ने कहा कि ऐसी धमकियां उनके संवेदनशील विषयों पर बयानों के बाद नियमित रूप से आती रहती हैं। आचार्य प्रशांत का यह संवाद किरोड़ीमल कॉलेज में छात्रों के बीच हुआ, जहां उन्होंने सामाजिक न्याय, जाति, धर्म और सुधार की गहरी चर्चा की। पूरा वीडियो यूट्यूब पर उपलब्ध है और इसमें उनके विचारों की गहराई साफ झलकती है।

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