सरकार कहती है मैला प्रथा नहीं, 4 राज्यों की महिलाओं ने खोली पोल- "हम आज भी हाथों से मैला साफ करती हैं" | SKA ने लांच किया India@80 अभियान

मैनुअल स्कैवेंजिंग से मुक्ति के लिए सफाई कर्मचारी आंदोलन का एक साल का महाअभियान शुरू
जस्टिस सुधांशु धूलिया ने चौंकाने वाली बात कही कि 40 से अधिक जिलों में आज भी मैला प्रथा और सूखे शौचालय मौजूद हैं। महिलाओं की आपबीती सुनकर उन्होंने कहा कि हर भारतीय को ऐसा महसूस होना चाहिए जैसे वह खुद अपने सिर पर मैला ढो रहा हो।
जस्टिस सुधांशु धूलिया ने चौंकाने वाली बात कही कि 40 से अधिक जिलों में आज भी मैला प्रथा और सूखे शौचालय मौजूद हैं। महिलाओं की आपबीती सुनकर उन्होंने कहा कि हर भारतीय को ऐसा महसूस होना चाहिए जैसे वह खुद अपने सिर पर मैला ढो रहा हो।
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नई दिल्ली- देश में सूखे शौचालय (ड्राई लैट्रिन) और हाथ से मैला ढोने की प्रथा आज भी जारी है यह राष्ट्रीय शर्म है, और अब इसे खत्म करने का संकल्प लिया गया है। जहां केंद्र सरकार संसद में यह दावा करती रही है कि देश में मैला प्रथा समाप्त हो चुकी है, वहीं उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर से आईं महिलाओं ने राजधानी दिल्ली पहुंचकर इस दावे की पोल खोल दी। इन महिलाओं ने साहसपूर्वक बताया कि वे आज भी अपने हाथों से मैला साफ करने को मजबूर हैं।

महिलाओं ने सवाल उठाया , "सरकार कैसे कह सकती है कि मैला प्रथा नहीं है, जब हम आज भी रोज सूखे शौचालय साफ कर रही हैं? हमें इस अस्पृश्यता और गुलामी से आजादी कब मिलेगी?"

इसी के साथ सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) ने भारत को मैला प्रथा के इस राष्ट्रीय कलंक से मुक्त कराने के लिए 'इंडिया @80' नामक एक साल लंबे अभियान की शुरुआत की। इस मौके पर SKA की बोर्ड सदस्य नारायणम्मा और सरोज देवी के साथ-साथ पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस मदन लोकुर, जस्टिस सुधांशु धूलिया, पटना हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अंजना प्रकाश और कई प्रतिष्ठित नागरिक मौजूद रहे।

पीड़ितों की आपबीती

मुस्सी देवी (70 वर्ष, सीतापुर, उत्तर प्रदेश) ने बताया कि उन्होंने पूरा जीवन दूसरों का मैला साफ करने में गुजार दिया और अब मरने से पहले इस प्रथा का अंत देखना चाहती हैं।

मुजफ्फर अहमद शेख (जम्मू-कश्मीर) ने कहा कि कश्मीर में सूखे शौचालयों में मैला प्रथा बड़े पैमाने पर मौजूद है, लेकिन इस पर कोई खुलकर बात नहीं करता।

अंगूरी बाई (मध्य प्रदेश) ने बताया कि 14 साल की उम्र में शादी के बाद सास उन्हें सूखा शौचालय साफ करने ले गई थीं और तब से आज तक वे यही काम कर रही हैं। उन्होंने सरकार से मुक्ति दिलाने की मांग की।

चंजोतिया देवी (बिहार) 15 साल की उम्र से आज तक सूखे शौचालय साफ कर रही हैं। उन्होंने कहा कि अगली पीढ़ी को इस अत्याचार से मुक्त किया जाना चाहिए।

नारायणम्मा ने बताया कि वे 600 सीटों वाले सूखे शौचालय साफ करती थीं, जब उन्हें मुक्ति मिली और अब वे पूरा जीवन इस प्रथा को खत्म करने में समर्पित कर रही हैं।

इस अभियान का लक्ष्य भारत की आजादी के 80वें वर्ष में देश को मैला प्रथा और सूखे शौचालयों से पूरी तरह मुक्त कराना है।
इस अभियान का लक्ष्य भारत की आजादी के 80वें वर्ष में देश को मैला प्रथा और सूखे शौचालयों से पूरी तरह मुक्त कराना है।

इस मौके पर दीप्ति सुकुमार ने कहा कि बार-बार बने कानून, सुप्रीम कोर्ट के आदेश और नीतियां भी इस जाति, पितृसत्ता, अस्पृश्यता और गुलामी में जड़ें जमाए इस प्रथा को खत्म नहीं कर पाई हैं। न्यायविद उषा रामनाथन ने कहा कि सरकार को मैला प्रथा को अस्पृश्यता के कृत्य के रूप में देखकर इसे समाप्त करना चाहिए।

जस्टिस मदन लोकुर ने कहा कि SKA और समुदाय लगातार मैला प्रथा खत्म करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट तक मामला ले जाने के बावजूद आज तक कुछ नहीं बदला। उन्होंने कहा कि मैला प्रथा का उन्मूलन सरकार की प्राथमिकता नहीं है और संसद को झूठ बताया जा रहा है।

जस्टिस सुधांशु धूलिया ने चौंकाने वाली बात कही कि 40 से अधिक जिलों में आज भी मैला प्रथा और सूखे शौचालय मौजूद हैं। महिलाओं की आपबीती सुनकर उन्होंने कहा कि हर भारतीय को ऐसा महसूस होना चाहिए जैसे वह खुद अपने सिर पर मैला ढो रहा हो।

जस्टिस अंजना प्रकाश ने कहा कि यह समस्या इतनी जटिल है कि केवल कानून बनाकर इसे खत्म नहीं किया जा सकता। उन्होंने अफसोस जताया कि हम राष्ट्रगान और देशभक्ति गीतों को लेकर तो चिंतित रहते हैं, लेकिन इस राष्ट्रीय शर्म को खत्म करने पर विचार तक नहीं करते।

बेजवाड़ा विल्सन ने कहा कि उन्होंने अदालतों को कई फोटोग्राफिक सबूत दिए, लेकिन अदालतें सूखे शौचालयों और मैला प्रथा की तस्वीरें देखना ही नहीं चाहतीं, यही हमारी अदालतों की हालत है।

सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक बेजवाड़ा विल्सन ने कहा कि आजादी के 80 साल बाद भी अगर हमें दिल्ली आकर खुद को मैला प्रथा के जीवंत सबूत के रूप में पेश करना पड़ रहा है, तो यह सरकार की जातिवादी मानसिकता को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि उन्होंने 16 साल की उम्र में यह लड़ाई शुरू की थी और अब वे 60 साल के हो चुके हैं , बहुत कुछ बदला है, लेकिन सूखे शौचालयों में मैला प्रथा आज भी बरकरार है।

विल्सन ने कहा कि उन्होंने अदालतों को कई फोटोग्राफिक सबूत दिए, लेकिन अदालतें सूखे शौचालयों और मैला प्रथा की तस्वीरें देखना ही नहीं चाहतीं, यही हमारी अदालतों की हालत है। उन्होंने सरकार को इसी साल के भीतर मैला प्रथा खत्म करने का अल्टीमेटम देते हुए कहा कि इसके लिए एक्शन प्लान तैयार है और अब इसे और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

कार्यक्रम में अर्थशास्त्री जयती घोष, अतुल सूद, रीतिका खेड़ा और नवशरण, सुप्रीम कोर्ट की वकील वृंदा ग्रोवर, RTI कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज, निखिल डे और अमृता जौहरी, MKSS के शंकर, लेखिका गीता हरिहरन और प्रबीर पुरकायस्थ, नारीवादी सुनीता ढर, प्रोफेसर नंदिनी सुंदर, अभिनेता लोकेश जैन और इंदु प्रकाश, सुहास बोरकर और दीपक डोलकिया सहित नागरिक समाज के कई सदस्यों ने मैला प्रथा और सूखे शौचालयों को जल्द से जल्द खत्म करने की शपथ ली।

मैला प्रथा और 'इंडिया @80' अभियान क्या है?

मैला प्रथा (मैनुअल स्कैवेंजिंग) किसी सुरक्षा साधन के बिना, हाथों या बुनियादी औजारों से मानव मल को साफ करने, उठाने, ढोने या निपटाने की एक अमानवीय और घृणित कुप्रथा है। इसके तहत सूखे शौचालयों, खुली नालियों, गटरों, सेप्टिक टैंकों और रेलवे पटरियों से मानव मल की सफाई की जाती है।

भारत में इस प्रथा को समाप्त करने के लिए कई कड़े कानून बनाए गए हैं:

1. 1993 का अधिनियम: 'रोजगार मैनुअल स्कैवेंजर्स और शुष्क शौचालय निर्माण (निषेध) अधिनियम, 1993' के तहत पहली बार हाथ से मैला ढोने और शुष्क शौचालयों के निर्माण पर रोक लगाई गई थी।

2. PEMSR अधिनियम, 2013: 'मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार का निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013' ने इसके दायरे को बढ़ाकर सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई को भी इसमें शामिल किया। इस कानून के तहत:

  • मैनुअल स्कैवेंजिंग से जुड़ा हर अपराध संज्ञेय (Cognizable) और गैर-जमानती (Non-bailable) है।

  • नियमों का उल्लंघन करने पर 2 वर्ष तक का कारावास या ₹1 लाख से अधिक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

    तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद आज भी देश के कई इलाकों में मैला ढोने की प्रथा कायम है जिसे करने वाले अधिकांश सफाईकर्मी दलित समुदाय से हैं और जातिगत उत्पीडन का शिकार होते हैं।

इंडिया @80 अभियान

यह सफाई कर्मचारी आंदोलन द्वारा शुरू किया गया एक साल लंबा राष्ट्रीय अभियान है, जिसका लक्ष्य भारत की आजादी के 80वें वर्ष में देश को मैला प्रथा और सूखे शौचालयों से पूरी तरह मुक्त कराना है। इसके तहत विभिन्न राज्यों के प्रभावित सफाई कर्मचारी अपनी आपबीती साझा कर रहे हैं ताकि सरकार के इस दावे को चुनौती दी जा सके कि देश में अब मैला प्रथा मौजूद नहीं है।

जस्टिस सुधांशु धूलिया ने चौंकाने वाली बात कही कि 40 से अधिक जिलों में आज भी मैला प्रथा और सूखे शौचालय मौजूद हैं। महिलाओं की आपबीती सुनकर उन्होंने कहा कि हर भारतीय को ऐसा महसूस होना चाहिए जैसे वह खुद अपने सिर पर मैला ढो रहा हो।
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