जानलेवा Septic Tanks: 3 साल में 339 मौतें लेकिन सरकार ने संसद में बताया 5 साल में 315 मरे! झूठे आंकड़ों पर सफाई कर्मचारी आंदोलन आज जंतर मंतर पर PM से मांगेगा जवाब!

2025 में SKA ने 121 मौतें दर्ज कीं, जबकि सरकारी आंकड़े केवल 46 बता रहे हैं। 2024 में SKA के अनुसार 116 मौतें हुईं, जबकि सरकार ने 55 बताया। इसी तरह 2023 के आंकड़ों में भी SKA ने 102 मौतें बताईं, जबकि सरकारी संख्या 65 रही। संगठन का आरोप है कि सरकार संसद में गलत आंकड़े पेश कर रही है। यह वर्ष 2026 अभी शुरू ही हुआ है, और पूरे देश में सीवर और सेप्टिक टैंकों में पहले ही 41 मौतें हो चुकी हैं, यानी 3 महीनों में 41 जानें चली गई हैं।
सीवर-सेप्टिक टैंकों में मौतों को लेकर दिल्ली में 2023 में आयोजित अभियान में शामिल हुए शोकग्रस्त परिजन
सीवर-सेप्टिक टैंकों में मौतों को लेकर दिल्ली में 2023 में आयोजित अभियान में शामिल हुए शोकग्रस्त परिजन फाइल फोटो
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नई दिल्ली- सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) आज जंतर मंतर पर सीवर और सेप्टिक टैंकों में हो रही मौतों के खिलाफ प्रदर्शन व धरना आयोजित कर रहा है। 10 राज्यों से आए सफाई कर्मचारी, सीवर मौतों में जान गंवाने वालों के परिजन और सामाजिक कार्यकर्ता इसमें शामिल हो रहे हैं। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री को संबोधित मांगों का पत्र जारी किया जाएगा, जिसमें देशभर में इन मौतों को तुरंत रोकने की अपील की गई है।

सफाई कर्मचारी आंदोलन ने गहरे दुख के साथ कहा है कि देश में हर दूसरे दिन एक व्यक्ति सीवर या सेप्टिक टैंक में जान गंवा रहा है, लेकिन सरकार इस पर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए है। 2025 में SKA ने 121 मौतें दर्ज कीं, जबकि सरकारी आंकड़े केवल 46 बता रहे हैं। 2024 में SKA के अनुसार 116 मौतें हुईं, जबकि सरकार ने 55 बताया। इसी तरह 2023 के आंकड़ों में भी SKA ने 102 मौतें बताईं, जबकि सरकारी संख्या 65 रही। संगठन का आरोप है कि सरकार संसद में गलत आंकड़े पेश कर रही है।

संसद में हाल ही में दी गई जानकारी के मुताबिक 2021 से 2025 तक के 5 वर्षों में कुल 315 सफाई कर्मचारी सीवर और सेप्टिक टैंक साफ करते समय मारे गए। इनमें महाराष्ट्र सबसे ऊपर है, जहां 53 मौतें हुईं। हरियाणा में 43, तमिलनाडु में 38, उत्तर प्रदेश में 35, दिल्ली में 26, गुजरात में 25 और राजस्थान में 24 मौतें दर्ज की गईं। इन सात राज्यों में ही कुल मौतों का 77.5 प्रतिशत हिस्सा है।

यह वर्ष 2026 अभी शुरू ही हुआ है, और पूरे देश में सीवर और सेप्टिक टैंकों में पहले ही 41 मौतें हो चुकी हैं, यानी 3 महीनों में 41 जानें चली गई हैं।
यह वर्ष 2026 अभी शुरू ही हुआ है, और पूरे देश में सीवर और सेप्टिक टैंकों में पहले ही 41 मौतें हो चुकी हैं, यानी 3 महीनों में 41 जानें चली गई हैं।
यह वर्ष 2026 अभी शुरू ही हुआ है, और पूरे देश में सीवर और सेप्टिक टैंकों में पहले ही 41 मौतें हो चुकी हैं, यानी 3 महीनों में 41 जानें चली गई हैं। लेकिन मौतों को रोकने के बजाय, सरकार का ध्यान केवल सच को छिपाने पर है। यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है। प्रधानमंत्री को इस विफलता को स्वीकार करना चाहिए और राष्ट्र से माफी मांगनी चाहिए।

SKA के बेजवाड़ा विल्सन कहते हैं, " अन्याय की हद तो यह है कि ऐसी मौतों को रोकने के लिए सक्रिय होने के बजाय, सरकार की एकमात्र चिंता आधिकारिक मृत्यु के आंकड़ों में हेरफेर करना और उन्हें कम करके दिखाना है। वर्ष 2025 में, सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) ने सीवर और सेप्टिक टैंकों में कुल 121 लोगों की मौत दर्ज की, लेकिन सरकारी आंकड़े ऐसी केवल 46 मौतों की रिपोर्ट करते हैं। फिर, वर्ष 2024 में, SKA ने 116 मौतों को दर्ज किया, लेकिन सरकार ने केवल 55 की रिपोर्ट दी, और 2023 में, SKA के पास 102 मौतों का विवरण है, लेकिन सरकारी आंकड़े सीवर और सेप्टिक टैंकों में केवल 65 मौतों की रिपोर्ट करते हैं। सरकार ने संसद में बार-बार गलत आंकड़े पेश किए हैं। सरकार सच क्यों छिपा रही है?

यह वर्ष 2026 अभी शुरू ही हुआ है, और पूरे देश में सीवर और सेप्टिक टैंकों में पहले ही 41 मौतें हो चुकी हैं, यानी 3 महीनों में 41 जानें चली गई हैं। लेकिन मौतों को रोकने के बजाय, सरकार का ध्यान केवल सच को छिपाने पर है। यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है। प्रधानमंत्री को इस विफलता को स्वीकार करना चाहिए और राष्ट्र से माफी मांगनी चाहिए।

साथ ही, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर राज्यों में सूखी शौचालयों में अवैध और अमानवीय मैला ढोने का काम अभी भी जारी है। कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद, दलित समुदायों, विशेष रूप से महिलाओं को, अभी भी इस अपमानजनक काम में धकेला जा रहा है।

सरकार के मंत्री संसद में बार-बार झूठे दावे कर रहे हैं कि मैला ढोने की प्रथा को समाप्त कर दिया गया है। यह केवल गलत जानकारी नहीं है; यह जमीनी हकीकतों से इनकार और न्याय सुनिश्चित करने से मुंह मोड़ना है।"

संगठन ने प्रधानमंत्री से इस विफलता को स्वीकार करने और राष्ट्रव्यापी माफी मांगने की मांग की है। साथ ही उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर में सूखे शौचालयों में अभी भी अवैध और अमानवीय मैनुअल स्केवेंजिंग जारी है। कानूनी प्रतिबंध के बावजूद दलित समुदाय, खासकर महिलाओं को इस अपमानजनक काम के लिए मजबूर किया जा रहा है। सरकार के मंत्री संसद में बार-बार दावा करते हैं कि मैनुअल स्केवेंजिंग समाप्त हो गई है, लेकिन SKA इसे जमीनी हकीकत से इनकार बताता है।

सफाई कर्मचारी आंदोलन पिछले 40 वर्षों से इस मुद्दे पर संघर्ष कर रहा है। आज 11 बजे जंतर मंतर पर आयोजित इस कार्यक्रम में #StopKillingUs के नारे के साथ इन मौतों को रोकने और मैनुअल स्केवेंजिंग समाप्त करने की मांग जोर-शोर से उठाई जाएगी।

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