
नई दिल्ली- सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) के आह्वान पर लगभग 10 राज्यों से आए सैकड़ों सफाई कर्मचारी एक बार फिर नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एकत्रित हुए। संसद से कुछ ही दूरी पर सैकड़ों लोगों ने ‘स्टॉप किलिंग अस’, ‘सीवर और सेप्टिक टैंक में मौतें रोको’, ‘प्रधानमंत्री माफी मांगो’ जैसे नारे लगाए। उन्होंने अपनी पीड़ा और व्यथा को मुखर किया और अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ न्याय की मांग की।
सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) ने बुधवार को यह प्रदर्शन सरकार से सीवर और सेप्टिक टैंकों में नागरिकों की हो रही मौतों पर तत्काल रोक लगाने और एक समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करने की मांग को लेकर किया। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक ज्ञापन भी सौंपा।
इस अवसर पर सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) के राष्ट्रीय संयोजक एवं रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित बेजवाड़ा विल्सन ने कहा कि इस वर्ष अब तक सीवर और सेप्टिक टैंकों में 41 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की ओर से इस पर मूक मौन है, मानो ये जिंदगियां उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखतीं।
विल्सन ने कहा कि समाज में व्याप्त जातिवादी मानसिकता लोगों को मौत के गटर में जाने को मजबूर करती है, और इस अवैध कार्य के लिए न तो किसी को जिम्मेदार ठहराया जाता है और न ही किसी को दंडित किया जाता है, जबकि यह कानूनन अपराध है।
SKA की नेता दीप्ति सुकुमार ने सीवरों में होने वाली मौतों के वास्तविक आंकड़ों को छुपाने की सरकारी कोशिशों पर सवाल उठाया। उन्होंने बताया कि SKA के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान कुल 121 लोगों की मौत हुई, जबकि सरकार ने केवल 46 मौतें ही दर्ज कीं। इसी तरह 2024 में यह आंकड़ा 116 था, लेकिन सरकार ने केवल 55 मौतें ही स्वीकार कीं। उन्होंने प्रश्न किया कि शेष मृत लोग कहां हैं? उन्होंने मांग की कि सरकार को संसद में वास्तविक आंकड़े पेश करने चाहिए।
प्रदर्शन में सीवरों में जान गंवाने वाले लोगों के कई परिजन भी शामिल हुए। उन्होंने अपने भयावह अनुभवों को साझा किया और सरकार से ऐसी मौतों पर तत्काल रोक लगाने की मांग की।
SKA के विभिन्न राज्यों के नेताओं लवजिंदर कौर, सीमा खैरवाल, नीलम, पूनम, आंचल, पूजा, उषा सागर, राज वाल्मीकि, राजकुमार, सुभाष, अमर सिंह, प्रकाश, मयंक सहित अन्य ने भी संबोधित किया। उन्होंने आरोप लगाया कि स्थानीय प्रशासन ऐसे मामलों में जातिवादी और पितृसत्तात्मक मानसिकता के साथ काम करता है। वक्ताओं ने कहा कि न तो पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा मिलता है और न ही दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होती है।
प्रदर्शन के दौरान SKA ने प्रधानमंत्री के नाम एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में प्रधानमंत्री से सदियों पुराने इस जातिगत उत्पीड़न के लिए राष्ट्र से माफी मांगने की मांग की गई है। साथ ही, सीवर और सेप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों को रोकने, मैनुअल स्कैवेंजिंग (मानव मल की सफाई) की प्रथा को पूरी तरह समाप्त करने और इसमें शामिल लोगों के पुनर्वास के लिए एक समयबद्ध कार्ययोजना घोषित करने की मांग भी शामिल है।
ज्ञापन में केंद्र सरकार के रुख पर तीखा प्रहार करते हुए कहा गया है कि 19 मार्च को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने एक बार फिर यह चौंकाने वाला और बेरुख दावा किया कि मैनुअल स्कैवेंजिंग से कोई मौत नहीं हुई है। ज्ञापन में इसे जानबूझकर सफाई कर्मचारियों के जीवन को नकारना बताया गया है।
बताया गया कि, “वर्ष 2023 में सफाई कर्मचारी आंदोलन ने 102 मौतें दर्ज कीं, जबकि मंत्री ने संसद में केवल 65 मौतों की सूचना दी। वर्ष 2024 में हमने 116 मौतें दर्ज कीं, लेकिन सरकारी आंकड़ा घटकर 54 रह गया। वर्ष 2025 में SKA ने 121 मौतें दर्ज कीं, लेकिन मंत्रालय ने इन्हें घटाकर केवल 46 कर दिया। इस वर्ष, महज तीन महीनों में 41 लोग सीवर और सेप्टिक टैंकों के अंदर मारे जा चुके हैं।”
ज्ञापन में इस बात पर जोर दिया गया कि यह दलित जीवन का व्यवस्थित रूप से मिटाया जाना है। इस क्रूर और अमानवीय जातिगत काम में मारे जाने वाले लोग दलित हैं। साथ ही सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री के उस बयान की निंदा की गई, जिसमें कहा गया था कि यह ‘जाति आधारित’ नहीं, बल्कि ‘व्यवसाय आधारित’ है। SKA ने इसे ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित और वंचित लोगों के साथ सामाजिक न्याय को नकारने की एक साजिश बताया।
ज्ञापन में कहा गया, “ये मौतें कोई दुर्घटना नहीं हैं; ये उपेक्षा, अस्वीकार और निष्क्रियता के माध्यम से स्वीकृत जाति-आधारित हिंसा का प्रत्यक्ष परिणाम हैं। फिर भी, सरकार ने न तो कोई पश्चाताप दिखाया है और न ही तात्कालिकता। इसके बजाय, हमारी मौतों को संख्याओं में बदल दिया गया है, हेर-फेर किया गया है और हमारे सबसे मौलिक अधिकार, जीने के अधिकार को अस्वीकार करने के लिए उन्हें कम करके दिखाया गया है।”
ज्ञापन में यह भी कहा गया कि सरकार द्वारा यांत्रीकरण और आधुनिकीकरण की जिन योजनाओं की घोषणा की गई, वे इस काम से जुड़ी जातिगत संरचनाओं को खत्म करने में विफल रही हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड और जम्मू-कश्मीर के जिलों में सूखी लैट्रिनें (ड्राई लैट्रिन) आज भी मौजूद हैं, जहां दलित महिलाएं अब भी मैनुअल स्कैवेंजिंग के लिए मजबूर हैं। हमारे युवा बिना किसी सुरक्षा, गरिमा और जवाबदेही के सीवर और सेप्टिक टैंकों के अंदर मर रहे हैं। प्रदर्शन के दौरान उपस्थित सभी नेताओं और पीड़ित परिवारों ने एक स्वर में कहा कि जब तक सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से कदम नहीं उठाती, उनका यह आंदोलन जारी रहेगा।
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