
चेन्नई- तमिलनाडु के कांचीपुरम स्थित प्रसिद्ध अरुलमिगु देवराज स्वामी देवनास्थानम में गैर-ब्राह्मण भक्तों के साथ कथित भेदभाव के आरोपों से जुड़े मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पूजा स्थल पर किसी भी तरह के भेदभाव की गुंजाइश नहीं हो सकती। हालांकि कोर्ट ने मंदिर प्रशासन के खिलाफ भेदभाव का कोई स्वतंत्र निष्कर्ष दर्ज करते हुए दंडात्मक आदेश नहीं दिया, लेकिन मंदिर प्रशासन की ओर से दिए गए आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए यह सुनिश्चित किया कि तीर्थ, सटारी और प्रसाद के वितरण में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होगा तथा भक्तों को मंदिर के विभिन्न सन्निधियों में प्रबंधम और भजनों के पाठ से नहीं रोका जाएगा।
जस्टिस जी. जयचंद्रन और जस्टिस ई. मनोहरन की खंडपीठ ने WP No. 9273 of 2019 में 17 अगस्त को यह आदेश सुनाया। याचिका कांचीपुरम निवासी और थिरुकच्चि नंबि थिरुमलादियार सेवा संगम के सचिव माधवन रामानुज दासन ने दायर की थी।
मामला विशेष रूप से थेंकलै वैष्णव परंपरा से जुड़े भक्तों और कांचीपुरम के देवराज स्वामी मंदिर में धार्मिक अनुष्ठानों एवं सम्मान के तौर-तरीकों से जुड़ा था।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से मांग की थी कि मंदिर में थेंकलै संप्रदाय के गैर-ब्राह्मण भक्तों के साथ भेदभाव को रोका जाए। याचिका में खास तौर पर प्रसाद, तीर्थम और सटारी के वितरण तथा तमिल नालायिर दिव्य प्रबंधम के पाठ सहित मंदिर की कुछ धार्मिक परंपराओं में कथित भेदभाव का मुद्दा उठाया गया था।
याचिकाकर्ता के अनुसार, मंदिर के कई सन्निधियों में सभी समुदायों के लोग भगवान की पूजा करते हैं और वहां कोई बड़ा भेदभाव नहीं है। लेकिन श्री मनवाला मामुनिगल सन्निधि में कथित तौर पर अलग व्यवस्था थी।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि इस सन्निधि में दो प्रवेश द्वार हैं, एक मुख्य प्रवेश द्वार और दूसरा साइड प्रवेश द्वार। आरोप था कि गैर-ब्राह्मण भक्तों को मुख्य द्वार से प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती थी, जबकि ब्राह्मण भक्तों को मुख्य द्वार से प्रवेश दिया जाता था।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि गैर-ब्राह्मणों को मंदिर के सभी सन्निधियों में धार्मिक भजनों या प्रबंधम के पाठ की अनुमति नहीं थी।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि गैर-ब्राह्मण भक्तों को सन्निधि के बाहर खड़ा किया जाता था और उन्हें वहीं प्रसाद एवं तीर्थ दिया जाता था। आरोप यह भी था कि उन्हें सटारी नहीं रखी जाती थी, जबकि धार्मिक सम्मान की इस प्रक्रिया में भेदभाव किया जाता था। याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से मनवाला मामुनिगल के जन्मोत्सव के दौरान लगभग 10 दिनों तक कथित भेदभावपूर्ण व्यवस्था जारी रहने की बात कही। अदालत के समक्ष यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता ने इस संबंध में मंदिर और अधिकारियों को पहले भी शिकायतें दी थीं।
मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि भेदभाव का मुद्दा नया नहीं था।
याचिकाकर्ता ने अदालत का ध्यान 14 अक्टूबर 2003 को तीसरे प्रतिवादी की ओर से मंदिर को भेजे गए पत्र की ओर दिलाया। इसमें कहा गया था कि मंदिर में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए और यदि मंदिर की परंपरा के नाम पर भेदभाव पाया जाता है तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
इसके बाद 23 दिसंबर 2003 के एक अन्य पत्र में भी कहा गया था कि ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण भक्तों के बीच तीर्थ, सटारी और प्रसाद के वितरण के तरीके तथा स्थान में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के 31 अक्टूबर 2008 के एक अन्य आदेश का भी हवाला दिया। उस मामले में अदालत ने पहले दिए गए निर्देशों को बरकरार रखते हुए संबंधित मंदिर प्रशासन को उन्हें “letter and spirit” में लागू करने का निर्देश दिया था।
इसके बावजूद कथित भेदभाव जारी रहने का आरोप लगाते हुए वर्तमान जनहित याचिका दायर की गई।
मंदिर के कार्यकारी ट्रस्टी की ओर से दाखिल जवाब में भेदभाव के आरोपों से इनकार किया गया। मंदिर प्रशासन ने मुख्य रूप से यह तर्क दिया कि आलवार आचार्यों के छोटे-छोटे उप-सन्निधियों में सभी भक्तों को अंदर समायोजित करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
जवाब में कहा गया कि वहां सेवा करने वाले अध्यापका गोष्ठी और अध्यापक मिरासी गोष्ठी के सदस्य भी पूरी तरह अंदर नहीं आ पाते और इसलिए कई लोगों को सन्निधि के बाहर खड़े होकर सेवा करनी पड़ती है।
इसलिए प्रशासन के अनुसार, किसी व्यक्ति को बाहर खड़ा किया जाना जाति के आधार पर भेदभाव का परिणाम नहीं बल्कि स्थान की कमी और सन्निधि की छोटी संरचना के कारण है।
मंदिर प्रशासन ने हाईकोर्ट के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा कि जनता के किसी भी हिस्से के साथ तीर्थ, सटारी और प्रसाद के वितरण में भेदभाव नहीं किया जाएगा।
सरकार की ओर से पेश विशेष सरकारी वकील ने भी अदालत को बताया कि मंदिर प्रशासन सभी लोगों को समान रूप से देखता है और किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।
हाईकोर्ट ने इसी आश्वासन को अपने आदेश में रिकॉर्ड पर लिया।
अदालत ने कहा:
पीठ ने कहा कि सरकार की ओर से दिया गया आश्वासन याचिकाकर्ता की एक प्रमुख शिकायत को दूर करता है, खासकर तीर्थम, सटारी और प्रसाद के वितरण से संबंधित शिकायत को। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भगवद्गीता के नौवें अध्याय के 29वें श्लोक का उल्लेख किया। अदालत ने श्लोक का अंग्रेजी अनुवाद अपने आदेश में दर्ज किया:
“मैं सभी जीवों के प्रति समान भाव रखता हूँ। न तो मैं किसी के प्रति पक्षपाती हूँ और न ही किसी से घृणा करता हूँ। लेकिन जो लोग पूरी श्रद्धा के साथ मेरी पूजा करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ।” इसके बाद कोर्ट ने कहा: भगवान की नजर में सभी जीव समान हैं और भगवान किसी के साथ भेदभाव नहीं करते।
मामले का दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा हिंदू धार्मिक भजनों और नालायिर दिव्य प्रबंधम के पाठ से जुड़ा था।
मंदिर प्रशासन ने अपने जवाब में कहा कि सथुमारै और सेवा कालम के दौरान प्रबंधम के पाठ का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को स्वतः प्राप्त अधिकार नहीं है। प्रशासन ने कहा कि थेंकलै संप्रदाय के अध्यापका मिरासी को यह एक वैधानिक रूप से संरक्षित अधिकार प्राप्त है और इसके साथ पारंपरिक सेवा, पारिश्रमिक तथा सम्मान से जुड़े अधिकार भी जुड़े हैं।
लेकिन मंदिर प्रशासन ने साथ ही यह स्पष्ट किया कि इसके अलावा वह याचिकाकर्ता या किसी अन्य व्यक्ति अथवा समूह को मंदिर के किसी भी सन्निधि में पूजा के उद्देश्य से प्रबंधम का पाठ करने से नहीं रोकेगा।
हाईकोर्ट ने इस आश्वासन को भी रिकॉर्ड पर लिया।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि अध्यापका मिरासी के रूप में थेंकलै संप्रदाय से जुड़े लोगों को प्राप्त अधिकार एक पारंपरिक और वैधानिक रूप से संरक्षित सेवा-अधिकार है।
इसलिए कोर्ट ने उस पारंपरिक धार्मिक सेवा को खत्म करने का आदेश नहीं दिया।
इसके बजाय अदालत ने मंदिर प्रशासन के उस आश्वासन को स्वीकार किया कि उस विशेष सेवा-अधिकार के अलावा किसी भक्त को पूजा के दौरान प्रबंधम के पाठ से रोका नहीं जाएगा।
अदालत ने कहा: “‘अध्यापक मिसारी’ (जो थेनकलई संप्रदाय का एक सुरक्षित अधिकार है और कुछ खास रस्मों के दौरान की जाने वाली एक अहम सेवा है) के अलावा, याचिकाकर्ता या किसी अन्य व्यक्ति या समूह को मंदिर के किसी भी हिस्से में पूजा-अर्चना के मकसद से ‘प्रबंधम’ का पाठ करने से नहीं रोका जाएगा।”
अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता का उद्देश्य मंदिर की पारंपरिक धार्मिक रस्मों को बाधित करना नहीं था। कोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ता स्वयं भगवान देवराजस्वामी का भक्त है। पीठ ने कहा कि यदि मंदिर में वर्तमान व्यवस्था के तहत याचिकाकर्ता को भी सन्निधियों में भजन एवं प्रबंधम पाठ का अवसर मिलता है, तो इस व्यवस्था को जारी रखा जा सकता है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह नहीं कहा कि मंदिर प्रशासन ने सिद्ध रूप से जातिगत भेदभाव किया है। अदालत ने मुख्य रूप से मंदिर प्रशासन की ओर से दिए गए आश्वासनों को रिकॉर्ड पर लिया और माना कि इससे याचिकाकर्ता की प्रमुख शिकायतों का समाधान हो जाता है।
तीर्थम, सटारी और प्रसाद के मामले में प्रशासन ने गैर-भेदभाव का आश्वासन दिया।
वहीं प्रबंधम के पाठ के मामले में मंदिर प्रशासन ने कहा कि अध्यापका मिरासी के पारंपरिक अधिकार को छोड़कर किसी भक्त या समूह को पूजा के उद्देश्य से प्रबंधम का पाठ करने से नहीं रोका जाएगा। इन आश्वासनों के आधार पर कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।
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